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मीडिया : हम भी हैं पत्रकार

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कुत्ता पालो ,बिल्ली पालो ,कुछ भी पालो लेकिन गलतफेहमी मत पालो। दरअसल टीवी मीडिया में सम्पादकों ने अपने को लार्जर देन लाइफ पेश कर अपने को सेलिब्रेटी बना लिया है। और इस ग़लतफ़हमी में कुछ टीवी संपादक /एंकर ने जीने की आदत डाल ली है कि वे जब कुछ बोलते हैं तो पूरा देश सिर्फ उन्ही को सुन रहा है। मानो देश इतनी फुर्सत में है कि लोग या तो टीवी देखते हैं या सिर्फ सोशल मीडिया पर एक्टिव है। कोई गला फाड़ के चिल्ला रहा है तो कोई फ्लोर डांस करते हुए अलग अलग भाव में खबर बेच रहा है तो कोई संपादक उपदेशक की मुद्रा में देश को स्कूली बालक समझ कर एजेंडा परोस रहा है। हालात यह है कि संपादक /एंकर और पार्टी प्रवक्ता में विभेद करना मुश्किल है। गाँधी जी ने कहा था स्वस्थ , जांची परखी सूचना ,संतुलित आलोचना सार्बजनिक जीवन में ओज़ोन लेयर का काम करती है। जाहिर है इस कसौटी पर आज एक भी संपादक खड़े नहीं उतर पाएंगे। कारण संस्थागत कम व्यक्तिगत ज्यादा है। आपातकाल के निर्णय को कभी सही बतानेवाले महान संपादक खुशवंत सिंह को अपने ऑफिस घुसने की इजाजत गार्ड ने नहीं दी और उन्हें बताया गया कि उनकी सेवा समाप्त कर दी गयी है। ऐसी स्थित