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vinod mishra ka blog: जनसँख्या बिस्फोट या दोगली सियासत का नतीजा

जनसँख्या बिस्फोट या दोगली सियासत का नतीजा

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विश्व जनसँख्या दिवस पर भारत में भी बढती आवादी को लेकर चिंता व्यक्त की गई । लेकिन चिंता व्यक्त करने का अंदाज़ कुछ निराला था । विज्ञानं भवन के शानदार हाल में बढती आवादी की चर्चा के बीच हैल्थ मिनिस्टर गुलाम नबी आजाद की तारीफ़ और उनकी क्षमता का यशोगान होता रहा लेकिन पहल की बात कही खो गई । मंत्री के पास समस्या के समाधान के लिए कई उपाय थे कई फोर्मुले थे लेकिन सबसे असरदार उपाय यह था कि गाँव में बिजली पहुचने चाहिए ,टेलीविजन पहुचने चाहिए ताकि लोग मनोरंजन के दुसरे विकल्प में मसरूफ हो सके । उन्होंने कानून का सहारा लेकर जनसंख्या पर नियंत्रण की बात को पुरी तरह से खारिज किया । सरकार के पास कोई ठोस निति नही है ,जनसँख्या रोकने की दृढ़ इच्छाशक्ति नही है इस हालत में जनसँख्या पर कैसे कंट्रोल हो ये एक बड़ा सवाल है । संसद में इस समस्या को लेकर बहस होनी चाहिए लेकिन सब खामोश है । जनसँख्या की भयावहता को इस तरह समझा जा सकता है । पूरी दुनिया का महज २.४ फीसद क्षेत्र भारत के पास है जबकि जनसँख्या के मामले में भारत का यह सरोकार १७ फीसद से ज्यादा है । यानि एक अरब १४ करोड़ ५० लाख की आवादी को लेकर हम सिर्फ़ चीन से पी…

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