क्यों संजय की दृष्टि कमजोर हो गयी है ?

25 साल बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने कहा है "हम साथ साथ हैं " तो 25 साल बाद त्रिपुरा में राजनीति ने ऐसी पलटी मारी है कि सियासी पंडित चौक गए हैं, तो हैरान बुद्धिजीबी नए तरीके से चुनावी गणित समझाने लगे हैं। आंकड़ों के मायाजाल से  बीजेपी को मिली  जनमत को ठीक वैसे ही नकार रहे हैं जैसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव  के बाद "बुआ और भतीजे " ने  हार का ठीकरा ई वी एम पर फोड़ा था। सियासी घमासान में कल के दोस्त दुश्मन बन रहे है और आज के दुश्मन दोस्त बनने का दम्भ भर रहे हैं ।  कुरक्षेत्र 2019 की तैयारी में मीडिया और सोशल मीडिया पर शंख फुके जा रहे हैं.. अनगिनत संजय 2019 के महाभारत की पल पल की खबरे देने के लिए  रिहर्सल में जुट गए हैं.

.. सबसे तेज और सटीक लेकिन दिक्कत यह है कि  धृतराष्ट्र अँधा नहीं है। लेकिन इतने महारथियों के  बीच अर्जुन का बार बार ननिहाल जाना  संजय को यह अवसर जरूर देता है कि वे अपनी टी आर पी बनाले। लेकिन चाणक्य अब किस मोर्चे की फतह की तैयारी में है और उसके तरकश में कितने तीर है यह बात संजय नहीं जानता। वह इसलिए नहीं कि चाणक्य की महीन चाल को समझना मुश्किल है वह इसलिए कि स्वार्थवश संजय की दृष्टि कमजोर हो गयी है। सियासत का एक सूत्र अगर सत्ता है तो यकीन मानिये साथ होने का दिखावा अब नहीं चलेगा ठीक वैसे ही अगर खबर एजेंडे के चासनी में भिगोकर परोसा जायेगा तो संजय की बातो पर कौन यकीन करेगा। 

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