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डिमोनेटाइजेशन : सबका साथ सबका विकास

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2016  आपके जीवन में क्यों महत्वपूर्ण रहा ,इसके कई व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन यह देश के लिए क्यों महत्वपूर्ण बना ,इसकी वजह भी व्यक्तिगत ही है। पिछले 30 वर्षो में सत्ता परिवर्तन आने जाने का ऐसा सिलसिला बना कि किस किस को याद कीजिये ,किस किस को रोइये। .आराम बड़ी चीज है मुँह ढक के सोइये। लेकिन 2016  ने ऐसा मौका नहीं दिया। नोटबंदी का ऐलान , 50 दिनों का संघर्ष और पीएम मोदी की कामयाबी इसे ऐतिहासिक बना दिया। क्या यह कामयाबी पी एम् मोदी की थी जिसने चीफ जस्टिस जे एस ठाकुर के दंगे की आशंका को निराधार साबित किया  या फिर उन सबा सौ करोड़ जनता की जिसने पी एम् मोदी के डेमोनेटाइजेशन पर  यकीन किया . .  नोटबंदी के  दौर  में एक सियासी फैमिली ड्रामा उत्तर प्रदेश में भी चल रहा था ,राजनीतिक पंडितो ने मोदी के नोटबंदी के फैसले को आगामी विधान सभा चुनाव से भी जोड़ा। लेकिन आख़िरकार लोगों को लगा कि सपा के  ड्रामा में सबकुछ था लेकिन क्लाइमेक्स कभी नहीं आया ,लेकिन नोटबंदी इस दौर में ऐसा फैमिली सीरियल बना जिसमे हर उम्र ,वर्ग ,सम्प्रदाय टीवी न्यूज़ के स्क्रिप्ट बने और खबरिया चैनल अपने व्यक्तिगत वजह को सामाजिक उ

,राहुल गाँधी को अभी इंदिरा को समझना बेहतर होगा।

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" मेरा देश बदल रहा है " .या यूं कहे  पिछले 30 वर्षों में पहलीबार कोई स्लोगन आगे बढ़ रहा है। 70 के दशक में इंदिरा गाँधी का गरीबी हटाओ का समाजवादी नारा जन जन तक प्रचारित हुआ इसके पीछे इंदिरा  के बातों पर लोगों को भरोसा था, उनके इरादे पर लोगों को यकीन था। 1969 में उन्होंने अपने विरोधियों (सिंडिकेट) के खिलाफ मास्टर स्ट्रोक चलते हुए बैंक नॅशनॅलिजेशन की घोषणा की तो जिनका बैंको से कभी दूर दूर तक सरोकार नहीं था, वे दिल्ली के चांदनी चौक पर हज़ारों की संख्या में जमा हो गए ,मानो 14 बड़े  बैंकों में रखे अरबो रूपये  उनके हिस्से में ट्रांसफर होने वाला है । ये अलग बात थी कि अगले 50 वर्षो में इस भीड़ का बैंक से कोई सरोकार नहीं जुड़ा। आम आदमी को जन धन एकाउंट ने पहलीबार बैंक से  मुखातिब किया। तो क्या  मोदी इंदिरा जी के नक्से कदम पर आगे बढ़ रहे हैं या इंदिरा के बाद मोदी पहला प्रधानमंत्री हैं जिनके नियत  पर देश को कोई शंका नहीं है। बैंक नॅशनॅलिजेशन के बाद नोटबंदी पहली ऐसी घटना या सियासी फैसला है जिसमे  आम आदमी एक भरोसे के साथ  जुड़ा है।    विपक्ष में बैठे सियासी दल देश के मिजाज को समझने में  

नोटबंदी : सबका कारण व्यक्तिगत है ?

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नोटबंदी का आर्थिक लाभ / हानि  १० दिनों के बाद दिखने को मिल सकते हैं। लेकिन इसका सियासी फायदा किसको मिला है और मिलेगा यह कहना अभी मुश्किल हैं। लेकिन क्या प्रधानमंत्री मोदी ने यह फैसला सियासी लाभ के लिये लिया   था ? तो कहा जा सकता है बिलकुल नहीं। करप्शन के खिलाफ, कालाधन के खिलाफ अभियान अगर चुनावी मुद्दा हो सकता था तो पिछले 70 सालों में यह मुद्दा कई बार आजमाया गया होता। अगर इंदिरा जी ने चुनावी सियासत में नोटबंदी को  अव्यवहारिक माना था। तो माना जा सकता है कि वे इस देश के जनमानस के चरित्र को बेहतर समझती थी। अपनी काबिलयत और क्षमता को साबित करने के लिए इंदिरा जी 1971 में पाकिस्तान के साथ  जंग जरूर लड़ ली लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने कोई अभियान नहीं चलाया।  रही बात मोदी जी की  तो जिनका चिंतन और कार्य फकीरी से शुरू होकर निष्काम कर्म पर ख़त्म होता है उसे चुनाव की चिंता क्या बिगाड सकती है।  पिछले  70 वर्षो में देश  में ऐसी कोई घटना नहीं थी जिसमे मुल्क के  जनमानस को  व्यक्तिगत रूप से प्रभावित किया हो।  नोटबंदी/नोटबदली ने समाज के हर तबके को प्रभावित किया है क्या ये बात मोदी जी नहीं जानते

केंद्रीय सेवा का इम्तिहान एक समान तो फिर शिक्षा क्यों न हो एक समांन

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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर जम्मू कश्मीर में स्कूल की बदहाली पर एक बार फिर भावुक हो   उठे , उनका मानना है कि सिर्फ शिक्षा से ही विकास संभव है जो जम्मू कश्मीर में हो नहीं रहा है । पिछले साल  इलाहाबाद उच्च न्यांयालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में सभी अधिकारियों और मंत्रियों के  बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने का आदेश यू पी के समाजवादी सरकार को दिया था। समाजवाद की बात करने वाली सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह कर अभी तक उस फैसले को टाल रही है। यह वही देश है जहां टॉप ब्यूरेक्रेट के बच्चों को पढ़ने के लिए 1 रूपये में कई एकड़ जमीन  राजधानी दिल्ली में  लीज पर दी जाती है। यह वही देश है जहाँ बच्चो को स्कूल में पोशाक मिल जाते हैं लेकिन किताब नहीं। यह वही देश है जहाँ संसद में स्कूल के मीड डे मील घोटाले की  चर्चा होती है लेकिन जर्जर शैक्षणिक व्यवस्था पर कोई नहीं बात करता।  एक देश सैकड़ो सिलैबस ,कोई बरगद के नीचे पढ़ रहा है कोई सेंट्रलाइज़ड ऐ सी वाले स्कूल में। लेकिन कॉम्पेटीशन एक समान  ,केंद्रीय सेवा का इम्तिहान एक समान तो फिर शिक्षा क्यों न हो  एक समांन? नोटबंदी पर चीफ जस्टिस सा

रूपये का एयर फ्लाइंग

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दुनिया में तीन तरह के लोग होते  हैं एक वे जो जन्मजात  ईमानदार होते हैं ,एक वो जिनकी फितरत में बेईमानी  है एक तीसरा भी है जो परिस्थिति के अनुरूप संकल्प बदलता  हैं।  कालेधन के खिलाफ अभियान में सबसे ज्यादा बेचैनी  दूसरे नंबर के लोगों में ज्यादा है ये बात अलग है कि ईमानदार बनने की कोशिश में लगे आम आदमी को भी इस दौर में नोटबंदी ने मुश्किलें बढ़ा दी  है।   जनधन योजना और उसकी सफलता विफलता पर खूब चर्चा हुई। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हुई कि ज़ीरो बैलेंस के इन खातों की किश्मत कैसे बदलेगी।  लेकिन नोटबंदी के बाद पिछले एक हफ्ते में इन खातों में 21000 करोड़ रुपया जमा होना एक नयी हलचल की ओर इशारा करती है। जनधन के 25ooo एकाउंट्स की किश्मत कैसे पलटी यह आईटी के लोगों के लिए उत्सुकता का विषय हो सकता है लेकिन पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में इन अकाउंट्स में बढ़ी हलचल ने ब्लैक एंड व्हाइट पर छिड़ी बहस को तेज कर दिया है।  चार्टर्ड प्लेन से मंगलावार को नागालैंड के दिमापुर एयरपोर्ट पर  पहुंचा करीब 4 करोड़  रुपया नोटबंदी के बाद अचानक रूपये का एयर फ्लाइंग एक नए साजिश का खुलासा किया है।  यानी नोट की चोट स

नोटबंदी : देश में सियासत के तर्क और अर्थ दोनों बदल जाएंगे

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कालेधन के खिलाफ अभियान  को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश  कुमार शेर की  सवारी मानते हैं ,वे मानते हैं कि मोदी सरकार के इस फैसले से जनसमूह की भावना जुडी हुई है।ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी लगभग ऐसा ही विचार रखते हैं  लेकिन नीतीश जी के सत्ता के साथी  लालू जी माया ,मुलायम , ममता  ,केजरीवाल और कांग्रेस के साथ खड़े  है। ममता जी के बंगाल में नोटबंदी के खिलाफ एक भी रैली सामने नहीं आयी है न ही लोगों का विरोध केरल,कर्नाटक,नार्थ ईस्ट के राज्यों और त्रिपुरा से सुना गया है. ममता दिल्ली में केजरीवाल के साथ रैली कर रही है तो कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक  दल संसद के अंदर प्रदर्शन कर रहे हैं। विमुद्रीकरण के बाद असल बात तो यह है कि आज अपनी सियासत जिन्दा रखने  के पीछे लीडरों के पास  सही तर्क नहीं है ।यही वजह है कि संसद के अंदर और बहार विरोध करने वालों की अलग अलग जमात हैं। देश के आम अवाम राष्ट्रहित में इसे एक बड़ा फैसला मानकर  एटीएम /बैंक के लाइन में खड़े है, हालाँकि अब जमीनी हालात में काफी तबदीली आयी है  लेकिन सियासी लीडर जनता का  नाम लेकर  संसद ठप्प कर रहे है।सरकार हर दिन लोगों के हित में

अगला नोबेल पीस प्राइज़ क्या भारत आयेगा ?

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अगला नोबेल पीस प्राइज़ क्या भारत आयेगा ? बहुत ही सरल सवाल पूछ कर सुप्रीम कोर्ट ने देश के एक जटिल सवाल की ओर लोगों का ध्यान दिलाया है।  पिछले 50  वर्षो से मार्क्सिस्ट गुरिल्ला आतंक से लहुलहान कोलंबिया ने बामपंथी अतिवादियों से पीस डील करके इन्शानियत को नयी फ़िज़ा में सांस लेने का मौका दिया है। कोलंबिया में बामपंथी अतिवादियों की हिंसा में दो लाख साठ हजार लोग मारे गए और ६ लाख से अधिक ग्रामीण लोगों को  पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था।  जाहिर है कोलंबिया के प्रेसिडेंट जॉन मानुएल सांतोस को इस महान समझौते के लिए  सर्वश्रेष्ठ पीस प्राइज़ नोबेल प्राइज से सम्मानित किया गया। सुप्रीम कोर्ट का सवाल अपने आप में गंभीर है क्या जॉन   मानुएल सांतोस के महान कार्य को भारत में दोहराया नहीं जा सकता ? क्या भारत के विभिन्न प्रान्तों में जारी हिंसक आंदलोनों से संवाद का तार नहीं जोड़ा जा सकता ? इस देश की व्यवस्था ,बुद्धिजीबी और जन साधारण क्या इस चुनोती को स्वीकार करेंगे ? कश्मीर में पिछले 25 वर्षों से जारी अतिवादी हिंसा का स्वरूप माओवाद हिंसा से अलग है। कश्मीर के  उग्रवाद का नियंत्रण पाकिस्तान के  हाथ में है

चिनगारी का खेल बुरा होता है...

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चार बांस चौबीस गज ,अंगुल अष्ट प्रमान  ता ऊपर सुल्तान है ,चुको मत चौहान....चंदबरदाई ने यह संकेत  पृथ्वीराज को महमूद गोरी को मारने के लिए दिया था और अंधे कर दिए जाने के वाबजूद चौहान आतंकी सुल्तान का खात्मा कर दिया था। यह बीरो की धरती है यहाँ नगारे बजा के जंग नहीं लड़ी जाती ,यह इस देश का स्वाभिमान है कि वह अपनी लड़ाई खुद लड़ लेता है। इंडिया फर्स्ट लोगों ने यह  सीख किसी राजनेता से नहीं ली है बल्कि यह इसके स्वाभाव में है चाहे वह किसी जाति और मजहब से हो। फिर वर्षो से जारी पाकिस्तान के अघोषित युद्ध का जवाब हम क्यों नहीं ढूढ पाते ?  इस उहापोह की स्थिति में राष्ट्र कवि दिनकर जरूर याद आते है   "ये देख गगन मुझमे लय है ये देख पवन मुझमे लय है,मुझमे विलीन झनकार सकल मुझमे लय है संसार सकल,अमरत्व फूलता है मुझमे,संहार झूलता है मुझमे..याचना नहीं अब रण होग.... . जीवन जय या की मरण होगा.अटल बिहारी वाजपेयी दिनकर जी के बड़े प्रशंसक थे ..युद्ध की ऐसी स्थिति अटल जी के सामने भी आयी लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के लिए अलग तर्क गढ़ा...  इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो, चिनगारी का खेल बुरा होता है । 

हमें चाहिए इस कश्मीर से आज़ादी.

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इंसानियत ,जम्हूरियत ,कश्मीरियत के घिसे पिटे दर्शन के साथ वादी पहुंची सांसदों की  हाई प्रोफाइल टीम ठीक वैसी ही थी जैसी गोरखपुर में हर साल ब्रेन फीवर से २००-४०० बच्चो की मौत के बाद देशी-विदेशी एक्सपर्ट टीम वहां  पहुँचती है।  न तो आजतक पूर्वांचल के ११ जिलों में  इनशेफलाइटिस फैलने की वजह तलाशी गयी न ही कश्मीर में  रोग को ढूंढा गया कि ये पत्थर चलानेवाले कौन लोग है और इनकी बीमारी क्या है ? हरबार की तरह इस बार भी कुछ  बुद्धिजीवी और विवेकशील सांसद हुर्रियत लीडरों से मिलकर अपनी प्रखर भूमिका चाहते थे ,लेकिन पथरवाजों के डर से हुर्रियत के लीडरों ने फोटो ओप का मौका नहीं दिया। पथरवाजो का नारा है "हम क्या चाहते आज़ादी किससे आज़ादी यह साफ़ नहीं है लेकिन 58   दिन से बंद -हड़ताल और कर्फ्यू से पीड़ित लोगों को पूछिये वो मांग रहे हैं हमें चाहिए इस कश्मीर से आज़ादी।    मीडिया में खबर सिर्फ पिलेट गन की होती है ,कश्मीर पर तथाकथित जानकार अलगाववादी लीडरों से बातचीत की  पुरजोर सलाह देते है और हुकूमत चार्वाक दर्शन को मानकर अँधेरा छटने का इंतज़ार कर रही है।  मेहबूबा अपना जनाधार खोने के डर  से लोकल पंचैती में वि

कश्मीर पर बकैती नहीं , बात कीजिये

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क्या कश्मीर के नौजवाब   बुरहान वानी  की मौत से इतना  खफा है कि वे स्टोन ऐज में लौट आया है ? क्या अलगाववादी ग्रुप वाकई हाउस अरेस्ट हैं और पिछले ४४ दिनों   से   बंद हड़ताल खेल रहे है ? क्या मकामी हुकूमत वाकई नौजवानों के पत्थर से घबराई हुई है और कर्फ्यू का कबच   ओढ़ रखी है।  क्या साबिक मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्लाह कश्मीर के हालात को लेकर वाकई गंभीर है ? कश्मीर में सवाल   ढूंढने जाएंगे तो जवाब कम सवाल ज्यादा मिलेंगे।   कौन है ये नौजवान जिन्होंने इस्लाम को जाना नहीं लेकिन उन्हें इस्लाम पर खतरा नज़र आ रहा है , उनके साथ जो पत्थर नहीं उठा रहा वह काफ़िर है।  क्या ५० से ज्यादा मासूमो की मौत से इन नौजवानों को जरा भी अफ़सोस है ? छोटे छोटे बच्चो के हाथ पत्थर पकड़ा कर वो किस्से बदला ले रहे है ?    हम क्या चाहते आज़ादी जैसे चंद जुमले उन्हें   इसलिए याद है क्योंकि उन्हें  पता है कि अब्बाजान की जबतक कमाई है तबतक भोजन  सुरखित है। इसमें कोई दो राय  नहीं कि यहाँ बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है लेकिन यह भी सच है  कि सबसे ज्यादा सरकारी नौकरी लोगों को यही मिली हुई है। हुर्रियत के हर छोटे बड़े लीडरान के बच्चे  या तो

कश्मीर क्या सचमुच मसला है ?

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90 के दशक में "स्काई  इज द लीमिट " का फार्मूला देकर  पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने कश्मीर मसले के हल के लिए शानदार पहल की थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कदम आगे बढ़कर बातचीत को इंसानियत के दायरे में लाने की कोशिश की।  संवैधानिक दायरे से आगे बढ़ने का जोखिम लेकर अटल जी ने कश्मीर में  विश्वास का वातावरण बनाया तो  पचास साल बाद  फ्री एंड फेयर चुनाव के संकल्प को कश्मीर में जमीन पर उतारकर लोगों में लोकतंत्र के प्रति भरोसा पैदा किया। लेकिन आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने  अगर कश्मीर के   दायरे को आगे बढाकर ,जम्मू ,लदाख और पाकिस्तान मकबूजा कश्मीर के मसले को रेखांकित करने की कोशिश की है तो माना जायेगा की उन्होंने इतिहास से सबक ली है। कश्मीर के कई जिलों में लगातार ३५ दिनों के बंद -हड़ताल और कर्फ्यू के बाद यह सवाल पूछा जाना लाजिमी है कि  कौन चाहता है कश्मीर मसले का हल ?  एक रोमांटिक आतंकवादी बुरहान वानी की मौत से कश्मीर सचमुच खफा है ? या फिर कश्मीरियत की रिवायत वाली वादी में आई एस के तथाकथित खिलाफत के तई नॉज़वानो में बढ़ी उत्सुकता ,इस विरोध को धारदार बना दिया है ?. ऐसी चिंता पीडीपी सां

"इतनी नाराजगी क्यों है "

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30 साल पहले सिस्टम से नाखुश युसूफ शाह सरहदपार चला गया और आतंकवादी सईद सलाहुद्दीन बन गया अब पाकिस्तान में जेहादी कौंसिल के चेयरमैन हैं.  । ३० साल बाद उसी कश्मीर का एक नाखुश नौजवान बुरहान वानी ,हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का कमांडर बनकर सिस्टम बदलने के बजाय मुल्क की अस्मिता पर चोट करने लगा और मारा गया। उसी सिस्टम से नाराज कश्मीर के कुछ नौजवानों ने पत्थर उठा लिया  है और सुरक्षाबलों से दो दो हाथ करने को तैयार है। लेकिन उसी सिस्टम में शब्बीर अहमद पिछले एक हफ्ते से रात -दिन एम्बुलेंस चलाकर रगड़ा में   घायल नौजवानों को हस्पताल पहुंचा रहा है। पथरवाजो के नाराजगी से बचने के लिए वह हेलमेट पहनकर एम्बुलेंस चलाता है लेकिन एक सवाल जरूर पूछता है "इतनी नाराजगी क्यों है " ? आज हर कोई कुछ ज्यादा ही नाखुश है ,कश्मीर में ओमर अब्दुल्लाह नाखुश है. (उन्ही की हुकूमत में ११० बच्चों की पथ्थरवाजी में मौत हुई थी ) महबूबा नाराज है कि अलगाववादी उन्हें काम करने नहीं दे रहे ,अलगाववादी नाराज है कि महबूबा ने उनकी अहमियत क्यों कम कर दी ? दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल नाराज है ,जनता उनसे सवाल पूछ रही है ऊँगली पी एम

और बुरहान तुम चले गये .....

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बुरहान तुम्हारे जाने का बहुत अफसोस है ! ठीक वैसे ही अफसोस मुझे तब हुआ था जब लोग तुम्हे कश्मीर में हिज़्ब के पोस्टर बॉय कहने लगे थे। अबतक लोग यह मानते थे कि गरीब और अनपढ़ लोग ज्यादा वल्नरेबल होते है जिन्हे कुछ चालक लोग आसानी से बरगला सकते है, लेकिन तुम तो एक पढ़े -लिखें  खानदान में पैदा लिया अच्छी तालीम पाई , स्थानीय कॉलेज के प्रिंसिपल तुम्हारे अब्बाजान मुजफ्फर अहमद वानी ने कभी सोचा भी न होगा कि अपने क्लास का टॉपर बुरहान कभी हिज़्ब का बंदूक उठा लेगा।  अफसोस इस बात को लेकर भी है कि तुम्हारे तंजीम हिज़्बुल मुजाहिदीन के सरबरा सैयद सलाहुद्दीन ने अपने किसी बच्चे को मिलिटेंट नहीं बनाया ,उन्हें बंदूक से दूर रखा और तुम ने अपने जैसे दर्जनों नौजवानों को बंदूक उठाने   के लिए  प्रेरित किया।  माना कि  तुम्हे  सोशल मीडिया/ इंटरनेट  का शौक था ,कश्मीर में इससे पहले किसी मिलिटेंट ने अपने  ग्रूप का सेल्फी फेसबुक  पर नहीं डाला था। कश्मीर में कुछ लोग तुम्हे हीरो मान  बैठे थे,और यह तुम्हारी गलतफहमी थी कि तुम सेना के साथ जंग लड़ रहे थे।बांग्लादेश कैफे हमले में मारे  गए 20 साल का आतंकवादी  रोहन इम्तियाज़   को  भ

उत्तर प्रदेश और "माया" की सियासत

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" माया" जिसे भारतीय परम्परा में कभी भ्रम तो कभी देवी दुर्गा तो कभी भगवान बुध की माता के रूप में सम्बोधित किया जाता है लेकिन सियासत में माया सिर्फ धन और भ्रम के रूप में प्रचलित है। माया जिसका  सरोकार वोट से है ,सत्ता से है ,व्यवथा से है और तथाकथित सामाजिक न्याय से भी है। यह कोई इज्म या वाद से बंधी  नहीं होती बल्कि मौके और दस्तूर से इसकी व्याख्या की जा सकती है। तो क्या उत्तर प्रदेश की मौजूदा सियासत सिर्फ माया के इर्द गिर्द घूमती है ?  मंडल- कमंडल के सियासी बवंडर का जोर कमोवेश बिहार और उत्तर प्रदेश में कायम है ,सत्ता पाने का इससे आसान तरीका इतिहास में इससे पहले कभी ईजाद नहीं किया गया था। कांग्रेस पार्टी के दिग्गज राजनेता अभी भी  इन प्रदेशों में अपनी जड़ खोजने की भरपूर कोशिश कर रहे है लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि  ऐतिहासिक भूल ने इनके जड़ो पर मट्ठा डाल दिया है। बहरहाल  माया की चर्चा करते है . ..बी एस पी के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्या पार्टी को बाय - बाय करने के साथ ही मायावती पर जोरदार आरोप लगाते है " ये दलित की नहीं दौलत की बेटी है ,बी एस पी में टिकट की बोली लगती

क्या मोदी राजनेता हैं या फॉर्मूले का पैकेज !

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मोदी सरकार पास या फेल ! पिछले एक हफ्ते से इस सवाल का हल ढूंढने में मीडिया एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है। लेकिन मूल सवाल पीछे छूट जाता है कि मोदी सरकार कौन सी परीक्षा दे रही है  ? सवाल यह भी फेहरिस्त से बाहर है कि क्या ऐसे ही सवाल देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों के लिए भी पूछा गया था ... अगर नहीं तो सिर्फ मोदी के लिए ही क्यों ? सवाल केजरीवाल भी पूछ रहे है ,नीतीश ,लालू और कांग्रेस के हर नेता पूछ रहे हैं जो मोदी से अपने को बेहतर मानते हैं।यानि देश को यह बताया जा रहा है कि "कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली " पिछले एक दशक में इस मुल्क ने भले ही जी डी पी ग्रोथ का आंकड़ा डबल डिजिट को छू लिया हो लेकिन राजनेता या राष्ट्रीय नेता के तौर पर उसे फुके कारतूस ही मिले, क्षेत्रीय क्षत्रपों और जातीय सरगनाओं की महत्वकांक्षा  इस दौर में राष्ट्रीय क्षितिज पर छा जाने की है  , सेक्युलर गठबंधन से लेकर त्याग और विरासत के कई फॉर्मूले सामने आये लेकिन देश को राष्ट्रीय नेता के रूप में न तो इंदिरा मिली न ही अटल।  न ही लोहिया मिले न ही नम्बूदरीपाद। . यह दौर ऐसा था जिसमे सत्ता और अपनी व्यवस्था

मोदी को हराने के लिए भौकने से काम नहीं चलेगा ....

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दिल्ली के मुख्य्मंत्री अरविन्द केजरीवाल को प्रधानमंत्री मोदी  की शैक्षणिक योग्यता की जानकारी चाहिए ,क्यों चाहिए इसका   आर टी आई में खुलासा नहीं है ,लेकिन CIC ने   तुरंत जानकारी देने के लिए कहा है। कांग्रेस के नेताओं के लिए यह बड़ा मुद्दा है कि देश को यह जानना जरूरी है कि मोदी इंदिरा जी से ज्यादा पढ़े है या राहुल से कम। इस देश में आजतक किसी मंत्री और प्रधानमंत्री की योगयता के लिए सवाल नहीं पूछे गए ,,बजह ! शैक्षणिक योगयता इनके लिए अपेक्षित नहीं है। वैसे प्रधानमंत्री मोदी एम ए   प्रथमश्रेणी से उत्तीर्ण है ऐसा गुजरात यूनिवर्सिटी का दावा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि मौजूदा हालत में देश जिन समस्यायों से गुजर रहा है ,सूखे की चपेट में ७ राज्य के ११ करोड़ से ज्यादा लोग पानी के लिए तरस रहे हैं.. प्रति दिन ४ किसान आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या कर रहे है ,मंदी के कारण बेरोजगारों को नौकरी नहीं मिल रही है।  देश के प्रधानमंत्री को सवाल पूछने के बजाय हमारे सांसद अपने आका को खुश करने के लिए बे सिरपैर के तर्क गढ़ रहे है।   सियासी  बहस प्रधानमंत्री की योगयता को लेकर   हो रही है।  संविधान सभा में जनप्रति

बीजेपी का यह राष्ट्रवाद किस काम का

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" द पार्टी विद  ए डिफरेंस " वाली बीजेपी ३६ साल की हो गयी है यानी ३६ साल के इस सफर में बीजेपी को श्यामा प्रसाद मुखर्जी ,दीनदयाल उपाध्याय ,अटल बिहारी वाजपेयी ,लाल कृष्ण आडवाणी जैसे प्रखर नेताओं का नेतृत्व मिला। लेकिन राष्ट्रवाद को लेकर जितनी चर्चा बीजेपी की आज है उतनी कभी नहीं हुई। कश्मीर में दो विधान दो निशान का विरोध करने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने क्या इसलिए बलिदान दिया था कि अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी कश्मीर में सरकार बना सके। क्या बीजेपी का यही राष्ट्रवाद था कि तिरंगा के सम्मान में खड़े नौजवानों को उनकी ही सरकार में पुलिस की बेरहमी का शिकार होना पड़े।  आज अगर एन आई टी के नौजवान भारत की अस्मिता और तिरंगे के सम्मान के खातिर लाठी खा रहे है तो बीजेपी का यह राष्ट्रवाद किस काम का। भारत के टुकड़े टुकड़े होंगे और आज़ादी का नारा लगाने वाले जे एन यू के तथाकथित सेक्युलर नौजवानों को इसी देश के मीडिया और बुद्धिजीवी लोगों ने हीरो बनाकर पेश किया है लेकिन कश्मीर का वाकया न तो मीडिया के लिए और न ही बुद्धिजीवियों को शर्मसार कर रहा न ही सरकार इसमें ज्यादा प्रचार चाहती है।

अब मैं कन्हैया हो गया हूँ......

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मै हूँ अन्ना ,मैं हूँ केजरिवाल अब मैं कन्हैया हो गया हूँ। .. लेकिन मैं कभी ललितपुर का लोटन नहीं बनना चाहता हूँ  और  न ही  बुंदेलखंड और  नागपुर   के मंगतू राम जैसे हज़ारो किसानो में मेरी कोई  दिलचस्पी है जो महज पचास हज़ार कर्ज न चुकाने के कारण आत्महत्या कर लेता है..मैं आज  कन्हैया इसलिए हूँ कि वह मोदी को गरिया रहा है कल मैं केजरीवाल इसलिए था क्योकि वह मनमोहन सिंह को चोर कह रहा था....मीडिया में आज  सिर्फ"" आज़ादी" की खबरे छप रही है  मानो कुछ संपादको को गांधी के रूप में कन्हैया मिल गए   हो और वर्षो से गुलामी के बेड़ियों में जकड़े टीवी के स्वनामधन्य संपादको को खुली हवा में साँस लेने का मौका मिल गया हो। मीडिया में कही मोदी के समर्थन में जे एन यु के अति उत्साहित छात्रों को राष्ट्रद्रोही बताया जा रहा है तो कही   कुटिल संपादको की फौज जिन्हे मोदी और उनकी सत्ता से चिढ है वे इसे hight ऑफ़   इंटॉलरेन्स बता रहे है.. . एक गरीब माँ का बेटा कन्हैया जिसे आज मीडिया स्टार बता रहा है और लोगों को मानने के लिए विवश भी कर रहा है..कभी केजरीवाल को बेईमान तंत्र के सामने कठोर व्रती ईमानदार पेश कर

मोदी सरकार के इक़बाल पर सवाल

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उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से बीजेपी "मिशन यू पी " की शुरुआत कर रही है... कही से भी करे ये पार्टी  का मामला है ,लेकिन बलरामपुर क्यों ? शायद इसलिए कि बलरामपुर का सरोकार अटल जी से रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी ने  इसे अपना कर्मभूमि माना था और यही से पहला लोकसभा चुनाव लड़ा था । लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में न तो अटल की चर्चा थी ,न ही आडवाणी की और न ही पंडित दीनदयाल की.... सिर्फ मोदी। .इसी मोदी को आगे करके पार्टी ने केंद्र  सहित 7 राज्यों में सरकार बनाली ,लेकिन आज अलग अलग राज्यों में अलग अलग आदर्श और नाम ढूंढे जा रहे है, तो क्या मोदी की चमक फीकी पड़  रही है या यूँ कहे की  मोदी सरकार का इकबाल कमजोर हो  रहा है ? क्या इसके लिए देशी-विदेशी एन जी ओ जिम्मेदार है ? मोदी सरकार की जन - धन और फसल बीमा योजना इस दशक का सबसे बड़ा रेफोर्मेशन माना जा सकता है लेकिन अगर चर्चा सिर्फ जे एन यू  के देश भक्त और देश द्रोही की हो रही है तो माना जा सकता है कि सरकार दिशाहीन है।  बीजेपी के एक विधायक  यूनिवर्सिटी में शराब की बोतल  और कॉन्डोम गीन रहे है और दिल्ली पुलिस पिछले 50 घंटे से कैंपस के बाहर खड़ी हो कर

ये सब रंगमंच की कठपुतलियाँ है

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  विश्वगुरु भारत इनदिनों टीवी गुरुओं के प्रवचनों से थोड़ा कंफ्यूज है। भक्त और तथाकथित गैर भक्त संपादको-पत्रकारों    ने अपनी तरफ से आंदोलन छेड़ रखा है। देश प्रेम और देश द्रोह के मुद्दे पर टीवी स्टूडियो में समुद्र मंथन जारी है फर्क सिर्फ इतना है कि इस मंथन का विष पिने के लिए सिर्फ   दर्शक मजबूर है....        टीवी पर अपनी   ज्ञान धारा बहाने के बाद संपादको का सोशल मीडिया पर बक.... यानी संपादकों के मुख से निकले एक एक शब्द देश के दशा और दिशा तय करने का दम्भ भर रहा है।   तमसो मा ज्योतिर्गमय   की बात करने वालों  का ऐसा अहंकारी भाव पहले शायद ही देखा गया हो। "ये सब रंगमंच की कठपुतलियाँ है जिनकी डोर उपरवाले की उँगलियों में बंधी है। .कब, कौन और कबतक ज्ञानी बना रहेगा ये कोई नहीं बता सकता सिर्फ ऊपर वाला जनता है  हा हा हा .".... दिल पर मत लो यार ........

पीडीपी -बीजेपी बेमेल शादी और बेसुरा सियासी राग

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मरहूम मुफ़्ती साहब कश्मीर की सियासत में एकबार फिर याद किये जाने लगे है। सन  २००२ में जब पहली बार पीडीपी की सरकार कश्मीर में बनी तो लोग मेहबूबा की जगह मुफ़्ती साहब को बजीरे आला देखकर हैरान थे क्योंकि कश्मीर में लोगों ने मेहबूबा की पीडीपी को वोट दिया था। लेकिन कांग्रेस की जिद के कारण मेहबूबा मुफ़्ती के बजाय मुफ़्ती साहब को कोएलिशन हुकूमत की कमान मिली। लम्बे अरसे के बाद  या यूँ कहे कि कश्मीर में यह पहला मौका था जब लोगों का  भरोसा चुनावी प्रक्रिया में लौटी थी। अटल जी ने चुनाव को फ्री और फेयर करबा कर पीडीपी को नेशनल कांफ्रेंस के अल्टेरनेट खड़ा कर दिया था वही  मुफ़्ती साहब वह पहला सी एम थे जिन्होंने हीलिंग टच पॉलिसी अपनाकर न केवल लोगों का दिल जीता बल्कि कश्मीर की सियासत में अपने को स्थापित किया था । बीजेपी आज वाजपेयी के दौर से आगे  निकल चुकी है तो पीडीपी में रियासत से ज्यादा चिंता इस बात को लेकर है कि पार्टी की हालात अगले चुनाव में कैसी होगी ? आतंकवाद  प्रभावित जम्मू कश्मीर आज खबर से  बाहर है। जुम्मे के रोज आई  एस  या पाकिस्तानी झंडे लहराने की खबर को अनदेखी कर दे तो नेशनल न्यूज़ के टेस्ट में य