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कश्मीर मसला या पावर शेयरिंग फार्मूला

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यह सवाल आम हिंदुस्तानी के मन में जरूर उठता है कि कश्मीर का मसला क्या है। जितना मैं समझ पाया हूँ कि वर्षो पहले कुछ नेताओं ने जो गांठ हाथों से लगायी थी मौजूदा पीढ़ी को वह गांठ दातों से खोलना पड़ रहा है। भारत के सबसे प्राचीन ऐतिहासिक ग्रन्थ राजतरंगनी के रचयिता कल्हण को भी शायद इस बात का इल्म नहीं रहा होगा कि जिस कश्मीर के चश्मे से वे भारत की सामजिक और राजनितिक व्यवस्था को झांक रहे हैं वह कश्मीर कभी अपने को अलग सामाजिक संरचना मानकर भारत की अस्मिता पर सवाल उठाएगा । या फिर 14 वी शदी के ऋषि परंपरा में कश्मीर के शेख उल आलम या नुंद ऋषि हो या फिर लल डेड या लल्लेश्वरी। भारत को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत करके कश्मीर के महान सूफी संतो और ऋषियों ने मजहबी दकियानूसी को हमेशा ख़ारिज किया। फिर वह कौन सा दौर था जिसमे कश्मीर की हजारो साल की परंपरा गौण हो गयी और व्यक्तिगत महत्वाक्षा ने कश्मीर को मसाला बना दिया। हालात यह है कि जावेद अहमद डार ,औरंगजेब ,उमर फ़ैयाज़ जैसे दर्जनों कश्मीरी नौजवान देश की अस्मिता की रक्षा में जान दे रहे हैं वही उसी कश्मीर में कुछ नौजवान बुरहान वानी बन बन्दुक उठा रहे है तो कुछ नौजवानो…

सामाजिक न्याय के नए युवराज और ग्राम स्वराज

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बाबा नागार्जुन का  जन्मदिन 30 जून किसके लिए महत्वपूर्ण है किसके लिए नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है लेकिन आज़ादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी गाँव ,गरीब ,मजदूर की हालत कितनी  बदली है यह आज भी एक बड़ा सवाल है। 50 साल पहले बाबा जिस सिस्टम की बात अपनी कविता में कर रहे थे  वह कितना बदल पाया है :
सपने में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,
भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे!
माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का,
हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का!
मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को ... तो क्या  गाँव सचमुच आज भी  मेहनतकश किसान /मजदूरों को  दो जून की रोटी जुटाने की जुगत नहीं जोड़ पाया। मौजूदा सरकार की ग्राम स्वराज अभियान ने कमोवेश इसी सच से पर्दा उठाने का काम किया है।
जिला रोहतास का प्रखंड नौखा ,दिल्ली से आये नोडल ओफिसर अत्यानन्द  गांव वालो से पूछते है कितने लोगों को अबतक घर नहीं मिला है ?सबने हाथ उठाया ,कितने घरों में शौचालय है ?एक भी घर में  नहीं . बिजली क्यों नहीं आयी . स्थानीय प्रशासन इसके लिए नक्सल को जिम्मेदार ठहराते है। जबकि पिछले 10 वर्षों में इन इलाकों में एक भी…

"यही तो रोना है कश्मीर में कोई नयी बात नहीं बोल रहा है"

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जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा -केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा ..एक नारा कश्मीर में सरहद पार से भी प्रायोजित हुआ  कश्मीर बनेगा पाकिस्तान मीट के रहेगा हिंदुस्तान। तो क्या एक ऐतिहासिक भूल ने कश्मीर को समस्या बना दिया है और लगातार इंसानी जाने जा रही है।  डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी की रहस्मयी मौत पर दुःख व्यक्त करते हुए  तात्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने  कहा था  जब बड़ी गलतियां की जाती हैं, तब इस उम्मीद में चुप रहना अपराध है कि एक-न-एक दिन कोई सच बोलेगा" .. और यह सच बोलने की हिम्मत श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिखाई और बिना परमिट लिए   एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान, नहीं चलेगा- नही चलेगा के नारे के साथ कश्मीर में दाखिल हो गए   थे। मुश्किल यह है कि आज भी 65 साल बीत जाने के बाद भी  कोई सच बोलने की हिम्मत नहीं दिखा रहा है।  दिल्ली स्थित सैयद अली शाह गिलानी के घर से लौटते वक्त मुझे उनका एक रिश्तेदार मिला पूछा क्या खबर लेकर जा रहे हो ? मैंने कहा भाई पुरानी टेप और आज में कोई अंतर नहीं है। मुस्कुराते हुए उसने कहा "यही तो रोना है कश्मीर में कोई नयी बात…

शुजात बुखारी हम शर्मिंदा हैं .... भारत इनदिनों टीवी गुरुओं के प्रवचनों से थोड़ा कंफ्यूज है

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क्या कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या खौफ के सौदागरों की वही पुरानी रणनीति का हिस्सा रही है जिसमे अबतक आधे दर्जन पत्रकार मारे गए हैं ? पिछले दिनों स्पाई क्रॉनिकल (भारत पाकिस्तान के दो टॉप जासूसों ) के बुक लॉंच पर मैंने शुजात बुखारी में एक निर्भीक पत्रकार की छवि देखी थी। पूर्व मंत्री और बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा, दिग्गज सियासी लीडरों के पैनल को बता रहे थे की "दरअसल भारत सरकार की नाकामी के कारण कश्मीर में हालात बिगड़ी है। हिज़्ब कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से नौजवान उत्तेजित हैं और वे आतंकवादी बन रहे हैं।" शुजात बुखारी ने उन्हे याद दिलाया कि "कश्मीर की समस्या दिल्ली की अनदेखी की समस्या है जो पिछले 40 साल पुरानी बिमारी बनी हुई है। रही बात हिंसा की तो यह सिलसिला अफ़ज़ल भट की फांसी के बाद ही तेज हुई थी। कुछ नौजवानो ने अफ़ज़ल व्रिगेड बनाकर जमकर आतंक मचाया था और आज भी सक्रिय हैं " पूर्व रॉ चीफ दुल्लत और साबिक आई एस आई चीफ दुर्रानी के "स्पाई क्रॉनिकल" बुक को लांच करने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ,फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ,पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंस…

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दरबाजे पर प्रणब दा की दस्तक

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बारे में देश का नजरिया कैसा हो यह तय करने का अधिकार अबतक कांग्रेस ने संभाल रखी थी। वसुधैव कुटुंबकम के आदर्श को मानने वाले इस देश में कांग्रेस की सेकुलरिज्म कश्मीर में क्यों फेल हुई तो कारण पाकिस्तान और आई एस आई को बताया गया । इसे सत्ता तक पहुँचने का फार्मूला मानकर वामपंथियों ने भी नजरिये के खेल में खूब हाथ धोया और भारत को देश के बदले सराय बना डाला । दो बड़े दिग्गज विद्वान् जब इस राष्ट्रवाद और लोकतंत्र पर चर्चा करने एक मंच पर खड़े हुए तो सबसे ज्यादा निराशा नज़रिये वालो में देखा गया। जिस देश के हज़ारो वर्ष की परम्परा में संवाद उसकी आत्मा रही है ,विचारो को लेकर शाश्त्रार्थ सामजिक अनुशासन रहा है। उस देश को सराय मानने वाले लोग अपनी अपनी मर्यादा भूलकर पूर्व राष्ट्रपति और मोहन भागवत जी के खिलाफ अनर्गल बयानवाजी कर रहे हो तो माना जायेगा कि वो संविधान संशोधन करके देश को सेक्युलर बना सकते है लेकिन देश के लोकतंत्र और धर्मनिर्पेक्षता में उन्हें कोई आस्था नहीं है। वह कौन सा सेकुलरिज्म और लोकतंत्र था जिसके कारण संघ के एक स्वयंसेवक श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक देश एक विधान के …

गरीब का मसला जाति और मजहब से नहीं है...समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई...

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गोरख पांडेय ने क्या खूब लिखा था "समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई...हाथी से आई, घोड़ा से आई......लाठी से आई, गोली से आई..लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद.. अदम गोंडवी ने इस समाजवाद कुछ इस तरह समझने कि कोशिश की .. "काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में ,उतरा है रामराज विधायक निवास में,पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत,इतना असर है ख़ादी के उजले लिबास में.आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह,जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में... गरीबी और गरीब से सियासत शुरू होती है और वही ख़तम हो जाती है लेकिन आम लोगों की स्थिति नहीं बदलती। गरीब एक बार फिर अगले चुनाव का मुद्दा हो जाता है और समाजवाद चालू आहे .... उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार भी कमोवेश उसी समाजवाद और उनकी डीएनए वाले नेताओ के रंग में रंगी लगती है। कांग्रेस की तरह लोहिया जी के चेलों ने भी समाजवाद को पूंजीवाद के चासनी में डालकर एक अलग फार्मूला बना डाला और समाजवाद सिर्फ सत्ता हथियाने का जुगाड़ फार्मूला बन गया। पहले लोग कहते थे समजवादी और मेढक को तौलना बराबर का काम है लेकिन आज समाजवाद पूंजीवाद से सीख लेकर कांग्रेस की वंशवाद की परंपरा को आगे बढ़ा रही ह…

ये दिल्ली है मेरी जान ! यहाँ एक चाय वाले को शून्य से ज्यादा मार्क्स नहीं मिलता .....

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चार साल मोदी सरकार ! बहस का बाज़ार गर्म है ,नेशनल टीवी के सेल्स और मार्केटिंग टीम ने फाइव स्टार होटलों में दरबार सजा दिया है। सोशल मीडिया के क्रन्तिकारी मिनी ब्लॉगर मोदी पास /फेल पर अपने व्यक्तित्व के हिसाब गोले बरसा रहे हैं। सरकारी मीडिया भी इस अवसर पर सिस्टम के दायरे में ओ बी ,डी एस एन जी दौरा  रहे  है. इस निरपेक्ष भाव से कि यह पब्लिक तय करे क्या देखा /समझा। सोशल मीडिया पर शुमार किये जाने वाले  महान पत्रकार पुण्य प्रसून ,रवीश कुमार ,राजदीप जैसे दर्जनों पत्रकार एक अलग धारा बनाने की कोशिश में सीधे सीधे पी एम मोदी पर हमला बोल रहे हैं। आखिर इतना शोर क्यों है भाई ? मोदी को लेकर इतनी प्रतिक्रिया क्यों है ?  अपने यशवंत सिन्हा जी कहते हैं "मोदी एक मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री बने हैं देश का कोई भी मुख्यमंत्री  इस लायक हो  सकता है। यानी मोदी में ऐसी कुछ भी खासियत नहीं है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी कहते हैं ,कॉपी में कुछ लिखा ही नहीं है तो नंबर क्या दूँ ? यानी महान रजनीतिज्ञ जोशी जी शून्य से आगे नहीं सोच रहे हैं। खामोश वाले शत्रुघ्न सिन्हा जी अपनी आलोचना से कोंग्रेसियो को भी प…

जब वी मेट !

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जब वी मेट ! कुछ ऐसा ही इन दिनों सियासत में भी हो रहा। जनता की नज़रो में एक दूसरे से पूछते हैं" हम आपके हैं कौन " और नज़र ओझल होते ही तेरा साथ है तो हमें क्या कमी है ... पिछले 25 वर्षों में केंद्र और राज्यों में इसी तरह के नैतिक /अनैतिक गठजोड़ तक़रीबन 20 बार बने है और हर बार जनता जनार्दन बूढ़े  संरक्षक की तरह अपने को असहाय ही पाया है। जब कुछ सियासी दल अकेला विधायक मधु कोड़ा पर सब कुछ लुटाता और बाद में  उसे भरपूर लूटता है तो कभी किंग मेकर बनने वाले कुमारस्वामी किंग बन जाते  है । मायावती के लिए कभी बीजेपी सबसे ज्यादा  गुणवान गठबंधन होता है तो कभी ममता दी केंद्र में  बीजेपी के लिए आदर्श हो जाती है। तो कभी वामपंथी और दक्षिण पंथी का  गठबंधन केंद्र में कांग्रेस का अलटरनेट मंच बनता है तो कभी बीजेपी को सत्ता से दूर करने के लिए कांग्रेस और वामपंथी सेक्युलर गांठ जोड़  लेती है। ऐसे में कुछ सम्बन्ध जो पब्लिक में बनते है उसे जायज करार दिया जाता है लेकिन कुछ सम्बन्ध जब वी मेट वाला बनता है तो माननीय न्यायलय के सामने भी  मुश्किल होता है कि इसे अनैतिक कैसे कहा जाय क्योंकि संविधान ने दूल्हे दुल्हन क…

मोदी जी ! "ननिहाल से कोई खाली नहीं जाता यह बात मिथिला के लोग जानते हैं "

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"पग पग पोखरि माछ मखान ,सरस बोल मूसकी मूख पान ,विद्या वैभब शांति प्रतीक ... ई मिथिला थीक"। ,अपने चार साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी जब तीसरे दौरे में नेपाल के जनकपुर धाम पहुंचे तो उन्होंने मिथिला के गौरवशाली परंपरा का कुछ यूँ बखान किया वो भी मिथिलेश कुमारी यानी सिया जी की मातृभाषा में। मिथिला में आकर मोदी अभिभूत थे ,यहाँ तक कि उन्होंने माता सीता के जनकपुर को अपना ननिहाल माना और कहा ननिहाल को कुछ दिए बगैर कोई कैसे जायेगा। लेकिन सरलता ,सरसता और मुस्की वाली मिथिला /बिहार की पीड़ा कथाकार राजकमल चौधरी की "अपराजिता "से बेहतर समझी जा सकती है। “गारंटी ऑफ पीस” खतम छल…विद्यापतिक गीत खतम छल। रूसक कथा खतम छल। डकैतीक कथा थम्हि गेल…सोना-चानीक तेजी-मन्दी सेहो बन्द भऽ गेल रहय। सिकरेटक लगातार धुँआ रहि गेल आ रहि गेल अपराजिता! सरिपहुँ… बागमती, कमला, बलान, गंडक आ खास कऽ कऽ कोसी तँ अपराजिता अछि ने! ककरो सामर्थ नहि जे एकरा पराजित कऽ सकय। सरकार आओत…चलि जायत..मिनिस्टरी बनत आ टूटत, मुदा ई कोसी…ई बागमती…ई कमला आ बलान…अपन एही प्रलयंकारी गति मे गाम केँ भसिअबैत, हरिअर-हरिअर खेत केँ उज्ज…

नरेंद्र मोदी व्यक्ति/ संगठन के अलावा एक आईडिया है जो सीधे आमजनमानस को कनेक्ट करता है

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" निर्मल भारत अभियान "और "स्वच्छ स्वच्छ भारत अभियान" में क्या फर्क है ? वही फर्क जो राहुल गाँधी और नरेंद्र मोदी में है। भारत को गंदगी से मुक्त कराने की इन दोनों स्कीमों का उद्देश्य भी एक ही था। लेकिन कांग्रेस की निर्मल भारत में सिर्फ कुछ हजार रुपयों का आश्वासन था जबकि पीएम मोदी ने खुद इसके लिए झाड़ू उठा लिया था। यानी स्वच्छाग्रही बनकर मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान को बिहैवियर चेंज का आंदोलन बना दिया। इस देश को समझने का दावा सिर्फ कांग्रेस ही कर सकती है। राहुल गाँधी इसका जिक्र अपने भाषणों में भी करते हैं लेकिन देश परिवर्तन के लिए आकुल है यह समझने में कांग्रेस पार्टी और राहुल ने भारी भूल की है। पीएम मोदी और राहुल की चुनौती भी एक जैसी है दोनों अपनी अपनी पार्टी की भीड़ और टीम में अकेले सेनापति हैं। दोनों पार्टियों में लीडरो को पाने की लालसा अधिक है। लेकिन राहुल गाँधी घर दुरुस्त करने के बजाय मोदी को हटाने के लिए अपनी पूरी जोर आजमाइश कर रहे हैं। यानी सत्ता सबकुछ ठीक कर देगी ऐसा कांग्रेस पार्टी सोचती है। जबकि मोदी मंत्री/मुख्यमंत्री के नाकामयाबी को नज़रअंदाज़ कर जनसंवाद को ही ब…

पाकिस्तान में मिडिल क्लास का न होना ... और हिंदुस्तान का मिडिल क्लास

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पाकिस्तान में फ़ौज ने बड़ी चालाकी से एक और तख्ता पलट को अंजाम दिया है। पाकिस्तान की सुप्रीम  अदालत ने फौजी अफसरों की जांच में वजीरे आज़म नवाज़ शरीफ को आचरण से  ईमानदार नहीं पाया और उन्हें  पहले सत्ता से बाद में सियासत से ताउम्र के लिए बेदखल कर दिया । फ़ौज की जिलालत और बेइज्जती  से आहत नवाज़ शरीफ पाकिस्तान को अलविदा कहते हुए एकबार फिर लंदन जा बसे हैं. लेकिन पाकिस्तान में कोई शोर गुल नहीं है। न ही मीडिया में इसको लेकर कोई तीखी प्रतिक्रिया है। सोशल मीडिया मजहबी और दहशतगर्द तंजीमो के प्रोपगैंडा से अबतक ऊपर नहीं उठा है। वजह पाकिस्तान में मिडिल क्लास का न होना अहम् है। एक ही वक्त दो मुल्क वजूद में आया पाकिस्तान और हिन्दुतान लेकिन वहां आज़ादी के 70 साल के बाद भी जमींदारों ,पुराने रजबारो और कारोबारियों का उच्च वर्ग है जो हुकूमत हैं या फिर  फौज के आलाधिकारी है. दूसरा तबका  निम्न वर्ग का है जिनकी भूमिका मजदूरी  और मजहबी तंजीमो के एक्टिविस्ट के रूप में  है। अल्लाह ,अमेरिका और आर्मी के इस अलायन्स ने कभी मध्यम वर्ग पनपने ही नहीं दिया । 

आज अमेरिका की भूमिका में वहां चीन आ गया है। लेकिन उसके पडोसी देश भार…

उम्मीदों का हाहाकार !

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उम्मीदों का हाहाकार ! हर तरफ निराशा ही निराशा। हर तरफ हिंसा का शोर ,किसान परेशान ,कारोबारी परेशान ,जज परेशान हैं ,मुल्जिम परेशान है।  दलित परेशान है सवर्ण परेशान है। कश्मीर परेशान ,कन्याकुमारी परेशान है । देशी अंदाज़ में इसे लोग  भसड़ कहते है। चारो ओर मनो भसड़ ही भसड़ है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेसन भी हाल में इस भसड़ के शिकार हुए हैं। सोशल मीडिया पर किसी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी तो बड़े बड़े संपादक भी इसे कन्फर्म करने की जहमत नहीं उठाई और चल पड़ा उनके व्यक्तिव कृतित्व का पाठ। जीते जीते जी उनका राम नाम सत्य है ! कर दिया गया। लेकिन संपादक  नहीं मानेगे की वे फेक न्यूज़ फैला रहे हैं। क्योकि वे ज्ञानी है और लोकतंत्र ने उन्हें चौथा स्तम्भ माना गया  है। ऐसा कुछ लोगो का दावा है .. 
. हर हफ्ते अटल जी सोशल मीडिया पर दिवंगत होते हैं और हर बार उनका प्रोफाइल डॉक्यूमेंट्री चैनेलो के लाइब्रेरी से  बाहर निकल आता है। । याद है आपको सोशल मीडिया का चर्चित फ़ारूक़ अहमद डार। वही डार जिसका फोटो ह्यूमन शील्ड के नाम से पब्लिश्ड करके ओमर अब्दुल्लाह ने बवाल खड़ा कर दिया था। बड़गाम के इस टेलर को लेकर कश्मीर में महीन…

सोशल मीडिया ने यहाँ नश्ले तबाह कर दी है !

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ये सोशल मीडिया की क्रांति है या रिलायंस जिओ वाले का दुनिया मुठी में करने वाला फ्री /सस्ता इंटरनेट डाटा का कमाल ,अभी अभी मोहम्मद अशरफ सेहराई ने कश्मीर के अलगाववादी संगठन तहरीके हुर्रियत के चेयरमैन का पद संभाला था और बेटा जुनैद अशरफ खान ने सोशल मीडिया पर एके 47 के साथ फोटो अपलोड कर अब्बा हुजूर को यह बता दिया कि वह हिज़्बुल मुजेहिद्दीन का आतंकवादी बन गया है।वह बता गया अब्बा हुजूर जिस आग से खेलने की सीख गिलानी और आपने दी अब उस तपिश में आप भी जलेंगे। कश्मीर के इतिहास में यह पहलीबार हुआ है जब किसी टॉप अलगावादी लीडर के घर से आतंकवादी वना हो।गिलानी साब से लेकर हिज़्ब के चीफ सलाहुद्दीन के बच्चे राज्य सरकार में आला दर्जे का अफसर है ,ऊँचे दर्जे के स्कूल में तालीम लेने वाले हुर्रियत लीडरो के बच्चो ने कभी तहरीक और जिहाद की तरफ नहीं देखा। लेकिन सोशल मीडिया का कमाल देखिये दूसरे के घर जलाने वाले का आज खुद घर जल रहा है। किसी ने सही कहा है कि सोशल मीडिया का प्रभाव पानी की तरह है जो सतह पर रुकता नहीं है बल्कि अपना रास्ता बनाता है गलत या सही यह पानी भी नहीं जानता। वह दौर था जब सैयद साल्हुद्दीन ,यासीन मालि…

"थके हुए देश को रास्ता सिर्फ कांग्रेस दिखा सकती है"

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हमारा नेता कैसा हो राहुल गाँधी जैसा हो ! कांग्रेस की महान परंपरा के बीच यह महाधिवेशन कुछ खास है। राहुल गाँधी सहित तमाम नेताओं के भाषण मोदी से शुरू होता है और आर एस एस पर ख़तम। वैसे बुजुर्ग कांग्रेसी नेता खड़गे पार्टी जनो से बीजेपी -आर एस एस की तरह काम करने की सलाह भी दे रहे थे तो कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या अधिवेशन में राहुल गाँधी को निर्विरोध 2019 में प्रधानमंत्री बना रहे थे। कोई रोकने वाला नहीं है .. सिद्दरामैया जानते हैं जितना 2018 का कर्नाटक चुनाव उनके लिए मुश्किल है उससे कई ज्यादा मुश्किल राहुल के लिए 2019 का चुनाव है। लेकिन गाँधी परिवार का महादरबार लगा है वहां पार्टी की समीक्षा मुश्किल है ,यही वजह है छोटे बड़े ,नौजवान ,बुजुर्ग सारे कोंग्रेसियों ने बीजेपी -आर एस एस की समीक्षा करना ही उचित समझा । कांग्रेस पार्टी का यह 84 वा अधिवेशन राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद संभवतः पहला इतना बड़ा सम्मेलन था लेकिन अध्यक्ष जी के भाषण में सोशल मीडिया के फेक न्यूज़ का प्रभाव ज्यादा दिखा। "देश गुस्से में है .. ,लोगों को लड़ाया जा रहा है ,जाति सम्रदायो को बाटा जा रहा है... थके हु…

स्वच्छ भारत का यह कारवां देश की राजनीति /अर्थनीति में भी बदलाव लाएगा और इसके लिए मोदी याद किये जाएंगे ..

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लम्बे अरसे के बाद एक निजी चैनल के कार्यक्रम में सोनिया जी खूब बरसी ,मोदी सरकार को खूब खरी खोटी सुनाई। ऐसा लगा चैनल ने सोनिया जी के लिए इलेक्शन मंच बना दिया था। वैसे भी सोनिया जी या तो चुनावी सभा में बोलती है या फिर कमिटेड पत्रकारों के प्रोग्राम में ,संसद में वह क्यों नहीं बोलती ,क्यों देश के महत्वपूर्ण सवाल अपने वकील सांसदों के जरिये बोलती हैं ? यह प्रश्न पिछले 25 साल से अनुत्तरित है। लेकिन देश में आईडिया ऑफ़ इंडिया पर हो रहे तथाकथित आघात से उद्वेलित सोनिया गांधी ने एक बड़ा मंच संभाल लिया था, तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी सिंगापूर से आईडिया ऑफ़ इंडिया का अलख विदेशो में जागते रहे हैे । ये नफरत की सियासत ही अगर आईडिया ऑफ़ इंडिया है तो सोनिया जी और उनके कुनबे को सत्ता के लिए कुछ वर्ष और इन्तजार करना होगा। क्योंकि देश की 70 फीसद आवादी पर राज करने वाली बीजेपी और पी एम मोदी ने देश में सियासत की एक नयी धारा दी है जिसमे आईडिया ऑफ़ इंडिया ,गाँधी -नेहरू ,सेकुलर ,सामजवाद ,जातिवाद जैसे जुमले न्यू इंडिया में बे असर हो गए है। 25 साल तक लगातार सत्ता में बने रहने वाले माणिक सरकार सत्ता से क्यों बेदखल ह…