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किस पाकिस्तान से लड़े हम ?

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मीडिया में पाकिस्तान को लेकर हाहाकार मचा है। विपक्षी पार्टिया पीएम मोदी के  सीने  का साइज पूछ रही है। देश के मीडिया  एक्सपर्ट सरकार को युद्ध का एलान करने को उकसा रहे हैं। देश को चाहिए एक और सर्जिकल स्ट्राइक किस पाकिस्तान पर ? जिसका आज  न कोई भूगोल है न इतिहास। यकीन मानिये जिस वज़ीरे आज़म इमरान पर भारत का मीडिया गोले दाग रहा है उसकी हैसियत इस्लामाबाद के मेयर से ज्यादा नहीं  है और जो प्रधानमंत्री इमरान खान सऊदी अरब पर किसी भी आक्रमण का मुहंतोड़ जवाब पाकिस्तानी फ़ौज देगी का दम्भ भर रहे हैं  उस पाकिस्तानी फ़ौज  ने आजतक अपने 60 फीसद भूभाग पर पाकिस्तानी हुकूमत के कब्जे बहाल नहीं कर सकी वहां आज भी किसी कबीले या फिर आतंकवादी तंजीम का कब्ज़ा है।  यानी आज की तारीख में पाकिस्तानी फ़ौज और हुकूमत का रिट महज 40 फीसद भूभाग पर है। पिछले साल पेशावर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा था कि कोर्ट के फैसले का दायरा सिर्फ 10 कि मी तक है बाकी किसकी सत्ता है नहीं मालूम।
यह वही पाकिस्तान है जहाँ इमरान खान पी एम हाउस के गाड़िया ,कारें यहाँ तक की भैश की भी नीलामी कर रहे हैं और सड़क पर खड़ा अवाम तालियां बजा रहा है। भारत ऐसे …

जात न पूछो साधु की ,जात न पूछो गरीब की

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कौन कहता है आसमा में सुराख नहीं हो सकता ... सन्नाटे को चीरते हुए ,रात के 12 बजे मैं अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहा था ऑटो ड्राइवर ब्रजेश सिंह ने मुझे टोका सर ! मैं कभी किसी से नहीं उलझता ,अपना सपना कुछ अलग है। मुझे लगा शायद ड्राइवर अभी भी रेलवे स्टेशन पर अपने दूसरे ऑटो ड्राइवरस के साथ हुई झड़प से आहत है। सर ,नीट के मेडिकल टेस्ट में मेरी बेटी 68 फीसद मार्क्स लाई थी ,इस बार कौन्सेलिंग में उसे  कोई सीट नहीं मिली। लेकिन अगली बार जरूर निकाल लेगी। जनरल कोटे में नहीं होती तो इसबार ही टॉप कॉलेज मिल जाता। कहाँ पढ़ती है ? मैंने पूछा ,दोनों बेटियां कोटा में कोचिंग ले रही है ब्रजेश सिंह  की बात सुनकर मैं उछला ,कोटा, राजस्थान में। हाँ सर ! उसके आत्मविश्वास ने मुझे बौना बना दिया था। हिंदुस्तान के अमूमन हर गरीब व्यक्ति का लगभग यही संघर्ष है जो अपने लिए ,अपने बच्चों के लिए सपना देखता है ,गरीबी को हराना चाहता है। मुजफ्फरपुर के ब्रजेश सिंह की  दो बेटियां है। ज़िद  है कि दोनों बड़ा डॉक्टर बने। जिद है कि बेटी आगे बढे। लेकिन इसी समाज में कुछ लोगों की यह जिद क्यों है कि उनके अस्तित्व पर पिछड़ा /दलित  का चस्पा लगा रहे…

ग्रामीण भारत में नक्सली हिंसा का सूत्र राजधानियों में ढूंढिए ...

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अर्बन नक्सल पर मेरा प्रकाशित ब्लॉग (25 /04 / 2010 )
झारखण्ड के पूर्व विधानसभा स्पीकर और मौजूदा सांसद इन्दर सिंह नामधारी ने झारखण्ड सरकार को यह सुझाव दिया था कि " एक साल तक झारखण्ड मे सारे विकास के काम रोक दिए जाय .सरकार और मीडिया मे इसका माखौल उड़ाया गया था . नामधारी जी की यह दलील थी की आदिवासी इलाके में विकास के नाम पर जो पैसे का बंदर बाट हो हैं , उसमे सबसे ज्यादा फायदा नक्सालियों को ही हो रहा है। सरकार की हर योजना में नक्सलियों का 30 % मिलना कॉन्ट्रैक्ट में तय है. यानि नक्सली आन्दोलन को बढ़ने से रोकना है तो उसके फंडिंग के इस सुलभ तरीके को रोकने होंगे " .सरकारी पैसा ,सरकारी हथियार लेकिन नक्सलियों के निशाने पर आम लोग और सरकार। कभी आई पी एल के बारे मे गृहमंत्री चिदम्बरम ने कहा था कि कुछ चलाक लोगों ने क्रिकेट को मनोरंजन के चासनी मे डाल कर इसे एक फ़ॉर्मूला बना दिया है .लेकिन नक्सल आंदोलन में कुछ बुद्धिजीवियों के कुशल प्रबंधन को समझने मे वे अब तक नाकाम रहे है। दंतेवाडा नक्सली हमले से आह़त गृह मंत्री ने एक बार फिर नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई है .पिछले म…

"सबका साथ सबका विकास " कश्मीर में क्यों नहीं ?

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पिछले 18 वर्षो में कश्मीर आने वाले फॉरेन टूरिस्ट की तादाद 3 लाख 60 हज़ार है जबकि इसी दौर में बिहार आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या 40 लाख से ज्यादा थी। लेकिन फ़ारूक़ अब्दुल्लाह और मेहबूबा मुफ़्ती को कश्मीर में और ज्यादा  ऑटोनोमी चाहिए तो हुर्रियत के लीडरों को आज़ादी। सनद रहे कि जम्मू कश्मीर में टूरिज्म सबसे बड़ी इंडस्ट्री है और रोजगार का जरिया भी । सांख्यकी विभाग के आंकड़े में कुछ तथ्य और जोड़ लें . पिछले 18 वर्षो में माता वैष्णो देवी के दरबार में जाने वाले देशी श्रद्धालु की तादाद 12 हज़ार से बढ़कर 1 करोड़ हो गयी है। हर साल 10 लाख से ज्यादा रजिस्टरड -अन्रेजिस्टरड दर्शनार्थी बाबा अमरनाथ जी गुफा पहुंचते है। और ये श्राइन सरकारी ट्रस्ट के अधीन है और सबसे ज्यादा पैसा रियासत की तिजोरी में डालती है। शायद आपको यह भी पता होगा देश के सभी राज्यों से ज्यादा अनुदान जम्मू कश्मीर को मिलता है वो भी फ्री। 
लेकिन सियासत ऐसी कि जम्मू कश्मीर के लाखो दलित परिवारों को सिर्फ यह पता है कि अंबेडकर ने भारत का संविधान बनाया था लेकिन यहाँ  दलित के बच्चे सिर्फ सफाई का काम कर सकते है। उनके बच्चे  अपने ही देश में आरक्षण क…

मोदी आज सबसे बड़े गांधीवादी और कांग्रेसी हैं ?

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आईडिया ऑफ़ इंडिया क्या है ? वह जो अंग्रेजी दा लेखकों और बुद्धिजीवियों के बीच बार बार चर्चा होती है। या फिर सोशल मीडिया पर  विचारो की बाढ़ या फिर कुछ छुट्ठा पत्रकारों के प्रोपगैंडा से देश बदलने की कबायद। सरल भाषा में समझे तो आईडिया ऑफ़ इंडिया "जिओ " नेटवर्क है जो देश में हर आम और खास को काम पर लगा दिया है या फिर राहुल गांधी का देश गाथा /मोदीनामा  जिसे लेकर वे देश -विदेश में विख्यात हो रहे है। लेकिन एकबार इस  आईडिया ऑफ़ इंडिया में  2014 की कश्मीर में आयी बाढ़ या फिर हालिया केरल की बाढ़ को समझे तो आईडिया ऑफ़ इंडिया से बेहतर आपको भारतीयता समझ आएगी। यह भारतीयता एन डी आर एफ टीम के सदस्य जैसल के पी को बेहतर पता है जिसने अपने पीठ को सीढ़ी बनाकर महिलाओ ,बच्चों और बुजुर्गो को नाव पर चढ़ने में मदद की थी । सेना के वो हजारो जवान ,स्वयं सेवी संस्थानों के हजारो स्वयसेवक हजारो  लोगों को सहारा देने देवदूत की तरह सामने आये और उनकी जिंदगी को दुबारा पटरी पर लाने में मदद की। केरल हो या कश्मीर आपदा की स्थिति में इस  देश के लोगों ने हमेशा बढ़चढ़कर हाथ थामने का काम किया है बगैर आईडिया ऑफ़ इंडिया का लेक्चर सुने…

खुशफहमी कुछ देर के लिए ही सही पालने में दिक्कत क्या है ?

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इमरान अहमद खान नियाज़ी पाकिस्तान के 22 वे प्रधानमंत्री के रूप में काबिज हो चुके हैं। लगातार 26 साल के सियासी जद्दोजेहद के बाद इमरान खान ने  अंदर बाहर का समर्थन जुटा कर एक नया पाकिस्तान बनाने का अज्म दुहराया है। लेकिन यह देखना अभी बाकी है कि वजीरेआजम इमरान खान की सत्ता बहैसियत इस्लामाबाद के मेयर तक ही रहेगी या फिर उनका हुक्म  रावलपिंडी में भी सुना जायेगा। सवाल ज्यादा हैं  जवाब कम। अल्लाह ,आर्मी और अमेरिका के भरोसे पाकिस्तान अपने अस्तित्व बचाने  की कोशिश में हर हथकंडा अपनाता रहा है लेकिन आज पाकिस्तान  जिस  मोड़ पर खड़ा है उसमे एक रास्ता जरूर तय करना होगा। वह रास्ता या तो  अमन का होगा जिसमे भारत के साथ दोस्ताना ताल्लुकात बढाकर मुल्क में रोजगार और कारोबार की नयी शुरुआत होगी और एक नया पाकिस्तान बनेगा  या फिर चीन की कठपुतली बनकर सिर्फ  फ़ौज के एजेंडे को ढोएगा। 
भरी दुपहरी में अँधियारा ,सूरज परछाई से हारा अंतरतम का नेह निचोड़े ,बुझी हुई बाती सुलगाएँ आओ फिर से दिया जलाएं।। अटल बिहारी वाजपेयी  
1999  से लेकर 2004  तक भारत -पाकिस्तान के रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने में पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने…

क्या वाजपेयी फिर नहीं आयेंगे" ?

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"क्या वाजपेयी फिर नहीं आयेंगे" ? हानि लाभ के पलडो में ,तुलता जीवन व्यापर हो गया .!
मोल लगा विकने वालों का ,बिना बिका बेकार हो गया !
मुझे हाट में छोड़ अकेला ,एक एक कर मीत चला
जीवन बीत चला ....
एक दार्शनिक -राजनीतिग्य अटल बिहारी वाजपेयी जीवन के 93 वे वसंत पूरा कर इन दिनों जिंदगी के अखिड़ी पड़ाव पर खड़े हैं ।राजनीती के अखाड़े में अपनी प्रखर बौधिक क्षमता की बदौलत अटल जी 50 साल तक निरंतर अजेय रहे। अपने सिधान्तो लेकर वे हमेशा अटल रहे ..
हार नहीं मानूँगा,
रार नहीं ठानूँगा,
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ।
गीत नया गाता हूँ। .गैर कांग्रेसी सरकार के वे पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने 6 साल देश के शासन की जिम्मेदारी संभाली और देश के आर्थिक प्रगति खासकर संचार और सड़क निर्माण से देश के गाँव को जोड़ने में अटल जी का योगदान इस सदी का सबसे बड़ा संचार क्रांति माना जा सकता है। .संवाद और संपर्क अटल जी के विकास दर्शन में शामिल थे और यही दर्शन उनके शासन काल में आदर्श बना। हजारो -लाखो लोगों के लिए यह वाकई कर लो दुनिया मुठ्ठी में का व्यवहारिक पाठ था। यही वजह है की भारत में संचार क्रांति और सड़क निर्माण का जो सिलसिल…

आज़ादी के 70 साल : देशवासी होने का कुछ कर्तव्य भी है

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आज़ादी के 70 साल ! और भारत ,कई दृष्टिकोण कई नजरिया ! ठीक वैसा ही जैसे सात अंधो ने एक हाथी के बारे में अपनी राय दी थी ,किसी ने हाथी को विशाल दीवार जैसा ,किसी ने उसके कान को छूकर  बड़ा पंखा जैसा जानवर बताया। . अपने अनुभव से सबने हाथी का सही आकर बताया  था लेकिन समग्रता में ही इनके अनुभव को हाथी कहा जा सकता था। आज़ादी के 70 साल में देश ने काफी तरक्की की है ऐसी तरक्की की आज हर भारतवासी चलता फिरता "प्रेस" हो गया है और हर कोई अपनी राय सार्वजानिक कर रहा है। यही तो था आज़ादी का संकल्प जिसके लिए गाँधी महात्मा बने और हज़ारो ने अपने प्राणो की आहुति दी। लेकिन एक सवाल यक्ष प्रश्न बनकर आज भी खड़ा है कि आर्थिक आज़ादी के बगैर राजनितिक आज़ादी या मुहं खोल कर किसी को गरियाने की आज़ादी सार्थक है ? आपका जवाब जो भी हो लेकिन एक राष्ट्र के रूप में आज़ादी के नाम पर मीडिया-सोशल मीडिया  में बे सिर -पैर का शोर ने आज़ाद भारत की  छवि को  धूमिल किया  है। 

मौलिक अधिकारों  को लेकर रात में भी अदालत लगवाने वाले लोग कभी संविधान के  मौलिक कर्तव्यों को लेकर कोर्ट गए हैं ? तो क्या आज़ादी का मतलब आज सिर्फ सत्ता पर कायम होना और…

मीडिया : हम भी हैं पत्रकार

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कुत्ता पालो ,बिल्ली पालो ,कुछ भी पालो लेकिन गलतफेहमी मत पालो। दरअसल टीवी मीडिया में सम्पादकों ने अपने को लार्जर देन लाइफ पेश कर अपने को सेलिब्रेटी बना लिया है। और इस ग़लतफ़हमी में कुछ टीवी संपादक /एंकर ने जीने की आदत डाल ली है कि वे जब कुछ बोलते हैं तो पूरा देश सिर्फ उन्ही को सुन रहा है। मानो देश इतनी फुर्सत में है कि लोग या तो टीवी देखते हैं या सिर्फ सोशल मीडिया पर एक्टिव है। कोई गला फाड़ के चिल्ला रहा है तो कोई फ्लोर डांस करते हुए अलग अलग भाव में खबर बेच रहा है तो कोई संपादक उपदेशक की मुद्रा में देश को स्कूली बालक समझ कर एजेंडा परोस रहा है। हालात यह है कि संपादक /एंकर और पार्टी प्रवक्ता में विभेद करना मुश्किल है। गाँधी जी ने कहा था स्वस्थ , जांची परखी सूचना ,संतुलित आलोचना सार्बजनिक जीवन में ओज़ोन लेयर का काम करती है। जाहिर है इस कसौटी पर आज एक भी संपादक खड़े नहीं उतर पाएंगे। कारण संस्थागत कम व्यक्तिगत ज्यादा है। आपातकाल के निर्णय को कभी सही बतानेवाले महान संपादक खुशवंत सिंह को अपने ऑफिस घुसने की इजाजत गार्ड ने नहीं दी और उन्हें बताया गया कि उनकी सेवा समाप्त कर दी गयी है। ऐसी स्थित गिरि…

चुनावी एजेंडे में गुम हो रही है नए भारत की कहानी

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आज के दिन देश के 4 लाख गाँव खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं। अबतक देश के 417 जिले और 19 राज्यों ने भी खुले में शौच से मुक्ति का एलान कर दिया है।  भारत के लगभग 90 फीसद भूभाग पर स्वच्छ भारत अभियान ने किला फतह कर लिया है। लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि इसमें सरकार के 12000 रूपये से ज्यादा सहयोग 95  वर्ष की कुंवर बाई  की है जिसकी प्रेरणा से उनका  पूरा गाँव ओ डी एफ हो गया। बिहार के सीतामढ़ी के गाँव में 12 -15 साल  क़े किशोरों की टोली ने सीटी बजाकर  लोगो को खुले में शौच जाने की गन्दी आदत को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। वही डीएम रंजीत कुमार जिले में  स्वच्छाग्रही बनकर हर घर में शौचालय निर्माण को संभव बनाया। सुबह सवेरे सड़क के किनारे गश्त लगाकर बैठे डीएम को लोगों ने भले ही न पहचाना हो लेकिन बिहार के इस पिछड़े जिले में लोगों ने उनकी बात सुनी और सीतामढ़ी बिहार का पहला ओ डी  एफ  जिला बन गया । ऐसे अनेको कहानियाँ है जिसने स्वच्छ भारत अभियान को विश्व का सबसे असरदार  बेहेवियर चेंज का  आंदोलन बना दिया है उसमे आपके घर के बच्चों का भी योगदान है । लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया में किसी टूटे हुए शौचालय  और कचरे…

कश्मीर मसला या पावर शेयरिंग फार्मूला

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यह सवाल आम हिंदुस्तानी के मन में जरूर उठता है कि कश्मीर का मसला क्या है। जितना मैं समझ पाया हूँ कि वर्षो पहले कुछ नेताओं ने जो गांठ हाथों से लगायी थी मौजूदा पीढ़ी को वह गांठ दातों से खोलना पड़ रहा है। भारत के सबसे प्राचीन ऐतिहासिक ग्रन्थ राजतरंगनी के रचयिता कल्हण को भी शायद इस बात का इल्म नहीं रहा होगा कि जिस कश्मीर के चश्मे से वे भारत की सामजिक और राजनितिक व्यवस्था को झांक रहे हैं वह कश्मीर कभी अपने को अलग सामाजिक संरचना मानकर भारत की अस्मिता पर सवाल उठाएगा । या फिर 14 वी शदी के ऋषि परंपरा में कश्मीर के शेख उल आलम या नुंद ऋषि हो या फिर लल डेड या लल्लेश्वरी। भारत को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत करके कश्मीर के महान सूफी संतो और ऋषियों ने मजहबी दकियानूसी को हमेशा ख़ारिज किया। फिर वह कौन सा दौर था जिसमे कश्मीर की हजारो साल की परंपरा गौण हो गयी और व्यक्तिगत महत्वाक्षा ने कश्मीर को मसाला बना दिया। हालात यह है कि जावेद अहमद डार ,औरंगजेब ,उमर फ़ैयाज़ जैसे दर्जनों कश्मीरी नौजवान देश की अस्मिता की रक्षा में जान दे रहे हैं वही उसी कश्मीर में कुछ नौजवान बुरहान वानी बन बन्दुक उठा रहे है तो कुछ नौजवानो…

सामाजिक न्याय के नए युवराज और ग्राम स्वराज

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बाबा नागार्जुन का  जन्मदिन 30 जून किसके लिए महत्वपूर्ण है किसके लिए नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है लेकिन आज़ादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी गाँव ,गरीब ,मजदूर की हालत कितनी  बदली है यह आज भी एक बड़ा सवाल है। 50 साल पहले बाबा जिस सिस्टम की बात अपनी कविता में कर रहे थे  वह कितना बदल पाया है :
सपने में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,
भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे!
माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का,
हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का!
मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को ... तो क्या  गाँव सचमुच आज भी  मेहनतकश किसान /मजदूरों को  दो जून की रोटी जुटाने की जुगत नहीं जोड़ पाया। मौजूदा सरकार की ग्राम स्वराज अभियान ने कमोवेश इसी सच से पर्दा उठाने का काम किया है।
जिला रोहतास का प्रखंड नौखा ,दिल्ली से आये नोडल ओफिसर अत्यानन्द  गांव वालो से पूछते है कितने लोगों को अबतक घर नहीं मिला है ?सबने हाथ उठाया ,कितने घरों में शौचालय है ?एक भी घर में  नहीं . बिजली क्यों नहीं आयी . स्थानीय प्रशासन इसके लिए नक्सल को जिम्मेदार ठहराते है। जबकि पिछले 10 वर्षों में इन इलाकों में एक भी…

"यही तो रोना है कश्मीर में कोई नयी बात नहीं बोल रहा है"

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जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा -केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा ..एक नारा कश्मीर में सरहद पार से भी प्रायोजित हुआ  कश्मीर बनेगा पाकिस्तान मीट के रहेगा हिंदुस्तान। तो क्या एक ऐतिहासिक भूल ने कश्मीर को समस्या बना दिया है और लगातार इंसानी जाने जा रही है।  डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी की रहस्मयी मौत पर दुःख व्यक्त करते हुए  तात्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने  कहा था  जब बड़ी गलतियां की जाती हैं, तब इस उम्मीद में चुप रहना अपराध है कि एक-न-एक दिन कोई सच बोलेगा" .. और यह सच बोलने की हिम्मत श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिखाई और बिना परमिट लिए   एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान, नहीं चलेगा- नही चलेगा के नारे के साथ कश्मीर में दाखिल हो गए   थे। मुश्किल यह है कि आज भी 65 साल बीत जाने के बाद भी  कोई सच बोलने की हिम्मत नहीं दिखा रहा है।  दिल्ली स्थित सैयद अली शाह गिलानी के घर से लौटते वक्त मुझे उनका एक रिश्तेदार मिला पूछा क्या खबर लेकर जा रहे हो ? मैंने कहा भाई पुरानी टेप और आज में कोई अंतर नहीं है। मुस्कुराते हुए उसने कहा "यही तो रोना है कश्मीर में कोई नयी बात…

शुजात बुखारी हम शर्मिंदा हैं .... भारत इनदिनों टीवी गुरुओं के प्रवचनों से थोड़ा कंफ्यूज है

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क्या कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या खौफ के सौदागरों की वही पुरानी रणनीति का हिस्सा रही है जिसमे अबतक आधे दर्जन पत्रकार मारे गए हैं ? पिछले दिनों स्पाई क्रॉनिकल (भारत पाकिस्तान के दो टॉप जासूसों ) के बुक लॉंच पर मैंने शुजात बुखारी में एक निर्भीक पत्रकार की छवि देखी थी। पूर्व मंत्री और बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा, दिग्गज सियासी लीडरों के पैनल को बता रहे थे की "दरअसल भारत सरकार की नाकामी के कारण कश्मीर में हालात बिगड़ी है। हिज़्ब कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से नौजवान उत्तेजित हैं और वे आतंकवादी बन रहे हैं।" शुजात बुखारी ने उन्हे याद दिलाया कि "कश्मीर की समस्या दिल्ली की अनदेखी की समस्या है जो पिछले 40 साल पुरानी बिमारी बनी हुई है। रही बात हिंसा की तो यह सिलसिला अफ़ज़ल भट की फांसी के बाद ही तेज हुई थी। कुछ नौजवानो ने अफ़ज़ल व्रिगेड बनाकर जमकर आतंक मचाया था और आज भी सक्रिय हैं " पूर्व रॉ चीफ दुल्लत और साबिक आई एस आई चीफ दुर्रानी के "स्पाई क्रॉनिकल" बुक को लांच करने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ,फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ,पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंस…

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दरबाजे पर प्रणब दा की दस्तक

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बारे में देश का नजरिया कैसा हो यह तय करने का अधिकार अबतक कांग्रेस ने संभाल रखी थी। वसुधैव कुटुंबकम के आदर्श को मानने वाले इस देश में कांग्रेस की सेकुलरिज्म कश्मीर में क्यों फेल हुई तो कारण पाकिस्तान और आई एस आई को बताया गया । इसे सत्ता तक पहुँचने का फार्मूला मानकर वामपंथियों ने भी नजरिये के खेल में खूब हाथ धोया और भारत को देश के बदले सराय बना डाला । दो बड़े दिग्गज विद्वान् जब इस राष्ट्रवाद और लोकतंत्र पर चर्चा करने एक मंच पर खड़े हुए तो सबसे ज्यादा निराशा नज़रिये वालो में देखा गया। जिस देश के हज़ारो वर्ष की परम्परा में संवाद उसकी आत्मा रही है ,विचारो को लेकर शाश्त्रार्थ सामजिक अनुशासन रहा है। उस देश को सराय मानने वाले लोग अपनी अपनी मर्यादा भूलकर पूर्व राष्ट्रपति और मोहन भागवत जी के खिलाफ अनर्गल बयानवाजी कर रहे हो तो माना जायेगा कि वो संविधान संशोधन करके देश को सेक्युलर बना सकते है लेकिन देश के लोकतंत्र और धर्मनिर्पेक्षता में उन्हें कोई आस्था नहीं है। वह कौन सा सेकुलरिज्म और लोकतंत्र था जिसके कारण संघ के एक स्वयंसेवक श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक देश एक विधान के …