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2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तेरी कमीज मैली या मेरी कमीज

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गाँधी के साबरमती आश्रम में लगे कुछ अनमोल शब्दों के बीच एक पोस्टर पर नज़र रुकी। साबरमती आश्रम क्यों ? गाँधी जी कहते हैं "अहमदाबाद कारोबारियों का शहर है और आंदोलन के लिए धन यहाँ जुटाया जा सकता है ........ " . भारत की तस्वीर बदलने में गाँधी को धन की कितनी जरूरत पड़ी थी,ये कोई बहस का मुद्दा नहीं है क्योंकि लंगोटी वाले बाबा के पीछे देश का जनमानस खड़ा था। लेकिन आज के सन्दर्भ में राजनितिक दलों में धन के प्रति बढ़ी जिज्ञासा, ये सवाल जरूर खड़ा करता है कि क्या इस देश में भ्रष्टाचार अब कोई मुद्दा नहीं बनेगा ? भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमानस को एकजुट करके नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे ,ईमानदार और कर्मठ राजनेता उनकी पहचान है । अरविन्द केजरीवाल अन्ना को सीढ़ी बनाकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए लेकिन डी राजा ,कनिमोझी आज जश्न मना रहे हैं तो रोबर्ट बाड्रा पी एम मोदी को ललकार रहा है। रही सही कसर राहुल गाँधी ने पूरी कर दी और वे अब भ्रष्टाचार के तमाम आरोप को ही झूठ बता रहे हैं। तो क्या 2017 के आखिरी महीने तक लोगों ने कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार को भुला दिया है और यह बात राहुल गाँधी

मोदी में आम आदमी ,अपना आदमी को ढूंढती हुई भीड़

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देखो देखो कौन आया ! भीड़ से आवाज आती है गुजरात का शेर आया। मंच से करेक्शन आता है "गुजरात नहीं हिंदुस्तान का शेर आया .. भीड़ से एक बार फिर यह नारा गूंजने लगता है। तबतक पी एम मोदी मंच पर पहुँच जाते हैं। खेम छौ ! मज़मा ..... मोदी भीड़ से संवाद करते हैं .... भूल गए ! नहीं,नहीं ! मानो मोदी हर एक का हाल चाल ले रहे हों और हर से संवाद बनाने की कोशिश कर रहे हो .. ये है मोदी मैजिक जो आम लोगों के सर चढ़ कर बोलता था,मानो मोदी हर गुजराती के दिल में बसता है । तो क्या इस मुश्किल हालत में भी  मोदी ने सीप्लेन शो जैसा असंभव शो को संभव बनाया है और हार को जीत में तब्दील कर दिया है ? गुजरात में बीजेपी की जीत मोदी की सबसे बड़ी परीक्षा थी और वे इसमें कामयाब हुए हैं । यह मोदी मैजिक मैंने हिमाचल में भी देखा .. .पहाड़ी इलाके में इतनी बड़ी भीड़ मैंने कभी नहीं देखी थी.जितने लोग सुनने वाले की थी उतनी ही देखने वालो की। बहार निकलते हुए एक वुजूर्ग से मैंने पूछा अभी जा रहे हो ? भाषण तो चल रहा है। वुजूर्ग का जवाब था मैं मोदी को देखने आया था ,वो यहाँ पहले भी आते थे ,मैं उन्हें यह देखने आया था कि वे वैसे ही हैं जैसे 30

क्या गुजरात का चुनाव सैकोलॉजिकल वॉर है

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किसने कहा गब्बर सिंह टैक्स तो किसने कहा तू चाय बेच ,औरंगजेब ,शहजादा ,साहब हर दिन सोशल मीडिया के ट्रेंडिंग गुजरात असेंबली चुनाव में अखबारों और टीवी के हैडलाइन बनाती है। तो क्या गुजरात का चुनाव सैकोलॉजिकल वॉर में तब्दील हो गया और मीडिया सोशल मीडिया के प्रोपेगंडा में ट्रैप होकर रह गया है। तो क्या गुजरात का प्रोग्रेसिव समाज राजनीतिक पार्टियों के बहकावे फंस गया है। 22 साल के बीजेपी शासन के एन्टीइन्कम्बन्सी की चर्चा यहाँ नहीं हो रही है ,सरकार के भ्रष्टाचार की चर्चा कांग्रेस पार्टी अपने मैनिफेस्टो में भी नहीं कर पायी है। तो मुद्दे क्या हैं " पाटीदार " वही पाटीदार समाज जो गुजरात में सबसे धनी और बुद्धिमान समाज है उसे आज अनामत यानी आरक्षण चाहिए। नेशनल सैंपल सर्वे में इस समाज को सबसे ज्यादा प्रोग्रेसिव माना गया है और है भी ,पार्टी चाहे कांग्रेस हो या बीजेपी पाटीदार समाज को सबसे ज्यादा सीटे मिली है। यानी 13 फीसद की आवादी वाला पटेल समाज ने दोनों पार्टियों के 140 सीटें झटक ली है। राज्य में सरकार जिसकी भी बने पटेल की भूमिका अहम होगी। कांग्रेस इस चुनाव में फूंक फूंक कर कदम रख र

राहुल अपनी एंग्री यंगमैन वाली इमेज कब छोड़ेंगे ?

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एक अनौपचारिक चर्चा में मैंने राहुल गाँधी से पूछा था " राहुल जी आप अपनी एंग्री यंगमैन वाली इमेज कब छोड़ेंगे ? शायद लोगों के बीच आपकी यह "इमेज" आकर्षण नहीं बना पायी है। मेरे सरल सवाल का जवाब राहुल जी ने बड़े जटिल भाव से दिया और उस भाव में मैं अपना जवाब नहीं पा सका था। पिछले हफ्ते हिमाचल रैली में राहुल के उसी इमेज से दो चार होना पड़ा। लम्बे इन्तजार के बाद राहुल सभा स्थल पहुंचे और माइक मिलते ही आ गए अपने तेवर में। फिर होना क्या था ,एक झलक पाने के लिए घंटों से इन्तजार करती भीड़ मह ज २ से 4 मिनट का वक्त राहुल को नहीं दे पायी। मुझे लगा शायद दिल्ली और हिमाचल के कांग्रेस ऑफिस में कोई तालमेल नहीं है बरना गुजरात का भाषण राहुल हिमाचल में क्यों दे रहे हैं। कही ऐसा तो नहीं चने के झाड़ पर चढ़ाकर कुछ कांग्रेसी ने ही राहुल गाँधी को 2019 का विकल्प बना दिया है।  कुछ बुजुर्ग बीजेपी में भी नए समीकरण का बेसब्री से इन्तजार कर रहे हैं तो कांग्रेस के बुजुर्ग ने दमघोटू दिल्ली में एक नए सियासी समीकरण की नीव रख दी है। राहुल जी को कांग्रेस का नेता होने से कौन रोक सकता है ? लेकिन देश उन्हें नेता मान ले

मैं हिमाचल प्रदेश !

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सुजानपुर का एक पहाड़ी गाँव पट्टी 30 -35 घरों के इस गांव में महज 85 मतदाता है। 14  गांव के पंचायत में महज 2100 वोटर।  यह तस्वीर उस हिमाचल की है जहाँ इनदिनों एसेम्ब्ली चुनाव की सरगर्मी पीक पर है। स्वच्छता और फैमिली प्लानिंग ने  इन इलाकों में खुशहाली का मूल मंत्र दिया है। खास बात यह है कि पहाड़ का पानी और जवानी अपने मूल स्थान को नहीं छोड़ा है।  हिमाचल प्रदेश ,हिमालय की खूबसूरत पहाड़ी सिलसिलो में स्थित भारत का यह छोटा राज्य जम्मू कश्मीर के कुल क्षेत्रफल के एक तिहाई यानी 55 हजार कि मी है।  तकरीबन 64  लाख की आवादी वाले इस राज्य ने लोकतान्त्रिक व्यवस्था में जो कुछ हासिल इन 48 सालों में किया है ,देश के दूसरे प्रान्त इस मुकाबले में कोसो दूर है।  दुर्गम पहाड़ी इलाके में चमचमाती सड़को का जाल ,तक़रीबन हर गांव में बिजली और पानी ,पॉलीथिन बैग और तम्बाकू पर पूर्ण प्रतिबन्ध। सियासी पार्टियों के लिए मुद्दे ढूँढना यहाँ इतना आसान नहीं है।  पहाड़ी राज्यों में हिमाचल प्रदेश ने अपनी खास जगह बनायीं है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस पिछड़े प्रदेश को तरक्की के रस्ते पर लाने में बीजेपी और कांग्रेस के स्थानीय ने

बुदजिलों का न तो कोई ईमान होता है न ही मुल्क: गौहर अहमद भट को सलाम !

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बीजेपी के एक तेज तर्रार युवा नेता गौहर अहमद भट को गला रेत कर हत्या कर दी गयी। सोपिया ,कश्मीर के 30 साल का यह नौजवान बतनपरस्ती को अपना ईमान माना था ,मुल्क की मुख्यधारा से जुड़कर गौहर ,कश्मीर में लोकतान्त्रिक संस्थाओं को मजबूती देना चाहता था। लेकिन जिस देश में सत्ता से बेदखल होते ही पूर्व गृह मंत्री चिदंबरम को  कश्मीर में पॉलिटकल प्रोसेस फार्स लगता हो और उन्हें ग्रेटर  आज़ादी में ही कश्मीर समस्या का समाधान दिखता हो ऐसे नेताओं के लिए गौहर भट की शहादत का क्या मायने हैं। जिस रियासत में आतंकवाद के बढ़ते खौफ से घबराकर (कश्मीर पर अपना पुश्तैनी हुकूमत मानने वाले) फ़ारूक़ अब्दुल्लाह पुरे परिवार के साथ लन्दन भाग खड़े हुए हों,उसी रियासत के  सोपिया में हिज्बुल मुजेहिद्दीन के खौफ के बीच गौहर भारत की आन वान शान  के लिए जूझता रहा।  कश्मीर की आज़ादी ,स्वायत्ता और मुस्लिम बहुल कश्मीर के लिए विशेष दर्जा माँगने वाले और छदम धर्मनिरपेक्षता के बीच अलगावाद को निरंतर शह देने वाले लोगों को गौहर अहमद भट की मौत से कोई सदमा नहीं लगेगा। ऐसे सैकड़ो पोलिटिकल एक्टिविस्ट कश्मीर में मारे गए हैं। लेकिन गौहर की मौत ने कश्

क्यों मीडिया इस चुनाव में हाँफता हुआ नज़र आ रहा है

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गुजरात और हिमाचल प्रदेश एसेम्ब्ली चुनाव इस बार कुछ खास है।आम मतदाताओं के बीच शांति है लेकिन मीडिया में हंगामा है। कांपते हाथ ,थरथराते होठ से हिमाचल चुनाव की कमान संभाले राजा वीरभद्र सिंह अपनी पार्टी के स्वयंभू नेता है। दिल्ली से आये कांग्रेस के स्टार प्रचारक शिमला में मस्त मौसम का मज़ा ले रहे हैं और 84 साल का बुजुर्ग सोशल मीडिया के जरिये चुनावी जंग में देश के सबसे बड़े चुनावी अखाड़े के महारथी को चुनौती दे रहा है।  यानी एक नए मीडिया अवतार ने पुराने कलमकार और टी वी पर बक बक कर  राजनितिक लाइन खींचने वाले वरिष्ठ पत्रकारों की छुट्टी कर दी है। हिमाचल जैसे छोटे राज्य में 40 लाख स्मार्ट फ़ोन धारक हर दिन 1 जी बी डेटा इस्तेमाल कर रहे हैं। जाहिर है हर छोटे बड़े इवेंट वे अपने फ़ोन पर लाइव देख रहे है। वीरभद्र सिंह के करीबी कहते हैं कि कंटेस्ट तगड़ा है ,सोशल मीडिया ने उन्हें मुकाबले में खड़ा कर दिया है।  10 नौजवानो की एक टीम आई फोन ,स्मार्ट फोन और कैमरे से लैश सी एम वीरभद्र सिंह के साथ साये की तरह मुस्तैद रहती है। 22 -25 साल के गबरू नौजवान ब्रांडेड पोशाक में एक नए किश्म की पत्रकरिता की नीव डाल रहा

एक सियासत ऐसी भी

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भारत में टोपी को लेकर कई मिथ हैं तो कई गौरवशाली परम्परा  लेकिन हिमाचली टोपी को लेकर इन दिनों कुछ गजब की सियासत चल रही है। बीजेपी वाली टोपी या कांग्रेस वाली टोपी। हालाँकि पी एम मोदी लाल और हरा दोनों रंगो की टोपी पहनते हैं। लेकिन चुनावी सरगर्मी के बीच टोपी की सियासत ने कारिगरों की मुस्कान लौटा दी है। आज हिमाचल प्रदेश की चुनावी सरगर्मी   ने टोपी के रंगो को सियासत की कराही में भिगो दिया है। यानी लाल रंग की टोपी पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूम्मल पहनते है तो मौजूदा मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह हरे रंग की टोपी पहनते हैं। कार्यकर्ता अपने नेता की पसंद का सम्मान कर रहे हैं लेकिन जनता किस रंग की टोपी पहनती है ये देखना अभी बांकी है।  खुद प्रधानमंत्री मोदी हिमाचल दौरे  में लाल- हरा दोनों रंगों की  टोपी पहन चुके हैं ,लेकिन सियासत  तो सियासत है ,सो प्रधानमंत्री ने लाल रंग की हिमाचली टोपी अपने इस्रायल दौरे पर पहनी तो राजा वीरभद्र सिंह के लोगों को सियासत का एक मौका मिल गया । हालाँकि कारीगरों ने इसे राज्य और गरीब कलाकारों का सम्मान माना। और इस बहस ने उनके कारोबार को बढ़ा दिया  हि

धार्मिक स्थलों को मिले उद्योग का दर्जा

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"प्रधानमंत्री  कहते हैं कि केदारनाथ का पुनर्निर्माण करने आए हैं। इस अलौकिक भूमि के स्वामी स्वयं    केदारनाथ हैं। अगर कोई ये भ्रम पाल ले कि वो बाबा केदारनाथ का पुनर्निर्माण कर सकता है तो इससे बड़ा अपमान उत्तराखंड की पवित्र भूमि का नहीं हो सकता " कांग्रेस प्रवक्ता आर पी एन सिंह अपने प्रेस रिलीज से क्या साबित करना चाहते हैं ये इस देश की महान पार्टी ही समझ सकती है लेकिन इतना तय है कि इस पार्टी के नेतृत्व ने साबित कर दिया है कि उनके पास कोई विज़न नहीं है।150 साल पुरानी पार्टी अगर पुनर्निर्माण की आलोचना करती है तो माना जाएगा कि बदले भारत से इस महान परिवार का संवाद नहीं है। 2013 के हादसे के बाद यह पहला मौका है जब हिमालय के दुर्गम पहाड़ी में स्थित बाबा केदारनाथ के दर्शन के लिए 5 लाख से ज्यादा लोग पहुंचे हैं। जाहिर है यात्रियों की भारी भीड़ ने स्थनीय उद्योग और रोजगार को उत्साह से भर दिया है और इस सिलसिले को प्रधानमंत्री ने आगे बढ़ाया है।  वैभवशाली  सांस्कृतिक परम्पराओं का यह देश दुनिया के लिए हमेशा कौतुहल से भरा रहा है। लेकिन यथास्थिति बनाये रखने का आग्रह और सियासी मजबूरी ने कभी इ
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आदरणीय  नीतीश कुमार जी , प्रख्यात अर्थशास्त्री श्री  जगदीश भगवती ने कहा था कि उच्च विकास दर गरीबो के लिए भी फायदेमंद हो सकता है और गरीब जनता इसका इनाम भी देती  है .बिहार मे आपको  पिछले 15 वर्षो से  मिला समर्थन इस बात को पुष्टि करता है कि जातीय फॉर्मूले के ध्वस्त करके बिहार के लोगों ने आपके सुशासन पर भरोसा कायम रखा है । लेकिन १४-१८ घंटे की बिजली ,चमचमाती सड़कों के बीच ग्रामीण अंचलो में बढ़ती बेरोजगारों की फ़ौज ,कृषि क्षेत्रो में बढ़ रहे पलायन ,ऊपर से नीचे तक फैले भ्रष्टाचार और लगातार बंद पड़े उद्योग आपके सुशासन की कलई खोल रहा है। अपने हलिया बिहार दर्शन में  मैं इस सचाई से अवगत हुआ किआपके सुशासन की धार कुंद पड़ती जा रही है और जनता दलालों के संगठित गिरोह के सामने बेवस है और आप नशाबंदी ,बाल विवाह और दहेज़ जैसी सस्ती लोकप्रियता लेने को आतुर हैं। ये पिटे हुए मुद्दे हैं ,ये आपको जननायक नहीं बनाएंगे।  . जिस बिहार मे बाढ़ के नाम पर हर साल २००-२५० करोड़ रूपये का घोटाला आम बात है  ,कभी चारा घोटाला ,सृजन घोटाला ,कभी साडी घोटाला तो कभी अलकतरा घोटाला ,घोटालों की लम्बी फेहरिस्त  ने आज चारा घो
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इनदिनों  दिल्ली के मीडिया में इतना शोर क्यों है भाई ? क्या इसलिए कि   मीडिया अपने अधिकारों को लेकर ज्यादा सजग हो गया है या फिर सोशल मीडिया ने उसकी जमीन खिसका दी है। या फिर खबरों और तर्क के आकाल में मीडिया के स्वनामधन्य एंकर  अपनी सुविधा से  नए तर्क गढ़ रहे हैं। लेकिन अपने अपने तर्कों को लेकर जिस बेहूदापन और ओछी हरकत को टी आर पी बनाया जा रहा है वह कही से लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ नहीं लगता बल्कि यह   सभ्य समाज के लिए गाली है। गौरी लंकेश की दुखद हत्या की खबर  को दिल्ली के   मीडिया ने  मसाला बना दिया। ,लोकतंत्र में आज़ादी के नाम पर देश के प्रधानमंत्री तक   को गाली देने में कोई कोताही नहीं बरती यह जानते हुए भी कि घटना कर्नाटका में हुई जवाब कांग्रेस के मुख्यनत्री सिद्धिरामय्या को देना है लेकिन सवाल नरेंद्र मोदी से पुछा जा रहा है।  यह इसलिए कि घटना के तुरंत  बाद राहुल गाँधी ने ट्वीट करके इस हत्या में बीजेपी और  आरएसएस का नाम लिया था। एन डी टी वी के वरिष्ठ एंकर रवीश कुमार  कहते है यह शक इसलिए पैदा करता है क्योंकि गौरी लंकेश संघ की विचारधारा के खिलाफ लिखती रही है। लेकिन अल्ट्रा माओइस्ट विचार

देश बदल रहा है ,आगे बढ़ रहा है

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पी एम मोदी के मंत्रिमंडल विस्तार से   कई भ्रम टूटे   हैं। मीडिया के कुछ वरिष्ठ लोगों का यह भ्रम कि सत्ता के अंदर और बहार की खबर वे ब्रेक कर सकते हैं। कुछ लोगों का यह भ्रम कि  सरकार अक्सर   मीडिया की नजरों से व्यक्तित्व की परख करती है। कुछ लोगों का यह भ्रम कि मंत्रिमंडल का   विस्तार  जाति और क्षेत्र से तय होता है  । कुछ बुद्धिजीवियों का यह भ्रम कि   सरकार के हर फैसले में आर एस एस का नाम जोड़कर खबरों में बहस की गुंजाइस बनायीं जा सकती है। पिछले एक हफ्ते से सोशल मीडिया मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर  जिन फेक खबरों को हवा दे रहा था। हमारे अनुभवी टीवी  पत्रकार उसे सच मानकर डंके की चोट पर और   खबर तह तक का विश्लेषण कर रहे थे।  सरकार और पॉलिसी को लेकर हमने जो फ्रेम बनाया है उसके इतर देखने समझने की सोच हमने विकसित नहीं की है। पिछले 28  वर्षो से गठबंधन की सरकार की पैटर्न हमारी सोच को लगभग कुंठित कर रखी है। जाहिर है इस फ्रेम से बाहर न तो देश के बुद्धिजीवी निकल रहे हैं न ही मीडिया और न ही नौकरशाही। जरा सोचिये आर के सिंह , सत्यपाल  सिंह ,  अल्फोंज कन्नाथम ,हरदीप   सिंह  पुरी ऐसे कई नाम हैं जिनके

जिम्मेदारी सबकी बनती है

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यह तन विषय की बेलरी, गुरु अमृत की खान। सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान...  भारत की गुरु -शिष्य  परम्परा में कबीर ने भी मुक्ति और मोक्ष के लिए गुरु को ही साधन माना था। पंजाब हरियाणा जैसे राज्यों में गुरु की इस  शानदार रिवायत  ने सामाजिक जीवन में इंसानियत के आदर्शो को गौरवान्वित किया था। और जीवन में त्याग को ही आदर्श बना दिया। पंचकूला में  32 लोगों की जानें बाबा के  आदर्शो को बचाने में नहीं गयी है बल्कि  बाबा के  अहंकार और लालच ने मासूमो की जान ले ली है।  जब से तथाकथित गुरुओ  ने " डेरा " को स्थायी निवास मानना कर शुरू  दिया।  डेरा का रास्ता सत्ता और बाजार से जोड़ दिया तबसे बाबा  राम रहीम ,रामपाल ,आशाराम ,भीमानंद ,नित्यानंद,जय गुरु देव ,रामवृक्ष  जैसे गुरुओं ने बाज़ार और भक्तो के जरिये अपने डेरों को पावर सेंटर /वोट बैंक में तब्दील कर दिया और सियासी दलों को  डेरा के  चौखट पर ला खड़ा कर दिया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल मीडिया के उन  बुद्धिजीवियों से भी है जो कभी डेरा को आध्यात्मिक केंद्र बताकर टीवी चैनलों पर उनका महिमामंडन करते हैं। और कभी बाबा को चरित्रहीन बताकर उनके भक्तो को भ

बाढ़ :उपेक्षित बिहार हर बार सियासत का ही शिकार होता है

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“ बाढ़? ”  “बकरा नदी का पानी पूरब-पश्चिम दोनों कछार पर ‘छहछह’ कर रहा है। मेरे खेत की मड़ैया के पास कमर-भर पानी है।” “दुहाय कोसका महारानी!”  इस इलाके के लोग हर छोटी-बड़ी नदी को कोसी ही कहते हैं। कोसी बराज बनने के बाद भी बाढ़?... कोसका मैया से भला आदमी जीत सकेंगे?  ..लो और बांधों कोसी को!  “अब क्या होगा?”  कल मुख्यमंत्रीजी ‘आसमानी-दौरा’ करेंगे। ...केंद्रीय खाद्यमंत्री भी उड़कर आ रहे हैं। नदी-घाटी योजना के मंत्रीजी ने बयान दिया है। और रिलीफ भेजा जा रहा है। चावल-आटा-तेल-कपड़ा-किरासन-तेल- माचिस-साबूदाना-चीनी से भरे दस सरकारी ट्रक रवाना हो चुके हैं। ...कल सारी रात विजिलेंस कमिटी की बैठक चलती रही। फणीश्वरनाथ रेणु के 40 साल पुराने संस्मरण को पढ़कर लगा ,कुछ भी तो नहीं बदला है। .बिहार, बाढ़ और भ्रष्टाचार की कहानी में। गंगा ,सोन ,पुनपुन ,फल्गु ,कर्मनाशा ,दुर्गावती ,कोसी ,गंडक ,घाघरा ,कमला ,भुतही बलान ,महानंदा इतनी नदियाँ जो जीवन धारा बन सकती थी लेकिन साल सिर्फ तबाही लाती है और हमारी सरकार फिर  अगलीबार का इन्तजार करती है।   बिहार के 18 जिलों में जलप्रलय है 2 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित है। 15

गाली से न गोली से बात बनेगी बोली से : पी एम मोदी का नया संकल्प

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आज़ादी के 70 वें सालगिरह पर प्रधानमंत्री मोदी का लाल किला से सम्बोधन एक नयी शुरुआत ,एक नयी पहल का आगाज है ।   नए भारत के संकल्प के साथ  कश्मीर पर सरकार का दृष्टिकोण कश्मीरियत से लवरेज है  जिसमे हिंसा की कोई जगह नहीं होगी। "गाली से न गोली से बात बनेगी गले लगाने से प्यार की बोली से " क्या वाकई में ऐसे हालत कश्मीर में है या प्रधानमंत्री ने  इस दर्शन को आगे रखकर एक नयी शुरुआत का मन बनाया है ?  याद कीजिये "बम से न गोली से बात बनेगी बोली"  से अटल जी  के दौर में तत्कालीन सी एम मुफ़्ती मोहम्ममद सईद ने यह नारा दिया था। कश्मीर में एक नयी पहल की जीद  अटल जी ने  की थी । याद दिलाने की जरूरत यह भी है कि अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में मिलिटेंसी इससे ज्यादा गंभीर थी। श्रीनगर अस्सेम्ब्ली और संसद पर  अटैक उन्ही के दौर में हुआ था लेकिन वाजपेयी ने कश्मीर में अपना तार कभी टूटने नहीं दिया। जो लोग कहते थे अब्दुल्लाह के बिना कश्मीर नहीं ,बिना रिगिंग के वोट नहीं वहा फ्री एंड फेयर इलेक्शन करवाकर गैर अब्दुल्लाह फैमिली के शख्स को शासन में आने का मौका उन्होंने  फ़राहम कराया। पहलीबार यहाँ जम्ह

इन १००००० बच्चो को किसने मारा

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5 दिनों में 60 बच्चो की मौत ! जिम्मेदार कौन ? सन 1978  से 1  लाख बच्चों  ने गोरखपुर  के इसी बी आर डी  मेडिकल कॉलेज ,हॉस्पिटल में दम तोडा है। तो इस शर्म से हमारे तीन पीढ़ियों के नेताओं को डूब मरना चाहिए।  उत्तर प्रदेश के 7  जिले और बिहार के तीन जिलों में मानसून सीजन  में  हर साल हजारो बच्चो पर  इंसेफ्लाइटिस /  ब्रेन फीवर मानो काल  बन कर टूटता है और हर साल 700 -800 बच्चो को अपनी  माँ के आँचल से छीन लेता है। तक़रीबन 3 करोड़ की आवादी वाले पूर्वांचल के इन जिलों में एक मात्रा यह हॉस्पिटल अपने टूटी फूटी व्यवस्था से हजारो माताओ को यह आस्वस्त करता रहा कि उसका बच्चा जरूर घर लौटेगा लेकिन अक्सर माँ अपने सूनी आँचल के साथ ही घर लौटती है। वजह इलाके के नीम /हाकिम से इलाज कराकर ,थके हारे माता पिता बी आर डी मेडिकल कॉलेज के शरण में आता  है लेकिन अफ़सोस इन  40  वर्षो में इस महामारी से लड़ने के लिए हमने बिलखते माताओ को अकेले छोड़ दिया।  मीडिया आज सी एम योगी से जवाब मांग रहा है ,माँगना चाहिए क्योंकि वे आज मुख्यमंत्री हैं और 20 वर्षो से गोरखपुर का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं लेकिन सवाल उन साबिक मुख्यमंत्रियों से 

एक बड़े सियासी बेईमानी का पर्दाफाश होने वाला है

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आज़ादी के 70 वें सालगिरह पर एक बड़े सियासी  बेईमानी  का पर्दाफाश  होने वाला है। इस पर्दाफाश की चिंता ने सियासी तौर पर एक दूसरे के दुश्मन समझे जाने वाले लोगों को एक मंच पर ला दिया है। जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री अचानक अपने घोर विरोधी फ़ारूक़ अब्दुल्लाह से मिल रही है तो सी एम मेहबूबा मुफ़्ती कश्मीर के सियासी रहनुमाओ को गोलबंद कर रही है। चौंकिए नहीं ! संविधान की हिफाजत की दुहाई देते हुए हुर्रियत लीडर सैयद अली शाह गिलानी कश्मीर बंद का आह्वान कर रहे हैं ,कल तक कश्मीर के विलय पर ही सवाल उठा रहे थे। आखिर ये हंगामा क्या है ,किसने बड़पा है ? सवाल बहुत हैं लेकिन जवाब ढूंढने से पहले यह जानना जरूरी है : 1 . क्या आपको मालूम है जम्मू कश्मीर ऐसा एकलौता राज्य है जहाँ सैकड़ो वर्षो से रह रहे बाल्मीकि समाज के  लाखों लोगों  को झाड़ू उठाने /सफाई करने के अलावा कोई नौकरी नहीं मिलती।  2. यह कि पिछले 70 वर्षों से राज्य में रह रहे लाखों लोगों को नागरिकता नहीं मिली है और न ही ये लोग सरकारी नौकरी और रासन कार्ड हासिल कर सकते  3 . जम्मू कश्मीर से बाहर अगर बेटी ने शादी की तो उसकी नागरिकता ख़तम हो जाती है और उसके बच

समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई.

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समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई...हाथी से आई, घोड़ा से आई...... लाठी से आई, गोली से आई.. लेकिन अंहिसा कहाई, समाजवाद..   गोरख पांडेय ने क्या खूब लिखा था। तब जब ये आज के समाजवादी कही  चर्चा में नहीं थे। तो क्या कांग्रेस की तरह लोहिया जी के चेलों ने भी  समाजवाद  को पूंजीवाद के  चासनी में डालकर एक अलग फार्मूला  बना डाला  ? तो क्या भारत में समाजवाद सिर्फ सत्ता हथियाने का जुगाड़ मंत्र  बना और अपने ही भार से दब कर बिखर गया। पहले लोग कहते थे समजवादी और मेढक को तौलना बराबर का काम है लेकिन आज  एक राज्य में पुत्र मोह में सरकार चली गयी तो एक राज्य  में पुत्र ने सत्ता को परमानेंट बनाने के लिए पिता को ही बर्खास्त कर डाला।  तो शायद गोरख पांडेय ने सही कहा था। परसों ले आई ,बरसो ले आई ,हरदम अकासे तकाई। समाजवाद उनके धीरे धीरे आई।  समजवादी कभी फासीवादी ताकतों से लोहा लेने के एकजुट होते थे  तो आज  उनके लिए साम्प्रदायिकता सबसे बड़ी चुनौती बन गयी   है। यानी ये सारे पैतरे सिर्फ वोट बैंक के लिए होता है। लेकिन बबुआ को सत्ता सौपने को आतुर समजवादी यह भूल जाते है कि अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी आज अपनी बा