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सामाजिक न्याय में सामाजिक भागीदारी बढ़ाने से  बिहार की बदल सकती है  सियासत !

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ठिकाने तलाश रही है चाटुकारों की भीड़ शंख फूँकने लगे नये-नये कुवलयापीड़ फिर से पहचान लो, वाद्यवृन्दों में पुरानी गमक और मीड़ दिखाई दे गये हैं गीध के शावकों को अपने नीड़  30 साल पहले बाबा नागार्जुन का सियासत और चुनाव पर अपनी प्रतिक्रिया थी   । शायद बिहार की सियासत में नए चेहरे नयी सोच नहीं बन पाने से बाबा तब भी छुब्ध थे।सबसे   ज्यादा अख़बार पढ़ने वाला बिहार सबसे ज्यादा पत्र पत्रिकाओं को खरीदने वाला बिहार। मोबाईल फोन धारकों की सबसे बड़ी संख्या। सबसे ज्यादा इंटरनेट यूज करने वाला बिहार अगर समय और समकालीन स्थिति से इतना अपडेट है फिर कुछ परिवारों को छोड़कर बिहार में नेतृत्व का इतना बड़ा अकाल क्यों है?     क्यों पिछले 30 वर्षो में बिहार अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाने में विफल रहा है ? क्यों पिछले 30 वर्षों में बिहार अपने ऊपर बीमारू राज्य के चस्पा को नहीं हटा पाया है।  क्या वजह सिर्फ   जातिवाद है या प्रवासी बिहारियों का अपने राज्य के प्रति उपेक्षा ?  वजह कई हो सकती है  लेकिन इतना तय है कि देश के हर आंदलोन में अग्रणी भूमिका निभाने वाला क्रन्तिकारी   बिहार की बेबसी हमने कोरोना महामारी के दौर में लोगों की