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भारत के एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम पर UNDP ने कहा शाबाश इंडिया !

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  देश के सबसे पिछड़े जिलों के  मोदी सरकार के एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम को संयुक्त राष्ट्र के डेवलपमेंट प्रोग्राम ने तारीफ़ की है।  यू एन डी पी का मानना है कि मोदी सरकार  ने   गरीबों को फोकस करके इस योजना से ग्रामीण इलाके की तस्वीर बदल दी है। महज तीन साल में राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान द्वारा   पी एम मोदी के 7 लोकप्रिय   फ्लैगशिप स्कीम को हर गांव में सुनिश्चित कराने की व्यवस्था की गयी थी। यू एन डी पी ने   इस  विशेष प्रोग्राम को दुनिया के दूसरे देश से  भी अपने पिछड़े जिलों में लागू करने का आग्रह किया है  । स्वच्छ भारत अभियान में भी भारत ने दुनिया के लिए एक आदर्श प्रस्तुत किया था और संयुक्त राष्ट्र के खुले में शौच से मुक्त   दुनिया के संकल्प से पांच साल पहले ही  भारत को ओडीएफ   कर दिया गया  था। 2018 के   आकांक्षी जिला योजना में 117  जिले के आला अधिकारियों ने  बैक टू विलेज जैसे कार्यक्रम के जरिये गाँव में   डेरा डाल कर हर केंद्रीय योजना को   सुनिश्चित करने की शानदार पहल  की  थी। केंद्र के इस महत्वाकांक्षी योजना ने   देश के 60000 से ज्यादा पिछड़े गाँव में 100 फीसद शौचालय ,मिशन इंद्रधनु

"नीतीश जी, हमारा स्कूल कब खुलेगा ? "

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छः साल की एक कश्मीरी बच्ची ने प्रधानमंत्री मोदी से यह शिकायत की कि ऑनलाइन क्लासेज में बच्चों को बहुत होमवर्क दिया जाता है। "मैं छोटी सी बच्ची सुबह से दोपहर तक सिर्फ स्कूल का ही काम करती हूँ। इसे ठीक करो मोदी साहब।" और इस शिकायत पर जम्मू कश्मीर के एल जी मनोज सिन्हा ने तुरंत कार्रवाई करते हुए अधिकारियों से जवाब मांग लिया। सुदूर बिहार के ग्रामीण इलाके में पिछले डेढ़ साल से स्कूल बंद हैं ,कोई ऑनलाइन क्लासेज नहीं है ,कोई होम वर्क नहीं है ,सरकारी स्कूल के बच्चों को कोई किताब नहीं मिली है ,क्या किसी गांव के बच्चे ने प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बिहार को कहा है कि उसे होम वर्क क्यों नहीं मिलता ? उसे किताब क्यों नहीं मिलती ? बिहार के ग्रामीण पृष्ठभूमि में पले बढे धैर्य नारायण झा ने दुबई से यह सवाल मुझे पूछा तो शायद मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था। कोरोना महामारी के बीच बंद पड़े स्कूल /कॉलेज ने देश के ग्रामीण अंचल के बच्चों को हाशिये पर धकेल दिया है। एक के बाद दूसरे और अब तीसरे वेव की चर्चा देश में चल रही है। कहा जा रहा है कि इसमें ज्यादा बच्चे संक्रमित हो सकते हैं। विज्ञान और बाजार

कोरोना कहर के बीच स्वच्छ भारत का सुरक्षा कवच 

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कोरोना महामारी के बीच मैंने हालचाल लेने के लिए अपने एक ग्रामीण को फोन किया था।  बहुत ही भावुक शब्दों में उसने फोन करने के लिए धन्यवाद दिया था। गांव के गांव इस महामारी के चपेट में आ गए थे। सबके साथ एक ही परेशानी ,एक ही तरह का संघर्ष। बस्ती का हाल यह था कि एक दूसरे का हाल चाल लेने लोग कहीं  जाने से कतरा  रहे थे । उसने बताया मुश्किल था बचना लेकिन शौचालय/पानी  की सुविधा घर में हो जाने से बार बार बाहर नहीं जाना पड़ा और घर में रहकर कोरोना को मात देने में कामयाब हो गए ।  ये उस भारत की कहानी है जहाँ 6 साल पहले तक महज 38 फीसद लोगों के पास शौचालय था बांकी परिवार खुले में शौच जाने के लिए अभिशप्त थे। महज 5 वर्षों में ग्रामीण भारत में बना लगभग 11 करोड़ शौचालय जो हर परिवार के लिए इस महामारी  के दौरान लॉक डाउन और कुरेन्टाइन में सुरक्षा कवच बन गया था  । वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन भारत में हुई  इस शौचालय क्रांति  के कारण हर परिवार औसतन 50000 रुपया बचाने की बात की थी । भारत में 3 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत को रोके जाने का दावा भी किया था। कोरोना महामारी के बीच स्वछता के लिए बदली सोच ने लोगों को पहले से इम

सियासत से नहीं  मानवता की सेवा से हारेगा कोरोना 

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कुछ लोगों ने बाजार में दवा की भी किल्लत शुरू करवा दी है। ताकि लोगों से ज्यादा कीमत वसूला जा सके। यह कोरोना वायरस अभी कहीं नहीं जा रहा । एक दो साल ऐसे ही वेब बनकर कहीं न कही छा जाएंगे। ऐसा वैज्ञानिकों का दावा है। आज आप वेब की चपेट में नही है और किसी दूसरे की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं। ऐसी मजबूरी कल और किसी के साथ भी हो सकती है।इसलिए अभी कालाबाजारी और भ्रष्टाचार छोड़कर लोगों की मदद कीजिए। यही मदद कभी आपकी इम्यूनिटी बनेगी और कोरोना से बचाएगी। बहुत लोग इस कोरोना महामारी के चपेट से बाहर निकल चुके हैं। लेकिन बहुत लोग आज भी संघर्ष कर रहे हैं।अपनी बची हुई दवा और ऑक्सीमीटर, इंस्ट्रूमेंट्स को निर्थक न फेंके। किसी जरूरत मंद को अगर ट्रांसफर करते हैं तो एक प्रयास में दो जान बचाने का पुण्य आपको प्राप्त होगा। कोरोना के इस जंग को सिर्फ सरकार भरोसे नहीं लड़ा जा सकता बल्कि इस खतरनाक महामारी को सामाजिक भागीदारी से पक्का हराया जा सकता है। मुंबई नगरपालिका के कमिश्नर इक़बाल सिंह कहते हैं कि अक्सर लोग मुझे यह पूछकर हंसते थे कि सिर्फ महाराष्ट्र में ही ,मुंबई में ही इतना कोरोना क्यों है ? वे बताते हैं कि

जनभागीदारी से जीती जा सकती है कोरोना से जंग

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कोरोना महामारी के कारण और निदान को लेकर अभी रिसर्च जारी है। 2019 से 2021 तक हमने कोविड के संदर्भ में जितनी भी टर्मिनोलॉजी याद की वे अब पुराने हो गए अब नये नये  वेरिएंट की चर्चा होने लगी है। दुनिया चीन के वुहान से निकले कोरोना वायरस को भूल चुके अब लोग यू के वेरिएंट ,अफ्रीका वेरिएंट ,इंडियन वेरिएंट का नाम लेने लगे हैं । हम  ग्लोबल विलेज के दौर में जीते हैं जहाँ दुनिया की दूरी काफी सिमट गयी है। पिछले महीने ही विज्ञान पत्रिका द नेचर ने एक शोध प्रकाशित किया था कि भारत के बड़े शहरों में आधे से ज्यादा लोग इन्फेक्टेड होकर एंटीबाडी बना चुके हैं। इस हिसाब से भारत में सेकंड पीक का यह कत्लेआम नहीं होना चाहिए था। लेकिन जैसे ही इंग्लैंड  में तबाही थमी वही वेरिएंट भारत में कोविड को लेकर हमारे सारे सक्सेस स्टोरी के दावे को फेल कर दिया। वैज्ञानिक कहते हैं  इंडियन वेरिएंट  यू के वेरिएंट से ज्यादा इन्फेक्शन स्प्रेड करता है।  पिछले साल कोरोना से लड़ने के लिए हमने कई  महीने अपने को लॉक डाउन में सील कर लिया। हज़ारो जिंदगी इससे बची लेकिन क्या यह लॉक डाउन  बार बार संभव है?  दूसरे वेब का खौफ लोगों के सर चढ़ कर बोल

नक्सली हमले और लकीर के फ़क़ीर सरकार !

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  2013 के झीरम घाटी नक्सली  हमले और  2021   के  बीजापुर हमले में क्या कुछ बदला है. ?. मेरे पुराने लेख से आप खुद निर्णय ले सकते हैं।    बस्तर के  टाइगर को किसने मारा ? क्यों इस टाइगर की मौत पर नक्सलियों ने जश्न मनाया ? वह टाइगर जिसने  पिछले 10   वर्षों में  40  बार मौत को हराया था ,वह टाइगर जिसने नक्सल के खिलाफ अपने 15  से ज्यादा अजीजो को खोया था आखिरकार नक्सली हमले का शिकार बन गया।  कोंग्रेसी विधायक .महेंद्र कर्मा बस्तर का  अकेला टाइगर जिसने दंडकारण्य के रेड कॉरिडोर में माओवादी अधिपत्य की चुनौती  दी थी. . जिसने न कभी केंद्र से न ही कभी राज्य सरकार से कोई मदद की दरकार की और माओवाद की छल -प्रपंच से आदिवासियों को आगाह कराया था .लेकिन आख़िरकार कांग्रेस के अंदुरुनी सियासत के प्रपंच में उलझ कर मारा गया .पिछले दिनों जगदलपुर के दरभा घाटी में अम्बुश लगाकर नक्सालियों ने महेंद्र कर्मा सहित 28 शीर्ष कोंग्रेसी नेताओं  को मौत के घाट उतार दिया। .    महेन्द्र कर्मा को  गोली मारने के बाद नक्सली उनकी डेड बॉडी पर नाच रहे थे। तो क्या यह नक्सल आइडियोलॉजी की जीत थी या फिर केंद्र की मनमोहन सरकार के  नक्सल  अ

देश में इतने शोर के बावजूद लोकतंत्र और  आज़ादी पर सवाल !

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अफ्रीका के एक छोटे देश सेशेल्स में कोरोना वायरस से लड़ने के लिए भारतीय वैक्सीन को हवाई अड्डे पर सम्मान के साथ उतारा गया, मानो यहाँ के लोगों को संजीवनी बूटी मिल गयी हो। उत्सव के माहौल के बीच लोगों ने कहा सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। इसी  आदर्श के साथ भारत ने  दुनिया के 100 से  अधिक देशों में वैक्सीन मैत्री से वसुधैव कुटुंबकम  का सन्देश दिया है। साथ ही  अपने विश्व गुरु के सम्मान पर हक़ जताया है । उधर देशी विदेशी एन जी ओ  प्रायोजित अभियान का सूत्र थामे राहुल गाँधी लगातार भारत के इस नए अवतार पर सवालिया निशान लगा रहे हैं । पिछले दिनों  डेमोक्रेसी इंडेक्स पर हो रही बहस पर  प्रतिक्रिया  देते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने   दो टूक कहा कि "हमारी भी आस्थाएं हैं, हमारी भी मान्यताएं हैं, हमारे मूल्य हैं. लेकिन हम अपने हाथ में धार्मिक पुस्तक लेकर पद की शपथ नहीं लेते।  सोचिए ऐसा किन किन देशों  में होता है ? इसलिए मेरा मानना है कि इन मामलों में हमें खुद को आश्वस्त करने की जरूरत है।   हमें देश में लोकतंत्र की स्थिति पर किसी के सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं है."   उन्‍होंने कहा, 'वे