राईट टू एडुकेशन का मतलब निकालने में उलझा देश



सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले से उत्साहित मेरा बेटा सवाल पूछता है, क्या अब संस्कृति स्कूल में मेरा एड्मिसन हो पायेगा ? क्या डी पी एस में गरीब के बच्चे पढ़ पाएंगे ? अब मेरा सवाल है, क्यों देश के लाखों बच्चे ऊँचे दर्जे के प्राइवेट स्कूल में पढने को लालायित है ?क्यों ऊँचे दर्जे के स्कूल से निकलकर अधिकांश बच्चे ब्रांडेड  कंपनियों के बैग लेकर मार्केट में घुमने को मजबूर हैं .अवसर कम है तो प्रतियोगिता बढ़ेगी लेकिन जहाँ व्यवस्था में कुछ लोगों ने अपने लिए ऊँचे दर्जे का स्कूल हथिया लिया तो उसी व्यवस्था ने नौकरियों में आरक्षण के नाम पर प्रतिभाशाली बच्चो को बहार का रास्ता दिखा दिया .राईट टू एडुकेशन के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने एक रास्ता दिखाने की कोशिश की है .देश के तमाम निजी स्कूलों को अब अपने स्कूलों में २५ फिसद  गरीब बच्चों को जगह देनी होगी .ये बच्चे  अब रेगुलर क्लास में एड्मिसन के हक़दार होंगे .

अब  हर बच्चे को होगा शिक्षा का अधिकार ,यानी कोई भी माता पिता शासन से अपने एक से १४ साल के  बच्चो की पढाई लिखाई की व्यवस्था करने को कह सकता है . और यह  शासन की  जिम्मेदारी होगी कि उन बच्चो के लिए स्कूल की व्यवस्था कराये .शिक्षा बच्चों का मौलिक अधिकार है  ,यानि इस अधिकार को लागू करवाना सरकार की वाध्यता होगी.लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने सुविधासंपन्न आ सुविधाहीन के बीच दुरी ख़तम करने की कोशिश की है .देश पर लगे आरक्षण के कलंक को धोने के लिए कोर्ट ने एक उपाय सुझाया है .महज १० साल के लिए लागु आरक्षण व्यवस्था क्यों देश की नियति बन गयी ?क्यों इन ६४ वर्षों में कुछ लोग ४ पीढ़ी से आरक्षण की मलाई खा रहे है जबकि सुदूर गाँव में हजारो पिछड़े परिवारों ने तरक्की की रौशनी नहीं देखी है .वजह यही स्कूल है .ग्रामीण इलाकों में  फर्जी सर्व शिक्षा अभियान   कागजों पर स्कूलों की भरमार  दिखा रहा है और हजारों बच्चों को शिक्षित करने का दावा करता है .यानी एक साजिश देश के ८५ फिसद बच्चों को प्राथमिक स्कूली शिक्षा के दौर में ही प्रतियोगिता से बाहर कर देती है .राईट टू एडुकेशन स्कूल में एडमिशन की पैरवी जरूर करता है लेकिन शिक्षा में एकरूपता के सवाल पर चुप है

इस समय तकरीबन 23 करोड़ बच्चे है जिसे प्राथमिक शिक्षा की जरूरत है .इसमें से ४ करोड़ से ज्यादा बच्चे शिक्षा की इस कड़ी को तोड़कर मजदूरी मे लगे हुए है .यानि ४ करोड़ से ज्यादा बाल मजदूर अपने और परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी उठाये हुए है .लेकिन सरकार की यह जिद है कि इन तमाम बच्चो को स्कूल वापस लाये .यानी जिन परिवारों के रोजी रोटी का जरिया बाल मजदूर बन गए है उन्हें पहले भूख से आज़ादी दिलाये .लेकिन तमाम कड़े कानूनों के वाबजूद अगर बाल मजदूरी तेजी से फल -फूल रहे तो यह माना जायेगा की सरकार का यह क्रन्तिकारी फैसला भी एक दिन पानी मांगने लगेगा .नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ के सिर्फ चार जिलों ५० हजार से ज्यादा बच्चे स्कूल से दूर हैं .ये अलग बात है की सरकारी स्कूलों को श्री श्री रविशंकर नक्सालियों का ब्रीडिंग ग्रौंड मानते है .

एक अनुमान के मुताबिक शिक्षा के इस अधिकार की बात को जमीन पर उतरने के लिए सरकार को तकरीबन २ लाख करोड़ रूपये जुटाने होंगे .इस मद मे वित् आयोग ने २५००० करोड़ रूपये राज्यों को देने की बात की थी  ताकि इस कानून को सख्ती से लागु किया जा सके .लेकिन सवाल यह उठता है कि सरकार के पास स्कूल  नहीं है , .स्कूल है तो अध्यापक नहीं है फिर इस कानून का क्या होगा .जहाँ सरकारी स्कूल नहीं है तो क्या शिक्षा के अधिकार के जोर पर खेतान ,डीपीएस ,गोयनका ,जेविर्स ,टगोर जैसे नामी गिरामी स्कूल में बच्चों का एड्मिसन दिलाकर समस्या का समाधान निकला जा सकता है ..आज तमाम बड़े उद्योग पतियों के लिए स्कूल एक बड़ा कारोबार है .जिसके जरिये इनके  स्कूल शिक्षा नहीं, ख्वाब बेचते है .जहाँ माता पिता को यह आश्वस्त किया जाता है कि तुम पैसे दो बदले मे तुम्हारे  बच्चे को गाड़ी और बंगले वाली नौकरी मिलेगी शहरों में अल्प आमदनी के लोग भी अपने तनख्वाह का  आधी से अधिक हिस्सा अपने एक बच्चा पर खर्च करता है .इस उम्मीद से कि अंग्रेजी स्कूल से पढ़कर उनका बच्चा एक हैसियत वाली नौकरी जरूर पा लेगा .गरीब अभिवावक को  इस बात का एहसास है कि अंग्रेजी की ताक़त से बच्चा  सम्माननीय जिन्दगी जरूर जी लेगा .औसतन भारतीय के इसी सम्मानीय जिन्दगी की चाहत को प्राइवेट स्कूलों ने  कैश किया है .गाँव से लेकर शहरों तक तथाकथित अंग्रेजी स्कूलों की बाढ़ आ गयी लेकिन गरीब बच्चो के लिए स्कूल नहीं खुल सके .
मिड डे मील की सरकारी योजना ने ग्रामीण इलाके मे बच्चो को स्कूल आने के लिए प्रेरित किया लेकिन
केंद्र सरकार की स्कीम शिक्षा की गुणवत्ता की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ दी .
सवाल यह है कि देश का संविधान हर किसी के मौलिक अधिकार की रक्षा की पूरी गारंटी देता है .भारत के न्यायलय जागरूक पहरेदार की तरह इन अधिकारों की रक्षा के लिए तत्पर है तो क्या कल लोग अपने बच्चो के स्कूल दाखिले के लिए अदालत के दरवाजे खटखटाएंगे .क्या जो लोग भूख के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद नहीं कर पाए वे लोग अब अपने बच्चो के स्कूल के लिए आवाज उठाएंगे ? सुप्रीम कोर्ट गरीब बच्चो के लिए आरक्षण का निर्देश दिया है .लेकिन जहा सिर्फ २००० रूपये में गरीबी का प्रमाण पत्र लिया जा सकता है वहां असली गरीब का क्या होगा  .फिर इसका समाधान क्या हो ? इसका समाधान कभी रूस ने ढूंढा था ,वहां सभी बच्चे सरकारी स्कूलों मे पढ़ते है .वहां हर बच्चे का एक ही स्कूल ड्रेस है ,एक ही पाठ्यक्रम है .यानि प्रतिभा को उभारने का प्रयास हर को मिला हुआ है .सरकार अगर शिक्षा के अधिकार से सबको खुश करना चाहती है तो क्या  हर को समान अवसर की गारंटी देगी ?.क्या जिन बच्चो ने सरकारी स्कूलों मे तालीम ली है उसे कभी प्राइवेट स्कूलों के समक्ष खड़ा कर पायेगी? .शिक्षा मे आमूल चूल परिवर्तन लाने के कपिल सिब्बल के इरादे पर शंका नहीं जाहिर किया जा सकता लेकिन सिबल  साहब के साथ दिक्कत यह है कि उन्होंने शहरी चकाचोंध और प्राइवेट स्कूलों की शिक्षा देखी है ,उन्होंने उन हजारो बच्चो का दर्द नहीं देखा है जिन्होंने ४-५ कि मी दुरी रोज तय करके स्कूली शिक्षा पूरी की है ,जिन्होंने आधे पेट खाए अपनी पढाई जारी रखी. लेकिन इस पढाई के बाद भी अगर ये एक छोटी नौकरी लेने के लायक नहीं हो पाए तो इसमें उनका क्या दोष था ?.क्या इस व्यवस्था की खामियों को माननीय न्यायलय दूर कर पाएंगे क्या इस देश की शियासत अदालत के बताये रास्ते पर चलने को तैयार होगी ?


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