तू ही नैया पार लगाना

चिलचिलाती धुप में पसीने से तरबतर राहुल गाँधी ने श्रम दान के जरिये भारत के नौजवानों और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले देश के ९० फीसद मजदूरों के बीच शाही परिवार की बढती दूरियों को कम करने की कोशिश की है। कांग्रेस के मीडिया प्रभारियों के पास इस बार ऐसी कई तस्वीरें होंगी जिसका इस्तेमाल वे आने वाले लोक सभा चुनाव के वक्त कर सकते हैं । भारतीय जनता पार्टी के शाइनिंग इंडिया के चमकदार और भडकदार चुनावी विज्ञापनों को" कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ "जैसे नारों ने धो के रख दिया था । यह अलग बात है कि पिछले चार वर्षों के कांग्रेस के शाशन में सबसे ज्यादा धोखा आम आदमी के साथ ही हुआ है । वाम दलों ने इस बार कांग्रेस से यह नारा छिनकर इसमे थोड़ा संसोधन कर के पेश किया है । "कांग्रेस का हाथ अमेरिका के साथ" । मैडम सोनिया गाँधी के कोटरी के कुछ लीडर मैडम को यह समझाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे है कि परमाणु समझौते ही कांग्रेस की नैया पार कर सकती है । लेकिन दिल है कि मानता नहीं । सोनिया जी को पता है कि जिस तबके को परमाणु सझौते से सीधा लाभ होने वाला है वो कभी वोट करता नहीं , यानि इन मतदादाओं के भरोसे सत्ता में दुबारा वापस आना मुश्किल है । चीजों की आसमान छूती कीमतों ने कांग्रेस पार्टी के तमाम चुनावी स्क्रिप्ट पर पानी फेर दिया है । देश के सबसे बड़े विज्ञापन कंपनी को चुनाव के लिए आकर्षक विज्ञापन बनाने के लिए कहा गया है लेकिन कोई ठोस आईडिया नहीं मिल रहे । रही सही चुनावी प्रचार के आईडिया को इंडियन मुजाहिद्दीन के धमाकों ने फ्लॉप करा दिया । सो सब कुछ दारोमदार राहुल गाँधी या कांग्रेस के राजकुमार पर ही है । अति उत्साह में कई कांग्रेसी लीडर राहुल को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने की भरपूर वकालत भी कर रहे है । लेकिन मैडम रिस्क लेने के लिए तैयार नहीं है । राहुल का विभिन् राज्यों का रोड शो अब तक फ्लॉप ही साबित हुए हैं ।
कांग्रेस आलाकमान के लिए यह सौभाग्य की बात है की प्रधानमंत्री से लेकर उनके मंत्रियों में किसी की यह छवि नही है की वे कांग्रेस के लिए वोट बटोर सकें । यही हालत कमोवेश राज्यों में भी है जहाँ कोई ऐसा लीडर नहीं है जो चुनाव में कोई करिश्मा दिखा सके । लेकिन यह कांग्रेस और देश के लिए दुर्भाग्य है की उसे बार बार नेहरू परिवार की ओर ही देखना पड़ता है । सो राहुल जी कभी उत्तर प्रदेश के किसी दलित के घर एस पी जी कमांडो के साथ रात गुजारते हैं तो राजस्थान में नरेगा के तहत काम कर रहे मजदूरों के बीच मिटटी उठाते पाये जाते हैं । ये अलग बात है की वे चाहे नागपुर के कलावती के घर जाय या फ़िर शशिकला के घर मीडिया का पूरा हुजूम उनके साथ होता है । ये अलग बात है की राहुल की पब्लिसिटी के साथ साथ कभी कभी गरीबों का भी भला हो जाता है । मसलन कलावती की गाथा राहुल गांधी ने संसद में सुनाई अगले दिन सुलभ वाले पाठक जी मीडिया के भारी लश्कर को लेकर हवाई जहाज से नागपुर पहुँच गए .बिन्देश्वरी पाठक ने कलावती को तीस लाख रूपये का चैक सौपा अगले दिन यह अख़बारों की बड़ी ख़बर बनी । तो क्या कहे राहुल गाँधी एक प्रोडक्ट है जिसका इस्तेमाल कभी कांग्रेसी लीडर कर रहे है तो कभी एन जी ओ तो कभी मीडिया ।
कभी इंदिरा जी ने नारा दिया था " गरीबी हटाओ 'तो क्या देश के तमाम गरीब उनके पीछे आ गए थे ? शायद ऐसा नहीं हुआ होगा । इंदिरा जी के पास एक चमत्कारिक व्यक्तित्वा था ,उनके पास संगठन की अद्भुत क्षमता थी । सबसे बड़ी बात यह की पूरा विपक्ष टुकड़े टुकड़े में विभाजित था ।
७० के दशक की सियासी जमीन आज पूरी तरह से बदली हुई है । पहले एक नेहरू परिवार एंड कंपनी हुआ करती थी आज लालू परिवार , मुलायम परिवार , करूणानिधि परिवार , मायावती परिवार , राम विलास पासवान परिवार एंड कंपनी जैसे दर्जनों परिवार ने सियासी जमीन पर अपना कब्जा जमा लिया है । इस हालत में राहुल कोई चमत्कार कर पायेंगे मुश्किल लगता है । सबसे बड़ी बात यह है politics में criminals की बढती dakhal ने तमाम सियासी daawpech को puraana कर दिया है । लोक सभा में इस समय १२० सांसद पर कोई न कोई gambhir aarop है लेकिन वे हमारे क़ानून बनाने वाले हैं । हम कहते है की हमारी system
khokhli हो चुकी है लेकिन इसे सुधारने की कोई कोशिश नही करते । हम सिर्फ़ इस देश के naagrik हैं जिसका काम सिर्फ़ टैक्स देना है । sudharne का काम सरकार का है । आज देश में सबसे ज्यादा voter noujavanon है । लेकिन राहुल गांधी को यह पता है की इसमें से ज्यादा लोग वोट नही करते । ४० से ५० फीसद लोग वोट करते हैं जिसमे ज्यादा sankhyan गरीब tabkon की है । राहुल गरीबों के नेता बनने की taiyaree में है लेकिन सियासी maidaan में jame दुसरे खिलाड़ी उनके मकसद को शायद ही कामयाब होने दे । सिर्फ़ विज्ञापन के badoulat राहुल गरीबों का दिल नही जीत सकते । जिस दिन हर गरीब को दो joon की roti मिलने lagegi यह तय है की उसी दिन से व्यवस्था भी अपने आप badal जायेगी और देश का netritwa भी । tabtak सत्ता में आने के लिए किसी पार्टी को राहुल की जरूरत padegi तो किसी को धर्म की तो किसी को जाती की ।

टिप्पणियाँ

Udan Tashtari ने कहा…
अच्छा आलेख-देखिये, क्या रंग बनता है चुनाव का!!
Amit Kumar ने कहा…
राहुल गाँधी चाहे जितनी कबायत करे लेकिन इसे शायद ही वोट में तब्दील कर पाए । इसके लिए ज्यादा पीछे जाने की जरुरत नही है । हमलोगों ने उत्तरप्रदेश और गुजरात में राहुल बाबा के करिश्मे को देख चुके है । हा ये अलग बात है की राहुल बाबा के कोटरी में कुछ लोग ऐसे है जो उन्हें इंदिरा गाँधी से भी ज्यादा चमत्कारिक लीडर मानते है। लेकिन ये तो समय बताएगा की राहुल बाबा का दलितों के धर रात गुजारने का कितना फायदा अपने पार्टी को वोट दिलवाने में कर पाते है .शायद आने वाला लोक सभा चुनाव ही तय कर देगा की आम आदमी का हाथ कांग्रेस के कितना साथ है । आने वाले लोक सभा चुनाव में न सिर्फ़ कांग्रेस के युवराज का भविष्य तय हो जायेगा बल्कि कांग्रेस में गाँधी परिवार का बादशाहत भी तय होगा । बहुत अच्छा लेख है लेकिन इंग्लिश और हिन्दी के मिक्स होने से लेख पढने में पाठको को परेशानी है, इसका धयान रखने की जरुरत है । अमित कुमार
sparsam ने कहा…
using hinglish language - wonderful .

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