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पंडित फ़िरोज़ खान के बहाने सनातन और महामना की परम्परा पर सांप्रदायिक आरोप !

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अपने यहां जनतंत्र,एक ऐसा तमाशा है, जिसकी जान..मदारी की भाषा है बनारस के सुदामा पांडे धूमिल को शायद यह आभास था कि मजबूत लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ बना मीडिया जब महामना मदन मोहन मालवीय के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को बहस में लाएगा तो वो जम्बूरे और मदारी की भाषा में ही समझने और समझाने की कोशिश करेगा। बाबा विश्वनाथ की काशी , बी एच यू और यहाँ का जनजागरण चेतना सदियों से समाज को धर्म,अध्यात्म और मानव मूल्यों के प्रति सचेत करती रही है। बी एच यू में डा फ़िरोज़ खान की नियुक्ति को लेकर छिड़ी बहस के बीच यह याद दिलाना जरुरी है कि कभी बी एच यु में एक नियुक्ति को लेकर बबाल हुआ तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने नव नियुक्त वाईस चांसलर को बनारस पहुँचने नहीं दी थी बनारस के प्रबुद्ध लोग बताते हैं कि काशी की आवाज तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा जी बहुत गम्भीरता से सुनती थीं। 1973 बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में सुरेंद्र सिंह की नियुक्ति हुई थी,जो हिन्दू नाम धारी ईसाई थे,क्रास पहनते थे। उनकी नियुक्ति की घोषणा मात्र से बनारस में बवाल हो गया।विश्वविद्यालय के छात्र संघ,कर्मचारी संघ,अध्