ओमर अब्दुल्ला का फ्लॉप शो



आख़िरकार ओमर अब्दुल्ला काम पर लौट आए है । रियासत के राज्यपाल ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है ।
कश्मीर में भले ही ओमर अब्दुल्ला के पद छोड़ने और दोबारा काम पर लौटने की चर्चा भले ही जोर नही पकड़ी हो ,लेकिन नेशनल मीडिया में यह चर्चा सुर्खियों में रही । महज सात महीनो में ऐसा क्या हो गया कि कश्मीर मे लोगों का मोहभंग इस युवा नेता से हो गया ?लगातार बंद हड़ताल और अलगाववाद की तेज लहर के बीच पिछले असेम्बली चुनाव में कश्मीर में ६३ फीसद वोट पड़े तो लोगों ने कहा कि वादी से अलगाववाद का पुरा सफाया हो गया है । लोगो ने कहा यह युवा कश्मीर का फ़ैसला है । हुर्रियत के तमाम लीडर कोने में सीमट गए । आतंकवाद दम तोड़ती नज़र आ रही थी । माहोल ऐसा कि नई हुकूमत इस बार लोगों के दिलो दिमाग पर छा जायेंगी । ओमर अब्दुल्ला के लिए यह मौका था लेकिन उन्होंने यह कीमती वक्त हनीमून मे ही जाया कर दिया ।

याद कीजिये ओमर अब्दुल्ला का वह जोशीला भाषण । विश्वास प्रस्ताव पर संसद में महज दो मिनट के भाषण से वे मिडिया के हीरो बन गए थे । कश्मीर में नौजवानों ने उन्हें हाथो हाथ लिया था । कांग्रेस के आलाकमान इस भाषण से इतने प्रभावित हुए थे कि जब बारी मुख्यमंत्री चुनने की आई तो उन्होंने सिर्फ़ ओमर अब्दुल्ला के लिए हामी भरी । लेकिन इस अब्दुल्ला ने जल्द ही सबको निराश किया ।

पिछले ६० वर्षों में भारत सरकार ने जितना तब्बजो कश्मीर को दिया है .उतना ध्यान शायद ही कोई राज्य आपनी ओर कर पाया हो । कश्मीर में इन वर्षों में जो माहौल बना है उसके लिए इस देश को भारी कुर्बानिया भी देनी पड़ी है । पैसे का हिसाब किताब आप भूल जाए । महज इन पाँच वर्षों में कश्मीर को ६०००० करोड़ रूपये से ज्यादा केंद्रीय सहायता मिले है । सबसे बड़ी बात यह कि कश्मीर में अमन पाने के लिए हमने २०००० से ज्यादा जवानों को शहीद किया है । और जब अमन के इस माहोल को आगे ले चलाने की बात आती है तो हमारे सामने mufti या अब्दुल्ला के अलावा और कोई चारा क्यों नही होता है ।
इस बार फारूक की जगह ओमर अब्दुल्ला को सामने लाया गया । फारूक अब्दुल्ला हर मुश्किल दौर में कश्मीर को जलते हुए छोड़ कर लन्दन जाने के लिए कुख्यात रहे है । बेटा अब्दुल्ला को दिल्ली में अपना आशियाना कश्मीर से ज्यादा सकूं देता है ।
सोपिया में दो औरतों की हत्या आज भी रहस्य बना हुआ है ,लेकिन भावुक मुख्या मंत्री ने पहले इस घटना में दोनों औरतों को डूबने से हुई मौत का खुलासा किया । लेकिन जल्द ही इस की जांच के लिए जुदिसिअल कमीशन भी बैठा दिया । पहले ओमर अब्दुल्ला के ख़िलाफ़ महबूबा ने मोर्चा खोला बाद में हुर्रियत ने इस पुरे मामले को सियासी मुद्दा बना दिया । शोपिया ४० दिनों तक बंद रहे । एक बाद एक १४ पुलिस वाले नप गए । पाँच जेल पहुँच गए ,अब उनकी नार्को टेस्ट की बात की जा रही है । यानि एक झटके में पुलिस अमला का मनोबल तोड़ दिया गया लेकिन सच बताने हुकूमत आज भी आगे नही आई की यह मामला लोकल क्राइम से जुडा हुआ है । आम लोगों से संवाद बनाने में हुकूमत नाकाम साबित हुई ।
बारामुल्ला मे एक लड़की के अगवा होने की अफवाह ने चार लोगों की जान ले ली । हफ्ते भर बारामुल्ला हिशा की आग में जलता रहा । जबकि पुलिस ने अगवा करने वाले को गिरफ्तार कर लिया था । यह लोकल क्राइम था लेकिन नर्वस ओमर अब्दुल्ला वादी से सी आर पी ऍफ़ को निकाल बाहर किए जाने के लिए केन्द्र से अपील कर रहे थे ।
पिछले महीनों दर्जनों ऐसे लोकल क्राइम की बात सामने आई , हर बार इसके लिए सेना और सी आर पी ऍफ़ को कशुरबार ठहराया गया । और हर बार मुख्या मंत्री दवाब में कभी सेना को हटाने कभी पारा मिलिटरी फाॅर्स को निकाल बाहर किए जाने की मांग का समर्थन करते नज़र आए ।
ओमर अब्दुल्ला की शिकायत है कि कांग्रेस के मंत्री उन्हें अहमियत नही देते । विकास का काम ठप पड़ा हुआ है वजह कांग्रेसी मंत्री उनका सहयोग नही करते । लेकिन ओमर अब्दुल्ला सेक्स स्कैंडल में नाम लिए जाने से आहात है । अगर यह झूठ है तो ओमर अब्दुल्ला को इस्तीफा देने की क्या जरूरत थी । यानि सियासी खेल में वे इतने कच्चे है कि महबूबा मुफ्ती के इशारे पर नाच रहे है । ये वही महबूबा है जिसने ६ साल हुकूमत में रह कर अपना आर्थिक और सामजिक आधार बनाया और आज भारत के ख़िलाफ़ अलगाववादियों से ज्यादा जहर उगल रही है और भावुक ओमर अबदुल्ला ने इसका मजबूती से सामना करने के वजाय पुरे सिस्टम को दाव पर लगा दिया है ।
कांग्रेस का समर्थन ओमर अब्दुल्ला को अगर इसलिए है कि वह राहूल के दोस्त है तो यह हमें नही भूलना चाहिए कि कभी इस देश ने पंडित नेहरू और शेख अब्दुल्ला की दोस्ती के कारण काफ़ी नुकशान सहा है । ये परेशानी आज तक पीछा नही छोड़ रही । अगर इसी दोस्ती के नाम पर यह सिलसिला जारी रहा तो कश्मीर में पाने के वजाय हम ज्यादा खोएंगे ।

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