बीजेपी का यह राष्ट्रवाद किस काम का

" द पार्टी विद  ए डिफरेंस " वाली बीजेपी ३६ साल की हो गयी है यानी ३६ साल के इस सफर में बीजेपी को श्यामा प्रसाद मुखर्जी ,दीनदयाल उपाध्याय ,अटल बिहारी वाजपेयी ,लाल कृष्ण आडवाणी जैसे प्रखर नेताओं का नेतृत्व मिला। लेकिन राष्ट्रवाद को लेकर जितनी चर्चा बीजेपी की आज है उतनी कभी नहीं हुई। कश्मीर में दो विधान दो निशान का विरोध करने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने क्या इसलिए बलिदान दिया था कि अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी कश्मीर में सरकार बना सके। क्या बीजेपी का यही राष्ट्रवाद था कि तिरंगा के सम्मान में खड़े नौजवानों को उनकी ही सरकार में पुलिस की बेरहमी का शिकार होना पड़े।
 आज अगर एन आई टी के नौजवान भारत की अस्मिता और तिरंगे के सम्मान के खातिर लाठी खा रहे है तो बीजेपी का यह राष्ट्रवाद किस काम का। भारत के टुकड़े टुकड़े होंगे और आज़ादी का नारा लगाने वाले जे एन यू के तथाकथित सेक्युलर नौजवानों को इसी देश के मीडिया और बुद्धिजीवी लोगों ने हीरो बनाकर पेश किया है लेकिन कश्मीर का वाकया न तो मीडिया के लिए और न ही बुद्धिजीवियों को शर्मसार कर रहा न ही सरकार इसमें ज्यादा प्रचार चाहती है। राज्य के साबिक़  मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्लाह आज सरकार को नसीहत दे रहे हैं कि इसे टैक्टफूली डील करना चाहिए था पुलिस की भूमिका नहीं होनी चाहिए थी।  यह वही अब्दुल्लाह है जिनकी हुकूमत में 112 बच्चे महज एक साल में पथ्थरवाजो और पुलिस के झड़प में मारे गए थे। वो आज उपदेश दे रहे है..  भारतमाता की जय और तिरंगा का सम्मान चुनावी मुद्दा नहीं हो सकता यह बीजेपी को अच्छी तरह पता है क्योंकि यह वही देश है जिसने श्यामा प्रसाद और दीनदयाल की कुर्बानी को एक हादसा से ज्यादा तब्ब्ज्ो नहीं दिया था। हलाकि जो कुछ भी बदलाव जम्मू कश्मीर में हुए वह श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान का ही नतीजा था।  एन आई टी के संघर्ष में भले ही बीजेपी कन्नी काट रही हो लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए बीजेपी में आदर्श श्यामा प्रसाद मुखर्जी ही रहेंगे। .सरकार सरकार खेल कर अमित शाह  आदर्श कभी स्थापित नहीं कर पाएंगे। ..

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