एक बार फिर लौट आओ कबीर

अब बिजनौर के जोगीरामपुरा के लोगों ने गांव छोड़ने की धमकी दी है ,वजह सुनना चाहेंगे ? स्थानीय मंदिर पर लाउडस्पीकर बजाना सख्त मना है (जिला प्रशाशन के आदेशानुसार )।क्योंकि  बहुसंख्यक मुस्लिम गाँव में हिन्दू मंदिर पर लाउडस्पीकर बजने पर कुछ लोग खून खराबे पर उतर आते हैं  लेकिन ,स्थानीय मस्जिदों के ऊँचे गुम्बद पर बंधे लाउडस्पीकरों से प्रशासन को कोई परेशानी नहीं है। यह उस कबीर के देश में हो रहा जिसने कठ्ठमुल्लाओं को चुनौती देते हुए कहा करते थे "कंकर पत्थर जोड़ी के मस्जिद लई  बनाई ,तो चढ़ी मुल्ला बांग दे ,क्या बहरे हुए खुदाय। कबीर हिन्दुओ को भी कहते थे पत्थर पूजे हरी मिले तो मैं पुजू पहाड़ ....भक्ति और आस्था ,जाति  और मजहब में बटे समाज को आईना दिखाकर कबीर ने  भारतीय संस्कृति में भक्ति और मोक्ष के लिए सबको आसान रास्ता बताया। आजतक किसीने कबीर की जात और मजहब नहीं पूछा। आज कल  कुछ विद्वान पत्रकार और लेखक कहते हैं उन्हें बहुसंख्यकवाद पसंद नहीं हैं। मैं कहता हूँ  उन्हें सच बोलने का साहस नहीं है ,उनसे अच्छा  भाँट है जो चारणगीत को अपना रोजगार मानता है लेकिन विदवान होने का दम्भ नहीं भरता । 

धार्मिक आस्था और विश्वास के मसले पर इस देश में कभी तकरार नहीं हुए। हमेशा संघर्ष अपने को श्रेष्ठ घोषित करने को लेकर हुआ है।  धर्म के नाम पर ठेकेदारी इसी व्यवस्था की देन है। बिजनौर के जिस गांव में जिला प्रशासन ने मंदिर से लाउडस्पीकर हटाया ,क्या उसी प्रशासन ने मस्जिदों से लाउडस्पीकर उतारे ? बिलकुल नहीं क्योंकि इसकी इजाजत तत्कालीन हुकूमत ने  नहीं दी थी। क्यों बिहार, उत्तर प्रदेश ,पश्चिम बंगाल ,झारखंड  जैसे राज्यों में कई जगहों पर पर  किसी पर्व त्योहारों में शोभा यात्रा निकालने और पूजा करने से इलाके की शांति व्यवस्था खतरे में पड़  जाती है ? और उसे रोक दिया जाता है। इसी तरह गौ रक्षा के नाम पर कुछ लम्पट लोग गौ रक्षक बन जाते है, इन्हे कोई पूछे  किसी प्यासी गाय को इन्होने कभी पानी पिलाया है या रोड पर पड़ी किसी जख्मी पशु को अस्पताल पहुंचाया है ? लेकिन यह बात भी समझना जरुरी है कि गौ हत्या कानूनन जुर्म है।   ये धार्मिक उन्माद इसलिए बढे है कि समाज ने सच बोलने और सुनने का साहस छोड़ दिया है। एक चीज किसी समुदाय के लिए सही और दूसरे समुदाय के लिए गलत नहीं हो सकता। हमारे राजनेताओं ने  अगर शाह बानो के मामले में सर्बोच्च न्यायलय का सम्मान किया  होता तो आज हर गली हर नुक्कड़ पर ट्रिपल तलाक को लेकर शोर नहीं सुनाई देता। 

इसके लिए हुकूमतों  पर भले ही लोग तुष्टिकरण का आरोप लगाते हों  लेकिन सच यह है कि इस तरह की अपीजमेंट से हुकूमत उसी समुदाय का नुक्सान ज्यादा करती है जिसके पक्ष में वह खड़ी दिखाना चाहती है। रोटी ,कपडा ,मकान ,शिक्षा यह सबकी बुनियादी जरुरत है ,लेकिन सियासत लाउडस्पीकर ,ट्रिपल तलाक ,मंदिर ,गाय में उलझी हुई है। हुकूमत अगर भावना को तरजीह दे रही है तो जानिये उसके पास विकास का कोई एजेंडा नहीं है। अगर धार्मिक नेता मजहबी जज्वात में समाज को उलझा रहा है तो उसे पूछे जाने की जरूरत है कि उसे यह हक़ किसने दिया है ? अगर कोई बुद्धिजीवी अपने को सेक्युलर राइटर होने का दम्भ भरे तो उसे यह पूछा जाना चाहिए कि केरल और पश्चिम बंगाल की हालात पर वह खामोश क्यों है ?आज इस देश को कबीर जैसे लेखक /पत्रकार की जरूरत है। @ विनोद कुमार मिश्रा 

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