देश में सब कुछ "ठीक "नहीं है अटल जी

हानि लाभ के पलडो में ,तुलता जीवन व्यापर हो गया .!
मोल लगा विकने वालों का ,बिना बिका बेकार हो गया !
मुझे हाट में छोड़ अकेला ,एक एक कर मीत चला
जीवन बीत चला ....
एक दार्शनिक -राजनीतिग्य  अटल बिहारी वाजपेयी जीवन के 88 वे वसंत पूरा कर इन दिनों सियासी हाट में अकेले खड़े हैं ।राजनीती के मंडी में अपनी प्रखर बौधिक क्षमता की बदौलत अटल जी 50 साल तक आम और खास सबको प्रभावित किये   .गैर कांग्रेसी सरकार के वे पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने 6 साल देश के शासन की जिम्मेदारी संभाली .देश के आर्थिक प्रगति और नई दिशा देने में
अटल जी का योगदान मील का पत्थर साबित हुआ  है .संवाद और संपर्क अटल जी के विकास दर्शन में शामिल थे
यही वजह है की भारत में संचार क्रांति और सड़क निर्माण का जो सिलसिला अटल जी ने शुरू किया उसने देश की दिशा और दिशा बदल दी
.कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी को जोड़ने का अटल जी का प्रयास आज देश को भौगोलिक रूप से एक सूत्र में बाँध दिया है
,उनकी संचार क्रांति ने देश में लोकतंत्र को दुबारा प्रतिस्थापित किया है .सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
ने आज मुल्क के करोड़ों नौजवानों को नायक बना दिया है .नौजवानों का जीवन स्तर  बदला तो राजनितिक सोच भी बदली है .यह भारत की जी डी पी की कहानी है
जिसे सच करने की पहल में  अटल जी ने प्रधानमंत्री सड़क संपर्क सहित कई महत्वपूर्ण योजनाओं की शुरुआत की थी .
 २००३ के मई महीने मे प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का कश्मीर दौरा कई मायने मे खास था।अटल जी के राजनितिक सफ़र की यह एक घटना थी जिसे मई कमरे की आँखों से कैद करने श्रीनगर पंहुचा था. जम्मू -कश्मीर असेंबली और संसद पर फिदायीन हमले के बाद अटल जी की यह पहली कश्मीर यात्रा थी .या यूँ कहिये 20 साल बाद भारत के किसी प्रधानमंत्री की यह पहली कश्मीर यात्रा थी .वर्षो बाद कश्मीर में साफ़ -सुथरी चुनाव का वादा पूरा करके अटल जी कश्मीर के आवाम से रूबरू होने आये थे . लम्बे वक्त के बाद लोगों मे लोकतंत्र के प्रति भरोसा जगा था .जम्मू कश्मीर के इतिहास मे वह पहला चुनाव था जिसमे धांधली  और बूथ कब्जे के कोई आरोप नहीं लगे थे .वाजपेयी ने जैसा कहा वैसा ही फ्री एंड फेयर चुनाव की बात को साबित किया  था .जाहिर है १९८७ के बाद अटल जी पहले प्रधान मंत्री थे जिन्होंने कश्मीर के आवाम के साथ कुछ कर दिखा कर मुखातिव हुए थे .यह कोई नहीं जान रहा था कि इस आवामी सभा को संवोधन करते हुए वाजपेयी क्या ऐलान करेंगे. भारत -पाकिस्तन के बीच नफरत की बड़ी दीवार खड़ी कर दी गयी थी . सियासी गलियारे में लोग संशकित थे मानो अटल जी क्या कह जाए ,उन्होंने गुलाम एहमद महजूर का मशहूर शेर पढ़ा "बहारे फिर से आयेंगी .... और लोगों को दिल जीत लिया .कश्मीर से ही उन्होंने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ आगे बढा दिया .  कारगिल से लेकर संसद पर हमले के कशुरबार पाकिस्तानी सद्र परवेज़ मुशर्रफ़ के भारत विरोधी अभियान की काट मे वाजपेयी के इस नए प्रस्ताव ने सबको चौका दिया था .वाजपेयी के साथ गए उनके सलाहकार भी प्रधानमंत्री के ऐलान से अचंभित थे .लेकिन मुल्क के लोकप्रिय  प्रधानमंत्री ने ये तमाम फैसले लोगों के बीच ही करना उचित समझा था ..वाजपेयी को किसी ने पूछा हुर्रियत के लोग संविधान के दायरे मे बात नहीं करेंगे ,उन्होंने कहा था वे संविधान के दायरे मे नहीं तो दिल के दायरे मे तो बात कर ही सकते है .पहली बार  वादी के अलगाववादी लीडर वाजपेयी से बात करने दिल्ली आये थे  .यह वाजपेयी का चमत्कार था कि भारत पाकिस्तान के रिश्तो पर जमी बर्फ पिघली तो कश्मीर मे लोगों को भारत को लेकर एक उमीद बनी .उस दौरे पर २४००० करोड़ रूपये का आर्थिक पकेज का ऐलान वाजपेयी ने किया था ,कश्मीर मे ट्रेन की कवायद तेज करने की पहल उन्होंने ही की थी लेकिन वे जानते थे कि ये तमाम पॅकेज बेकार है जब तक यहाँ राजनितिक पॅकेज नहीं दिए जायेंगे .हुर्रियत लीडर मौलाना अब्बास अंसारी ने एक बार मुझे बताया था कि वाजपेयी का राजनीती से सन्यास कश्मीर की सियासी पहल पर पूर्णविराम था .हुर्रियत के लीडर मानते है कि अगर वाजपेयी होते तो यह मसला अब तक सुलझ गया होता .यही बात पाकिस्तान से लौटे एक पत्रकार ने कहा था कि  "पाकिस्तान मे आप जहाँ भी जाय अगर लोग ये जान गए कि आप भारत से है तो पहला सवाल वाजपेयी के लिए पूछेंगे .लोग पूछते है क्या वाजपेयी दुवारा नहीं आयेंगे"

भारत हो या पाकिस्तान लोगों की ये तड़प अटल जी के लिए क्यों है तो उसकी वजह जानी जा सकती है .
कश्मीर की इन राजनितिक पेचदीगियो पर राज्य के वर्तमान राज्यपाल एन एन वोहरा पिछले १5 वर्षों नज़र रखे हुए है लेकिन कामयाबी के नाम पर उन्होंने जम्मू कश्मीर में किसी भी सियासी पहल को अमलीजामा नहीं पहना सके । 33 हजार पंचायतो के एलेक्टेड पञ्च और सरपंच आइन के तहत अपना हक मांग रहे है लेकिन पिछले 2 वर्षों से राज्यपाल खामोश है .यही हाल कमोवेश पीएमओ और गृहमंत्रालय का  भी है और देश के प्रधानमंत्री एक बार फिर पैसे का बौछार करके खाली हाथ वापस दिल्ली लौट आते  है। यानी देश सब कुछ अब्दुल्लाह परिवार पर छोड़ कर अपनी जिमेदारी से मुक्त है .तो क्या यह मुल्क एक लिमिटेड कम्पनी के तौर पर चलाया जा रहा है जहाँ मंत्री की भूमिका मैनेजर निभा रहे हैं तो प्रधानमंत्री की भूमिका एक गैर राजनीतिग्य सी ई ओ निभा रहे हैं .1.5 अरब की आवादी वाले मुल्क के लोगों को अपनी सरकार और प्रधानमंत्री से कोई संवाद नहीं है .जब भी देश मुश्किल में होता है उसका प्रधानमंत्री सपाट चेहरे के साथ  बगैर किसी भावना के लिखी हुई स्क्रिप्ट पढ़ देता है।हर वक्त संशय में रहने वाला मुल्क का प्रधानमंत्री यह खुद नहीं तय कर पाते है कि उसने ठीक पढ़ा है ? इस मुल्क के साथ यही त्रासदी है पिछले 8 वर्षों से इस देश को कोई कुशल राजनीतिग्य नहीं मिला कोई लोकप्रिय नेता नहीं मिला फिर भी मुल्क चल रहा है .मुल्क का एक बड़ा स्टेट्समैन ,कुशल राजनीतिग्य और प्रखर
वक्ता  गुमनामी के अंधेरों में कही खो गया है लेकिन आज देश को उन्हें याद करने की फुर्सत नहीं है ..उनकी राजनितिक कुशलता और सहृदयता की जरूरत इस मुल्क को अज भी  है .
बीजेपी कोई दूसरा वाजपयी मुल्क के सामने प्रस्तुत नहीं कर सकती  ,लेकिन
कम से कम वाजपेयी के विचारों को आदर्श बनाकर बीजेपी का विस्तार जरूर दिया जा सकता है . .








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