आतंकवाद को खत्म करने के लिए क्या सरकार तैयार है ...

१ जनवरी २००९ साल की पहली शुरुआत हमने एकबार फ़िर आतंवाद के हमलों से लहूलुहान होकर की है । ठीक उसी तरह जैसे २००८ में हमने नए साल की शुरुआत आतंकवादी हमले के दंश से की थी । उत्तर प्रदेश के रामपुर के सी आर पी ऍफ़ कैंप पर हमला करके आतंकवादिओं ने ७ जवानों को शहीद कर दिया था । २००८ में हमने ६४ बड़े हमले देखे जिसमे हमने १००० से ज्यादा लोगों को सदा सदा के लिए खो दिया । मुंबई धमाके इसी की एक कड़ी थी, जिसने आतंकवाद के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए हमारी सरकार को मजबूर कर दिया है । हमारे जेहन से यह छाप जरूर मीट गई होगी , लेकिन भारत में आज भी हजारों ऐसे परिवार है जिनके आंसू नही सूखे हैं । असम में हुए इस सिरिअल ब्लास्ट में एक बार फ़िर ६ लोग शहीद हुए है और दर्जनों घायल हुए है और हमारी हुकूमत सिक्यूरिटी लेप्स का बहाना रो रही है । असम के मुख्यमंत्री यह कहकर अपना पल्ला झार रहा है कि उसके पुलिस इस तरह के हमले रोकने के काबिल नहीं है , लेकिन क्या अक्षम पुलिस का नेतृत्वा करने वाला सी एम् राज्य चलाने के लिए सक्षम है ? याद कीजिये असम में यह धमाका उस समय हुआ जहाँ मुल्क के होम मिनिस्टर पहुँचने वाले थे और उनकी सुरक्षा में चप्पे चप्पे पुलिस तैनात थी । लेकिन आतंकवादियों ने धमाके को अंजाम दे कर यह साबित कर दिया है कि सरकार की ये आधी अधूरी तैयारी नाकाफी है । गृहमंत्री इस धमाके पर अपनी प्रतिक्रिया सधे अंदाज में कुछ इस तरह देते है 'उन्हें इस धमाके का अंदेशा था और हम आतंकवादियों को गिरफ्तार भी कर सकते थे लेकिन भाग्य साथ नही दिया' ।हमारे चिदंबरम साहब के पास इस समय फेडरल पुलिस है तो आतंकवाद को रोकने के लिए कड़े कानून (unlawful activities prevention act) भी है फ़िर यह अभी तक यह साफ़ नही हो पाया है इन धमाको को अंजाम देने वाले हुजी के आतंकवादी थे या फ़िर वही उल्फा .... । ठीक दो महीना पहले असम में १०० केजी से ज्यादा आर डी एक्स इस्तेमाल करके आतंकवादियों ने १०० लोगों की जान ले ली थी , तब सरकार की और से पहले उल्फा का नाम लिया गया ,बाद में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने बांग्लादेश के हुजी का नाम लिया ,बाद में कहा गया यह उल्फा और हुजी का सम्मिलित प्रयास था । नतीजा वही ढाक के तीन पात साबित हुए हैं । आज वोट की सियासत ने असम को बारूद के ढेर पर खड़ा कर दिया है और हुकूमत अपनी सुविधा से अलग अलग बयान दे रही है ।
हमें यह नही भूलना चाहिए हमारी सरकार ने दवाब में आकर एंटी इन्सेर्जेंसी लाव को सामने लायी है । यानि सरकार को यह अंदेशा आज भी है कि इस कड़े कानून से muslim तबका नाराज हो जाएगा यही वजह है कि हेमंत करकरे की मौत पर सवाल उठाने वाले अंतुले को सरकार इसलिए नही बर्खास्त कर पाई क्योंकि वह मुसलमानों को और नाराज नही कर सकती थी । यानि अंतुले का वह विवादस्पद बयान को पुरे समुदाय से जोड़ दिया गया । आप कल्पना कर सकते है की किस राजनितिक इच्छाशक्ति की बदौलत सरकार आतंकवाद पर लगाम लगा सकती है । आज सरकार के पास फेडरल पुलिस है किसी भी आतंकवादी हमले की जांच अब केन्द्र सरकार ख़ुद करबा सकती है । उसके पास आज कड़े कानून है । आज भारत का हर आम शक के दायरे में है हमारी पुलिस शक के बिना पर किसी को भी १८० दिनों तक हवालात में रख सकती है । लेकिन इस कानून का असर खाश पर शायद ही कभी हो ।
नए कानून के दायरे में naxali आतंकवादियों को भी shamil किया गया है । यह जानते हुए भी कि naxal हमले से prabhavit राज्यों में यह कानून पहले से lagoo है लेकिन क्यों सरकार naxal पर kaboo नही pa सकी है .... अगले ब्लॉग में ....

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

क्या कश्मीर भारत के हाथ से फिसल रहा है ?

कश्मीर मसला है.... या बकैती ?

हिंदू आतंकवाद, इस्लामिक आतंकवाद और देश की सियासत