एक बड़े सियासी बेईमानी का पर्दाफाश होने वाला है

आज़ादी के 70 वें सालगिरह पर एक बड़े सियासी बेईमानी का पर्दाफाश  होने वाला है। इस पर्दाफाश की चिंता ने सियासी तौर पर एक दूसरे के दुश्मन समझे जाने वाले लोगों को एक मंच पर ला दिया है। जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री अचानक अपने घोर विरोधी फ़ारूक़ अब्दुल्लाह से मिल रही है तो सी एम मेहबूबा मुफ़्ती कश्मीर के सियासी रहनुमाओ को गोलबंद कर रही है। चौंकिए नहीं ! संविधान की हिफाजत की दुहाई देते हुए हुर्रियत लीडर सैयद अली शाह गिलानी कश्मीर बंद का आह्वान कर रहे हैं ,कल तक कश्मीर के विलय पर ही सवाल उठा रहे थे। आखिर ये हंगामा क्या है ,किसने बड़पा है ? सवाल बहुत हैं लेकिन जवाब ढूंढने से पहले यह जानना जरूरी है :
1 . क्या आपको मालूम है जम्मू कश्मीर ऐसा एकलौता राज्य है जहाँ सैकड़ो वर्षो से रह रहे बाल्मीकि समाज के  लाखों लोगों  को झाड़ू उठाने /सफाई करने के अलावा कोई नौकरी नहीं मिलती। 
2. यह कि पिछले 70 वर्षों से राज्य में रह रहे लाखों लोगों को नागरिकता नहीं मिली है और न ही ये लोग सरकारी नौकरी और रासन कार्ड हासिल कर सकते 
3 . जम्मू कश्मीर से बाहर अगर बेटी ने शादी की तो उसकी नागरिकता ख़तम हो जाती है और उसके बच्चो को स्टेट सब्जेक्ट से बाहर मना जाता है। 
4 . जम्मू कश्मीर के लोग भारत में कही भी अपनी नागरिकता का उपयोग कर सकते हैं ,सम्पति और सरकारी नौकरी पा  सकते हैं, लेकिन भारत का कोई व्यक्ति जम्मू कश्मीर में ऐसी सुविधा नहीं ले सकता। 
5 . राज्यों को मिलने वाले अनुदान में जम्मू कश्मीर का स्थान उत्तर प्रदेश और बिहार से भी ऊपर है ,लेकिन सरकारी पैसे के दुरूपयोग /उपयोग की जाँच सी ए जी नहीं कर सकती। 

वजह सत्ता पर कुछ लोगों का कब्ज़ा ज्यादा है। वजह एक खास क्रीमी लेयर का ही मतलब  जम्मू कश्मीर होता है। अगर ऐसा नहीं है तो मेहबूबा क्यों कहती है कि अगर धारा 370 हटा तो कश्मीर में तिरंगा ढोने वाला कोई नहीं बचेगा। मानो तिरंगा ढोने के घूस में इस देश ने उन्हें आर्टिकल 35 A का संजीविनी दे रखा है। वो जब तक चाहें सत्ता का आनंद ले सकती हैं। बड़बोले फ़ारूक़ साहब कहते हैं अमरनाथ जमीन विवाद वाली हालत हम फिर ला देंगे। गिलानी साहब इसे कश्मीर की अस्मिता से जोड़ते हैं। लेकिन सवाल यह है बहु भाषी और मजहबो वाले इस कश्मीर में सिर्फ इन्ही तथाकथित बादशाहों स्टेट सब्जेक्ट में इतना इंटरेस्ट क्यों  है। 
जाहिर है अब  सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से यह जानकारी मांगी है कि जब आर्टिकल 370 अस्थायी व्यवस्था थी ,जिसे जम्मू कश्मीर के संविधान सभा की बैठक तक लागू की जा सकती थी ,उसे अबतक क्यों चलाया जा रहा है ? सवाल यह भी है कि जिस प्रेसिडेंशियल रेफ़्रेन्स का हवाल देकर संविधान संशोधन करके  एक कानून आर्टिकल 35 ए को संविधान में लाया गया। क्या उसे कभी संसद में लाया गया ? अगर यह संविधान की व्यवस्था में आर्टिकल 368 का अनुपालन है तो इसकी मंजूरी संसद के दोनों सदनों में जरूरी थी। इसलिए मैंने पहले ही कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के पास सवाल बहुत हैं और उसके जवाब देने के लिए भी भारत की जनता की गाढ़ी कमाई को जम्मू कश्मीर की सरकार वकीलों पर खर्च करेगी  जो माहौल और इतिहास में तर्क गढ़ेंगे और कोर्ट को संतुष्ट करने की कोशिश करेंगे लेकिन ऐसे लोगों की पैरवी कौन करेगा जो अपने ही देश  के एक राज्य में रंगभेद और अश्पृश्यता का दंश झेल रहे हैं। 
तो क्या यह माना जाय कि एक सियासी बेमानी में कश्मीरी लीडरान  ने अपने ही वासिंदों का वर्षों से शोषण किया है। क्या भारत का नेतृत्व इसलिए इस बेमानी को नजरअंदाज करता रहा क्योंकि उसने जम्मू कश्मीर को एक समस्या माना और इस व्यवस्था को हालत पर छोड़ दिया ? लेकिन इस देश को पहलीबार अमरनाथ श्रयान बोर्ड विवाद मामले में शर्मिंदगी देखनी पड़ी।फ़ारूक़ अब्दुल्लाह  2008 के अमरनाथ जमीन विवाद का हवाला दे रहे हैं और इसे अपनी जीत बता रहे हैं लेकिन लोगों को यह याद दिलाने की जरूरत है कि जिस कश्मीर पर उनके खानदान ने 60 वर्ष से ज्यादा हुकूमत की वहां एक गरीब बाल्मीकि के बच्चों को उच्च शिक्षा नहीं मिल पायी कोई सरकारी नौकरी नहीं मिली। अनुसूचित जाति को आरक्षण नहीं मिला क्योंकि वह हिन्दू था। क्यों अबतक लाखों तीर्थ यात्रियों को कपकपाती ठंढ में एक अस्थायी सराय नहीं मिल पाया क्योंकि वे हिन्दू तीर्थयात्री हैं  जो हजारो फ़ीट की दुर्गम चढ़ाई करके बाबा अमरनाथ का दर्शन करने जाते हैं। 2004 में दर्शनार्थियों से करोडो की कमाई करने वाले अमरनाथ श्रयान बोर्ड ने राज्य सरकार से यात्रियों के अस्थायी विश्रामशाल के लिए जमीन मांगी थीं। जिसे राज्य सरकार ने दे भी दी। चूँकि यह दो सरकारी विभागों का मामला था इसलिए इसे आर्टिकल 370 के चश्मे से नहीं पढ़ा गया। लेकिन  हिन्दू दर्शनार्थी को मिलने वाली सुविधा को लेकर फ़ारूक़ अब्दुल्लाह की पार्टी ने आंदोलन चलाया जिसका साथ बाद में पी डी पी ने भी दी और गिलानी ने इस आग को हवा देकर गुलाम नबी आज़ाद सरकार को 2008 में पट्टा रद्द करने के लिए मजबूर कर दिया । तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस सरकार गुलाम नबी आज़ाद को मजबूती देने के बजाय उसे अपनी मौत मरने के लिए  छोड़ दिया था। लेकिन आज हालत अलग है।  

पिछले 30   वर्षों से पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ अघोषित  छेड़ रखा है इन वर्षों में हमारे ९०  हज़ार से ज्यादा लोगों की जान गयी है .  इस छदम युद्ध में हमारे २०  हजार से ज्यादा जवान मारे गए ,लेकिन कश्मीर के अलगाववादी मालामाल होते रहे, मानो आतंकवाद ने उन्हें खजान दे दिया हो।   यह बात पाकिस्तान भी जानता  था  कि  भारत एक ऐसा सोफ्ट स्टेट है जिसके पास कारवाई करने की न तो कोई राजनितिक इच्छाशक्ति है, न ही उनमे एक संप्रभु राष्ट्र का जज्वा । सॉफ्ट  स्टेट के रूप में देश को अबतक एक लचर , ज्यादा विवेकशील  और कुछ ज्यादा ही धैर्यवान लीडर  से पाला पड़ा है।    जाहिर है  भारत को एकतरफा नुकशान  उठाना पड़ा है ।  लेकिन प्रधान मंत्री मोदी की व्यक्तिगत छवि कुछ मिथक को तोड़ती है लेकिन काबिले तारीफ़ की बात यह है कि आज देश के सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे गंभीर मामला मानते हुए लार्जर बेंच  में सुनवाई की पहल शुरू की है जो यह तय करेगा जम्मू कश्मीर का सरोकार भारत से हज़ारो साल पुराना है या आर्टिकल 370 ही यह तय करेगा कि परमानेंट कौन है जो शायद इस धरती पर कोई  नहीं है।

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