अन्ना के आन्दोलन से आम आदमी का घटता सरोकार ?


हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

"अन्ना नहीं यह आंधी है ,मुल्क का दूसरा गाँधी है ".राजधानी दिल्ली स्थित जंतर मंतर  के हालिया धरने के बारे में इस बार कहा जाने लगा है कि "जंतर मंतर छू मंतर". यानी अन्ना का जादू इस दौर में ख़तम हो चूका है .जे पी के सम्पूर्ण क्रांति के बाद पहलीबार अन्ना ने इस देश में जनांदोलन से नयी  पीढ़ी  का परिचय कराया था .पिछले साल   महज दो दिनों के अंदर जंतर मंतर ने  तहरीर चौक का रूप ले लिया था . अन्ना हजारे का आमरण अनसन राष्ट्रव्यापी आन्दोलन बन गया था  .हर शहर के चौक चौराहे पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों की उमड़ी भीड़ सरकार को यह बता रही थी ,कि सब्र का पैमाना अब टूट चूका है .तो क्या  इस बार अन्ना के अनोलन से लोगों का मोहभंग हो चूका है ? मिडिया में  खबर के नाम पर बार बार लोगों की मौजूदगी पर सवाल उठाया  जा रहा है,भीड़ नहीं जुटने की वजह लोगों की बेरुखी बताया जा रहा है . तो क्या यह माना  जाय कि पिछले साल यह जन आन्दोलन मिडिया प्रायोजित था इस बार इसे वही मीडिया फ्लॉप साबित करने में लगा है .सरकार की ओर से यह बताने की कोशिश की जा रही है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के प्रयास से लोग  संतुष्ट है लेकिन अन्ना की टीम बार बार इन धरनों से लोगों को गुमराह कर रही है .

देश में फैले भ्रष्टाचार से हर कोई चिंतित है निवर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह ने देश के नाम अपने आखिरी सन्देश में भ्रष्टाचार को सबसे बड़ी बीमारी बताया तो मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब बाबू अपने पहले संबोधन में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की बात की .ये अलग बात है की सत्ता और शासन में रहते प्रणब मुखर्जी भ्रष्टाचार रोकने के लिए चिंतित नहीं हुए लेकिन महामहिम की कुर्शी ने उन्हें नयी  जिम्मेदारी का एहसास कराया है .सवाल यह की देश का राष्ट्रपति अपने आखिरी भाषण में भ्रष्टाचार के को लेकर संजीदा दीखता है लेकिन अपने कार्यकाल में कमोवेश सरकार के हर फैसले को जायज ठहरता है .ऐसे में  देश अपने राष्ट्रपति या प्रथम नागरिक से क्या उम्मीद कर सकता है .एक उम्मीद अदालत पर ठहरती है लेकिन जहाँ मामले की अंतहीन सुनवाई की प्रक्रिया 50 रूपये घूस लेने वाले व्यक्ति  को 70 साल की उम्र में 6 महीने की सजा सुनाता है लेकिन देश के संचित अरबो -खरबों रुपया डकार लेने वाला व्यक्ति  कभी सजा नहीं पाता  है .वजह कोर्ट की अकर्मण्यता नहीं वजह कानूनी दावपेच नहीं ,वजह वह जाँच व्यवस्था और एजेंसी है जो मामले को सुलझाता नहीं बल्कि उलझता है और दोषी बेदाग निकलता है .58 करोड़ रूपये के बोफोर्स घोटाले के दोषियों को सजा दिलाने के नाम पर 200 करोड़ रूपये खर्च किये गए लेकिन एक भी दोषी को सजा नहीं दिलाई जा सकी .इस तरह के दर्जनों घोटाले सामने आये लेकिन शासन की अकर्मण्यता और अदालतों की जटिल प्रक्रिया ने दोषियों को कभी बेपर्दा नहीं कर सका .आज देश में हर छोटी बड़ी अपराध और भ्रष्टाचार में रजनीति बराबर का हिस्सेदार है इस हालत में भ्रष्टचार के खिलाफ मुहीम में सरकार और राजनितिक दलों से बहुत अपेक्षा नहीं की जा सकती .मायावती के बाद उत्तर प्रदेश में मुलायम को आना है और दोनों पार्टिया भ्रष्टाचार और अपराध के आकंठ में डूबी हुई है .यानी लोगों के पास विकल्प नहीं है या फिर उनके सामने विकल्प छोड़ा नहीं गया .व्यवस्था से लड़ने के लिए अन्ना एक विकल्प के रूप में उभड़े है लेकिन तमाम राजनितिक दल मिडिया और बुद्धिजीबी इस विकल्प को महज भीड़ के नाम पर ख़ारिज कर रहे है .

गांधी के इस देश में आम लोगों का सरोकार सरकार से कितना है इसे इस सन्दर्भ में समझा जा सकता है .केंद्रीय बजट के रूप में सरकार हर साल ११-१२ लाख करोड़ रूपये का लेखा -जोखा प्रस्तुत करती है .मुल्क की प्रान्तों की सरकार भी हर साल २३-२५ लाख करोड़ रूपये खर्च करती है .यानी जिस देश में सरकारें ३५-३७ लाख करोड़ रुपया खर्च करती हो और वहां की ७० फीषद आवादी की आमदनी २० रुपया हो तो यह माना जा सकता है कि मुल्क के राजनेताओ और नौकरशाहो ने दलालों के जरिये आम लोगों के हिस्से को लूट लिया है .सिर्फ उत्तर प्रदेश में राशन और सस्ते अनाज के वितरण में ४० हजार करोड़ का घोटाला हो ,एक खेल के आयोजन में ७५ हजार करोड़ रूपये का घोटाला हो ,कुछ तरंगे बेचने में मंत्री देश का १.५० लाख करोड़ का चुना लगा देते हो .सैनिको के लिए बनने वाले भवन को राजनेता अपने लिए हथिया कर इसे आदर्श घोटाला कह रहे हो .तो यह मान लेना चाहिए कि इस देश का विधान इतना लचर हो गया है इस देश का तथाकथित नेतृत्व इतना असंवेदनशील हो गया है कि उसे सरकारी खजाने की लूट की चिंता नहीं है क्योंकि उसे किसी भी सूरत में सरकार चलानी है .



सरकार का हर मंत्रालय देश के विकास दर को बढ़ाने  की जी तोड़ कोशिशे कर रहा है और सैकड़ो की तादाद में अभिषेक वर्मा पैदा कर रहा जो महज एक डील में देश का करोडो रूपये का बारा न्यारा कर देता है ..इसी विकास दर के बूते  पिछले १० साल में देश में १ लाख से ज्यादा अरब पति पैदा हुए है .दुनिया के अरबपतियो की सूची  में भारत का तीसरा स्थान है .ये अलग बात है युनायटेड नेशन ने गरीबी और भूख पर अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए भारत की हालत पाकिस्तान और बंगलादेश से भी जर्जर बताया है .काला धन पर सुप्रीम कोर्ट में चर्चा के दौरान यह बताया गया  कि देश का ५००० अरब रुपया विदेशो के बैंक में जमा है .इसके साथ यह भी कहा गया कि काला धन का यह पैसा देश में वापस आ जाय तो प्रति व्यक्ति कि हिस्सेदारी इसमें २ लाख से ज्यादा होगी .यकायक लखपति बनने का ख्वाव पाले मेरे जैसे लोग भले ही अन्ना की तरफ उम्मीद से टकटकी लगाये बैठे हो और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाये जाने की पैरवी कर रहे हों लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए की जिस व्यवस्था ने 65 वर्ष की आज़ादी के बाद भी अपने नौनिहालों को स्कूल नहीं भेज सका ,आधी आवादी को हस्पताल की सुविधा नहीं दे पाया .पीने के पानी के लिए जहाँ आज भी बड़ी तादाद में लोग संघर्ष करते हो   अपने ही .जल जंगल जमीन के लिए  मूल आदिवासी माओवादी बनते हो तो क्या इस व्यवस्था को बदलने  की बात कह कर अन्ना ने कोई अपराध किया है? दुष्यन्त कुमार के शब्दों में 
.हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।


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