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दरवाजे पर तालिबान लेकिन कश्मीर से फौज को बाहर निकालने की साजिश

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कश्मीर की वादियों में अलगाववाद की गूंज लगभग थम सी गई है । या यूँ कहें कि लोगों ने अलगाववाद की सियासत को बौना साबित कर दिया है । लेकिन एक नए चेहरे के साथ यह अलगाववाद रियासत की असेम्बली में अपनी आबाज बुलंद कर रही है । कुछ समय पहले तक दोस्त और दुश्मन में फर्क करना मुश्किल नहीं था । अलगाववादी कश्मीर में मुख्यधारा से अलग अपनी सियासत के लिए जद्दोजहद कर रहे थे । लेकिन मुख्यधारा में शामिल होकर कुछ सियासी जमतो ने अलगाववाद की एक नयी परिभाषा गढ़ी है जो शायद पहले से भी ज्यादा खतरनाक है । राज्य के हालिया असेम्बली सत्र इसका उदाहरन प्रस्तुत करता है । बांदीपोरा के एम् एल ऐ निजामुद्दीन भट ने यह कह कर सदन में सनसनी फैला दी कि आर्मी ने एक एनकाउंटर के दौरान दर्जनों घरों को मोर्टार से तबाह कर दिया सौ से ज्यादा लोगों को घरों से बाहर निकाल कर सर्दी में ठिठुरने के लिए मजबूर कर दिया । हंगामा इतना की सदस्य उसी वक्ता आर्मी को रियासत से बाहर करने पर उतारू थे । आर्म्स फाॅर्स स्पेशल पॉवर एक्ट को हटाने जैसे मुद्दे को अपना सियासी हथियार बना चुकी पीडीपी के लिए ये सुनहरा मौका था लेकिन उसकी हवा ओमर अब्दुल्लाह ने एक झटक