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अमित शाह : सियासत को फूल टाइम सेवा मानते है पार्ट टाइम नहीं 

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गुजरात असेंबली इलेक्शन के दौरन पत्रकारों के बीच ऑफ द रिकॉर्ड बात  करते हुए अमित शाह जी  से मैंने पूछा था कि सौराष्ट्र में लोगों की बढ़ती उम्मीदें इस बार आपकी पार्टी को नुकसान पंहुचा सकती  है? सौराष्ट्र के इलाके में मैंने लोगों की ये नाराज़गी देखी  थी। गर्मी के सीजन में कई इलाकों में रोज पानी नहीं पहुँच पाता था । जबकि कुछ  वर्ष पहले तक इन इलाकों में हफ्ते में एक बार पानी उपलब्ध होना बड़ी बात होती थी। तब यहाँ टैंकरों से पानी भेजा जाता था। अब हर घर तक पाइप लगे हैं। अमित शाह का जवाब था " लोगों में एस्पिरेशन बढ़ना ,लोगों को तरक्की के साथ चलना  ही तो हमारे लिए परिणाम लाता हैं। बीजेपी दूसरे पार्टी से अलग क्यों है क्योंकि इससे लोगों की उम्मीदें जुडी हैं। जाहिर है नाराज़ भी वे हम से ही  होंगे। " धारा 370  हटाए जाने के प्रस्ताव को लेकर संसद और संसद से बाहर एक मजबूत अपील के साथ वे  यही  एस्पिरशन की बात कह कह रहे थे। यह देश की  आकाक्षां साकार करने का वक्त है।  अब स्टेटसको नहीं चलेगा। सी ए ए के मुद्दे पर भी उन्होंने मजबूती से लोगों के सामने सरकार की राय रखी। देश प्रथम एक संकल्प। कोरोना महाम…

वेस्ट मॉडल (नेहरू ) की सियासत में आज  देशी मॉडल (मोदी ) कश्मीर मामले में  ज़्यदा प्रभावी साबित हुए  

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यह पहला मौका है  जब पाकिस्तानी फौज के जनरल  वाजबा के खिलाफ विपक्षी पार्टियों ने हल्ला बोल कर दिया है। साबिक प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ आर्मी चीफ जनरल   बाजवा से  पूछते हैं  अवाम की  चुनी सरकार को कठपुतली  इमरान खान को आगे करके क्यों हटाई ?  हर बार अवाम के फैसलों को फौज के बूटों के नीचे क्यों रौंदा जाता है ?  कश्मीर के सियासत दा पूछते हैं कि जब सारे अधिकार पंचायत और लोकल बॉडी  को मिल जाएंगे फिर मंत्री ,मुख्यमंत्री को  कौन पूछेगा ? उन्हें जनभागीदारी वाली व्यवस्था नहीं चाहिए ..  दिक्कत दोनों पार है! पाकिस्तान में जनरल जम्हूरियत को पनपने नहीं देना चाहती कश्मीर में अलगाववादी के साथ सियासी पार्टियां  जनता की सत्ता में  भागीदारी नहीं चाहती। जम्मू कश्मीर में डी डी सी बनाये जाने के बाद साबिक मंत्रियों की तीखी प्रतिक्रिया आयी  है कि  डिस्ट्रिक्ट डवलपमेंट कौंसिल ,ब्लॉक डवलपमेंट कौंसिल और पंचायती राज ही अपने इलाके के फैसले लेंगे फिर कैबिनेट और मुख्यमंत्री क्या करेंगे ? गाँधी जी कहते थे देश के विकास का रास्ता गाँव से निकलेगा । कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्री  पी चिदंबरम साहब और पार्टी कहते हैं जम्मू कश्मीर …

सामाजिक न्याय में सामाजिक भागीदारी बढ़ाने से  बिहार की बदल सकती है  सियासत !

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ठिकाने तलाश रही है चाटुकारों की भीड़ शंख फूँकने लगे नये-नये कुवलयापीड़ फिर से पहचान लो, वाद्यवृन्दों में पुरानी गमक और मीड़ दिखाई दे गये हैं गीध के शावकों को अपने नीड़  30 साल पहले बाबा नागार्जुन का सियासत और चुनाव पर अपनी प्रतिक्रिया थी   । शायद बिहार की सियासत में नए चेहरे नयी सोच नहीं बन पाने से बाबा तब भी छुब्ध थे।सबसे  ज्यादा अख़बार पढ़ने वाला बिहार सबसे ज्यादा पत्र पत्रिकाओं को खरीदने वाला बिहार। मोबाईल फोन धारकों की सबसे बड़ी संख्या। सबसे ज्यादा इंटरनेट यूज करने वाला बिहार अगर समय और समकालीन स्थिति से इतना अपडेट है फिर कुछ परिवारों को छोड़कर बिहार में नेतृत्व का इतना बड़ा अकाल क्यों है? क्यों पिछले 30 वर्षो में बिहार अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाने में विफल रहा है ? क्यों पिछले 30 वर्षों में बिहार अपने ऊपर बीमारू राज्य के चस्पा को नहीं हटा पाया है। क्या वजह सिर्फ जातिवाद है या प्रवासी बिहारियों का अपने राज्य के प्रति उपेक्षा ?  वजह कई हो सकती है  लेकिन इतना तय है कि देश के हर आंदलोन में अग्रणी भूमिका निभाने वाला क्रन्तिकारीबिहार की बेबसी हमने कोरोना महामारी के दौर में लोगों की बेचारगी में देखी…

सम्पूर्ण क्रांति वाले बिहार में सियासी भूमि बंजर क्यों हो गयी ? 

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एक मासूम सवाल मैंने बिहार के एक सामजिक कार्यकर्ता से पुछा था ! इस बार बिहार का सियासी  एजेंडा क्या है ?  उन्होंने कहा पैसा ! अब नया कुछ नहीं होता है ,कोई आईडिया नहीं है।   हर चुनाव में यही एजेंडा होता है। मैंने कहा हर बार तो सामजिक न्याय का बोलबाला होता था कोरोना महामारी और आर्थिक तंगी के बीच  पैसा कैसे एजेंडा बन गया। उन्होंने मुझे समझाते  हुए कहा किसी पांच उभरते हुए बिहारी सामाजिक/राजनितिक  कार्यकर्त्ता  का नाम  बताये जिसे बिहार में हर तबके के लोग सोनू सूद की तरह आदर करते हों ? एक ही नेता यहाँ कभी जदयू से कभी बीजेपी से कभी आर जे डी से चुनाव लड़ता है ,दिल्ली में आप लोग लिखते हो कई विधायक इधर से उधर गए।  अरे भाई कही नहीं गए ,कल भी वही थे ,हालात बदलने पर फिर वही आयेंगे सिर्फ एक जगह से दुकान बढाकर दूसरे मॉल में शिफ्ट हो गए  है ।
 सामाजिक न्याय की राजनीति में पिछले 30 वर्षों से  कुछ लोग अपनी  अपनी  जात के ठेकेदार बन गए। ठीक चुनाव से पहले पार्टी में कैंडिडेट का रेट पता चलते ही यहां सामाजिक न्याय का असली खेल चल पड़ता है। यानी सट्टा बाजार जिस तरह एग्जिट पोल से भी बेहतर रिजल्ट देता है वैसे ही बि…

' सहज सरल अरुण जेटली ने सियासत को कभी संवादहीन नहीं होने दिया '

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एक साल ही तो हुए हैं अरुण जी को गए हुए . ... अरुण जेटली का यूँ चले जाना बीजेपी की क्षति से ज्यादा देश के लिए उस विचार का अंत हो जाना है जिसने  मजबूती से लोकतांत्रिक व्यवस्था में बहस की ताकत को आम लोगों के बीच रखा जिसने पार्टी के अंदर और बाहर बहस  की गुंजाइस को कभी दबने नहीं दिया । अटल जी की यह दूसरी पीढ़ी थी ,जो संसद और संसद के बाहर अपनी बुद्धिमता ,बाकपटुता और तर्कों से पार्टी की विचारधारा से अलग अपनी धारा बनांते हुए नज़र आते थे । जिसमे घोर विरोधी भी  वैचारिक रूप से हिचकोले  खाने लगते थे।अरुण जी एक विचार थे ,एक संस्था थे, इससे ऊपर वो अपने युग की आखिरी कड़ी थे। जिसमे आइडियोलॉजी संवाद बनाने ,संपर्क बढ़ाने में कभी आड़े नहीं आयी। अपनी  पार्टी के लोग कभी कभी यह सवाल भी उठाते थे ,किसके हैं अरुण जेटली ? गीता के कर्मयोगी की तरह समभाव का जीवन दर्शन ,जिसका जो बन पड़े करते रहो के आदर्श को अरुण जी ने  भरपूर जिया।  
ऑफ़ द रिकॉर्ड बातचीत के लिए अरुण जी संसद में अपने कार्यालय में पत्रकारों से नियमित मिलते थे। कह सकते हैं कि अरुण जी पार्टी और मीडिया के बीच कड़ी थे। इसमें लीब्रल ,लेफ्ट ,भक्त की कोई कैटेगरी नह…

कश्मीर की सियासत की धारा क्यों बदल गयी ?

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ओ नादान पडोसी आँखे खोलो .आज़ादी अनमोल न इसका मोल लगाओ पर तुम क्या जानो आज़ादी क्या होती है ,तुम्हे मुफ्त में मिली न कीमत गयी चुकाई 
मां को खंडित करते तुमको लाज न आई.अटल जी की संवेदना को आप इन पंक्तियों समझ सकते हैं। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से देश लहुलहान था। कश्मीर में पिछले कई वर्षों से हत्या ,आतंक  का सिलसिला रुक नहीं रहा था। कश्मीर की सत्ता मुख्यधारा और अलगवादी ग्रूपो में बंटी   हुई थी। जम्हूरियत  पुरे मुल्क में अपनी जड़ गहरी कर ली थी लेकिन कश्मीर में सिर्फ सत्ता पर काबिज होने के लिए इसे महज लोकतंत्र का नाम गया था। वह दौर था जब कश्मीर असेंबली से लेकर दिल्ली के संसद भवन पर हमला करके आतंकवादियों ने दुनियाभर में सुर्खियाँ बटोरी थी। लाल चौक पर उपद्रवियों द्वारा पाकिस्तान का झंडा फहराना आम बात थी। इस आतंक और कश्मीर की सत्ता की साजिश का   जवाब सोफ्ट डिप्लोमसी से  ढूंढने खुद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी  ने कश्मीर का दो दिनों का दौरा किया  था। 
2003 के अप्रैल  महीने मे  अटल जी  का कश्मीर दौरा कई मायने मे खास था। अटल जी के पांच साल के सत्ता के  सफ़र की यह एक अभूतपूर्व घटना थी जिसका प्रत्य…

अयोध्या के राम  का मिथिला कनेक्शन :   यह फेविकॉल से भी  मजबूत है 

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हे पहुना अहाँ मिथिले में रहु ना ! मिथिला के लोक गीतों में अपनी जानकी के राम हर घर के अपना पाहून हैं.. प्रभु राम से लोगों का सरोकार सजीव और आत्मीय है। मिथिला की बुजुर्ग महिलाओं को आज भी यह गीत गाते सुना जा सकता है "साग पात तोडी तोड़ी गुजर करेबे यो ,मिथिले में रहियो"। वहीं नयी पीढ़ी की ललनाओं के गीतों में "सजा दो घर को गुलशन सा अवध के राम आये हैं।" अपने पाहून श्री राम को लेकर ऐसा अनुराग आपको शायद ही कही देखने को मिले ... यही नाता अयोध्या के राम लला के साथ भी रहा है । 5 अगस्त को जब राम जन्मभूमि का शिलान्यास हो रहा था तो आप यकीन करेंगे प्रधानमंत्री मोदी के साथ महत्वपूर्ण लोगों की सूचि में अयोध्या के शिलान्यास स्थल पर सबसे ज्यादा मिथिला के लोगों की उपस्थिति थी। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्णकालिक सदस्य के रूप में कामेश्वर चौपाल और विमलेंद्र प्रताप मोहन मिश्रा (अयोध्या राज परिवार से सम्वद्ध लेकिन मिथिला से सरोकार ) अयोध्या के डी एम अनुज कुमार झा अयोध्या के एस पी दीपक कुमार और तो और प्रधानमंत्री को शिलान्यास कराने वाले पंडित श्री गंगाधर पाठक भी मिथ…