उत्तराधिकारी के फैसले पर कही घमासान तो कही परिवार हावी
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उत्तराधिकारी का यही सवाल बीजेपी को पशोपेश में डाला हुआ है । आडवाणी जी के बाद कौन
आज राजनाथ सिंह के बाद कौन का सवाल गौण हो गया है । संघ के लिए राजनाथ सिंह नॉन इस्सू है । यह अलग बात है कि अध्यक्ष के परफोर्मेंस पर उठा सवाल बीजेपी की गुटबंदी को जगजाहिर कर दिया है । संघ का फार्मूला अगर काम किया तो पार्टी को किसी व्यक्ति से प्रभावित होने नही दिया जाएगा । तक़रीबन दस वर्षों के बाद संघ को यह मौका मिला है कि वे बीजेपी के मामले मे सीधे दखल दे सके । अटल -आडवानी की बीजेपी विचारधारा से अलग बीजेपी को एक राजनितिक आधार वाली पार्टी का दर्जा दिया जाहिर है उस दौर में आर एस एस का प्रभाव बीजेपी पर धीरे धीरे कम होता गया । लेकिन बीजेपी में बढ़ी गुटबंदी और आडवानी के घटते प्रभाव ने संघ को बीजेपी को सुधारने का एक मौका दे दिया है। संघ पार्टी को विचारधारा की ओर लौटना चाहता है जबकि पार्टी अपना आधार बढ़ाना चाहती है । बीजेपी मे शीर्ष और लोकप्रिय लोग आज अस्त हो रहे है तो संघ को किसी नए चेहरे की तलाश है । लेकिन बीजेपी किसी भी राजनितिक दल से ज्यादा लोकतान्त्रिक है इसलिए इस पार्टी में उत्तराधिकारी के सवाल पर परिवार सामने नही आया । अटल हो या आडवानी , मोदी हो या रमन सिंह किसी का उत्तराधिकारी तय नही है । यह अलग बात है कि पॉवर और पैसे के गणीत ने इस पार्टी में गुटबंदी जरूर बढ़ा दी है । फ़िर भी जिसका जनता के साथ सीधा संवाद होगा वह पार्टी की भूमिका में आगे होगा ।
लेकिन क्षेत्रीय पार्टियों में उत्तराधिकारी का सवाल कभी मसला नही बनता । समाजवादी पार्टी मुलायम सिंह की है सो अगर मुलायम सिंह फिरोजाबाद से अपने बहु को चुनावी मैदान में उतार रहे है तो किसी समाजवादी को इसमे शायद ही वंशवाद दिखे । मुलायम सिंह केंद्रीय भूमिका में है बेटा अखिलेश राज्य ईकाई के सर्वेसर्वा है भाई असेम्बली में विपक्ष के लीडर है । तमाम सगे सम्बन्धी एम् एल ऐ से लेकर एम् पी की भूमिका में है । सो यहाँ उत्तराधिकारी का कोई सवाल नही है ।
आर जे डी के सर्वेसर्वा लालू यादव है सो बिहार में पत्नी को सियासत सौप कर केन्द्र की राजनीती देख रहे है । सत्ता में कभी लौटे तो उनका उत्तराधिकारी तैयार हो रहा है । रामविलास जी की अपनी लो ज पा तबतक कायम है जबतक रामविलास है। सो अगर उनके साथ पुरा परिवार है तो लोजपयी को शायद ही कोई परेशानी होगी । महारष्ट्र के कद्दावर नेता शरद पवार हो या बाला साहब ठाकरे ने अपना उत्तराधिकारी तय कर दिया है । करूणानिधि हो या प्रकाश सिंह बदल इनकी सरकार भले ही इनके नाम से चल रही हो लेकिन सत्ता का खेल बेटों के हाथ है । इस तरह उत्तर से दक्षिण तक पूरब से पश्चिम तक जब उत्तराधिकार का मसला भारत में हर जगह और हर पार्टियों में तय है तो बीजेपी में उत्तराधिकार के लिए इतना घमासान क्यो है ? इसलिए क्योंकि यह ज्यादा लोकतान्त्रिक है या इसलिए कि इस पार्टी मे आज कोई चमत्कार करने वाला लीडर नही है?
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