रविवार, 21 अगस्त 2016

कश्मीर पर बकैती नहीं , बात कीजिये

क्या कश्मीर के नौजवाब  बुरहान वानी  की मौत से इतना  खफा है कि वे स्टोन ऐज में लौट आया है ? क्या अलगाववादी ग्रुप वाकई हाउस अरेस्ट हैं और पिछले ४४ दिनों  से  बंद हड़ताल खेल रहे है ? क्या मकामी हुकूमत वाकई नौजवानों के पत्थर से घबराई हुई है और कर्फ्यू का कबच  ओढ़ रखी है।  क्या साबिक मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्लाह कश्मीर के हालात को लेकर वाकई गंभीर है ? कश्मीर में सवाल  ढूंढने जाएंगे तो जवाब कम सवाल ज्यादा मिलेंगे।  
कौन है ये नौजवान जिन्होंने इस्लाम को जाना नहीं लेकिन उन्हें इस्लाम पर खतरा नज़र आ रहा है , उनके साथ जो पत्थर नहीं उठा रहा वह काफ़िर है। क्या ५० से ज्यादा मासूमो की मौत से इन नौजवानों को जरा भी अफ़सोस है ? छोटे छोटे बच्चो के हाथ पत्थर पकड़ा कर वो किस्से बदला ले रहे है ?   हम क्या चाहते आज़ादी जैसे चंद जुमले उन्हें   इसलिए याद है क्योंकि उन्हें  पता है कि अब्बाजान की जबतक कमाई है तबतक भोजन  सुरखित है। इसमें कोई दो राय  नहीं कि यहाँ बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है लेकिन यह भी सच है  कि सबसे ज्यादा सरकारी नौकरी लोगों को यही मिली हुई है। हुर्रियत के हर छोटे बड़े लीडरान के बच्चे  या तो बड़े मुलाजिम है या बड़ा कारोबारी ,फिर इस बंद -हड़ताल और कर्फ्यू से कौन मुश्किल में इसकी पड़ताल जरुरी है 

,लेकिन हुकूमत सियासत में  उलझी हुई है। कश्मीर की हर छोटी बड़ी घटना इंटरनेशनल न्यूज़ है , सबसे ज्यादा मीडिया की सरगर्मी यहाँ है ,यही वजह है कि यहाँ  ४४ दिनों तक हड़ताली कैलेंडर चलता है तो कर्फ्यू भी. . राजनैतिक पहल के नाम पर मीडिया के जरिये लीडरान की बकैती सामने आ रहा, , हर सियासी दलो  की अपनी दलीले है ,एक  दूसरे को फैल कराने के तर्क दिए जा रहे है..लेकिन निदान किसी के पास नहीं   है।   ओमर अब्दुल्ला  हों या मीरवाइज उमर फ़ारूक़ आज हर कोई जनरल हूडा की बातचीत और सियासी पहल की वकालत कर रह है तो यह पूछा जाना लाजिमी है कि बातचीत किससे हो ?  क्या हुर्रियत पत्थरबाजो  को घर   बैठने की नसीहत देने का माद्दा रखता है ?  हा !  तो उन्हें लीडर मानने में क्या दिक्कत है।  याद रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने भी उन्हें बातचीत के लिए खुला निमंत्रण दिया था। लेकिन आजतक अलगाववादी अपना रोडमैप सरकार के  सामने नहीं रख सकी।  अगर गृहमंत्री राजनाथ जी को वाकई कश्मीर और कश्मीरी से प्यार है तो उन्हें आम अवाम की मुश्किलो को समझना  चाहिए और बिना कैमरा कश्मीर में बैठना चाहिए। .बस पहल की जरुरत है। . 

शनिवार, 13 अगस्त 2016

कश्मीर क्या सचमुच मसला है ?

90 के दशक में "स्काई  इज द लीमिट " का फार्मूला देकर  पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने कश्मीर मसले के हल के लिए शानदार पहल की थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कदम आगे बढ़कर बातचीत को इंसानियत के दायरे में लाने की कोशिश की।  संवैधानिक दायरे से आगे बढ़ने का जोखिम लेकर अटल जी ने कश्मीर में  विश्वास का वातावरण बनाया तो  पचास साल बाद  फ्री एंड फेयर चुनाव के संकल्प को कश्मीर में जमीन पर उतारकर लोगों में लोकतंत्र के प्रति भरोसा पैदा किया। लेकिन आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने  अगर कश्मीर के   दायरे को आगे बढाकर ,जम्मू ,लदाख और पाकिस्तान मकबूजा कश्मीर के मसले को रेखांकित करने की कोशिश की है तो माना जायेगा की उन्होंने इतिहास से सबक ली है।

कश्मीर के कई जिलों में लगातार ३५ दिनों के बंद -हड़ताल और कर्फ्यू के बाद यह सवाल पूछा जाना लाजिमी है कि  कौन चाहता है कश्मीर मसले का हल ?  एक रोमांटिक आतंकवादी बुरहान वानी की मौत से कश्मीर सचमुच खफा है ? या फिर कश्मीरियत की रिवायत वाली वादी में आई एस के तथाकथित खिलाफत के तई नॉज़वानो में बढ़ी उत्सुकता ,इस विरोध को धारदार बना दिया है ?. ऐसी चिंता पीडीपी सांसद मुज़्ज़फ़र बेग कर  रहे हैं।  या  फिर पाकिसातनी हुकूमत और उनकी हुर्रियत  के  डूबती नाव को किनारा मिल गया है ?

. १९४८ से लेकर आजतक कश्मीर मसले को लेकर भारत -पाकिस्तान के बीच दर्जनों  मर्तबा बातचीत हो चुकी है लेकिन मामला जस का तस है . अक्सर इस बातचित में हमारे विवेकशील रहनुमाओ ने पाया कम है ,खोया ज्यादा है  तो क्या  इस दौर में सचमुच डिस्कोर्स बदलने की जरुरत है ? जैसा कि कश्मीर स्टडी ग्रुप के अरुण कुमार जी बताते है  ?
 आखिर वे कौन लोग है जो कश्मीर को  मसला मान रहे है ?  बात साफ़ है जिनका इस मसले से निजी या सियासी फ़ायदा है उन्होंने  हर दौर मे इस मसले को जिदा रखने की कोशिश की  है और वे काफी हद तक कामयाब भी हुए है.. जम्मू कश्मीर की बड़ी आवादी ने कभी इसे मसला नहीं माना। .अगर यह बाकई आम लोगों के लिए बड़ा मसला होता तो हर चुनाव में 75 -80 फीसद पोलिंग नहीं होती।   . कश्मीर के सबसे बड़े अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी से मैंने यही सवाल पूछा था ,उनका जवाब था क्या कश्मीर की हालत ७० के दशक मे ऐसी थी ?. गिलानी साहब खुद दो बार अस्सेम्ब्ली का चुनाव जीत कर एम् एल ए बने थे। .  आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के सरबरा शलाहुद्दीन ने खुद असेम्बली  चुनाव मे अपना सिक्का आजमाया था . ये अलग बात थी कि तत्कालीन कांग्रेस -एन सी हुकूमतों ने सैयद शलाहुद्दीन को चुनाव जीतने नहीं दिया  था और पाकिस्तान ने  उसे बन्दूक पकड़ा  दिया था। ..

 हमें याद रखना चाहिए कि ये वही कश्मीर के लोग थे जिन्होंने १९४८ मे पाकिस्तान की  फौज को खदेड़ने मे भारतीय फौज के साथ कंधे से कन्धा मिलकर जंग जीती थी . हजारों लोगों ने पाकिस्तान के इस आक्रमण मे अपनी कुर्बानिया  दी थी . लेकिन ऐसा क्या हुआ कि बाद के दौर मे कुछ गुमराह नौजवानों ने  जीवे जीवे पाकिस्तान का नारा लगाने लगा  ? पाकिस्तान में फ़ौज ने सत्ता पर काविज होने के लिए कश्मीर को चावी के तौर पर इस्तेमाल किया तो . पाकिस्तान की पैरवी करने वाले कश्मीरी अलगाववादी लीडरों पर दो दशको  में मानो धन वर्षा हुई . कल तक गाँव मे रहने वाले इन लीडरों ने श्रीनगर मे आलिशान महल बनाया .इनके बच्चो ने उची तालीम ली . कई के बच्चे सरकारी मह्कामे मे ऊँचे दर्जे के पद पर  कायम  है .खुद शलाहुद्दीन के तीन बच्चे स्थानीय सरकारी सेवा में है।
पिछले वर्षों मे कश्मीर मे विकास के नाम पर, पुनर्वास के नाम पर  भारत सरकार की ओर से अरबो रूपये के पकेज मिले है .लेकिन इन पैसों की हकीकत कश्मीर जा कर ही पता चलता है. यानी लूट में छूट को कश्मीर मसले से .जोड़ दिया गया है।  .. मैंने  सैयद अली शाह  गिलानी से एक बार पूछा था कि आप भारत सरकार से बातचीत के लिए तैयार क्यों नहीं हुए।  . उनका जवाब था जिन्होंने ने भारत सरकार से बात की है उन्होंने क्या हासिल किया है . .. यानी राजनैतिक प्रक्रिया यहाँ हासिल करने जुडी है , यही वजह है कि कश्मीर में अलगाववादियों के २४ धरो का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है न ही पथरबाजो का । . सबके अपने निजी स्वार्थ है।  कश्मीर मे एक  बड़े ओहदे से सेवा निवृत अधिकारी से मैंने पूछा , आखिर इस मसले का क्या हल है ?,उनका जवाब था कश्मीर मसले का हल कोई नहीं चाहता है , कश्मीर मसले का हल सिर्फ वो माँ चाहती है जिनके  बच्चे .सियासी साजिश के शिकार  हुए  हैं। ..

रविवार, 17 जुलाई 2016

"इतनी नाराजगी क्यों है "

30 साल पहले सिस्टम से नाखुश युसूफ शाह सरहदपार चला गया और आतंकवादी सईद सलाहुद्दीन बन गया अब पाकिस्तान में जेहादी कौंसिल के चेयरमैन हैं. । ३० साल बाद उसी कश्मीर का एक नाखुश नौजवान बुरहान वानी ,हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का कमांडर बनकर सिस्टम बदलने के बजाय मुल्क की अस्मिता पर चोट करने लगा और मारा गया। उसी सिस्टम से नाराज कश्मीर के कुछ नौजवानों ने पत्थर उठा लिया  है और सुरक्षाबलों से दो दो हाथ करने को तैयार है। लेकिन उसी सिस्टम में शब्बीर अहमद पिछले एक हफ्ते से रात -दिन एम्बुलेंस चलाकर रगड़ा में  घायल नौजवानों को हस्पताल पहुंचा रहा है। पथरवाजो के नाराजगी से बचने के लिए वह हेलमेट पहनकर एम्बुलेंस चलाता है लेकिन एक सवाल जरूर पूछता है "इतनी नाराजगी क्यों है " ?


आज हर कोई कुछ ज्यादा ही नाखुश है ,कश्मीर में ओमर अब्दुल्लाह नाखुश है. (उन्ही की हुकूमत में ११० बच्चों की पथ्थरवाजी में मौत हुई थी ) महबूबा नाराज है कि अलगाववादी उन्हें काम करने नहीं दे रहे ,अलगाववादी नाराज है कि महबूबा ने उनकी अहमियत क्यों कम कर दी ? दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल नाराज है ,जनता उनसे सवाल पूछ रही है ऊँगली पी एम मोदी पर उठा रहे है।  राहुल बाबा नाराज है ,यहाँ भी कसूरबार मोदी ही हैं. नीतीश जी नाराज है लालू नाराज है ,मायावती ,मुलायम नाराज है और तो और शिवसेना और अकाली  सरकार की व्यवस्था से नाराज हैं. फिर नाराज़ शब्बीर अहमद जैसे लोग नहीं है जो अपने काम को जिम्मेदारी से करते है और उसी में जीते हैं. 

जिनके हाथ में सिस्टम ठीक करने की जिम्मेदारी है और ओ नाराज है तो माना जायेगा कि वे सिर्फ सियासत करना जानते है और कुछ नहीं।  लेकिन सिस्टम बदलने और चलाने की जिद में एक स्वतः अहंकार कभी कभी लोगो की नाराजगी बढ़ा देती है जो आज कश्मीर में हो रहा है। बुरहान वानी हिज़्बुल का पोस्टर बॉय था ,जिसके हजारो फ्रैड्स फॉलोविंग  थे। यह बात कश्मीर की हुकूमत जानती थी।   ऐसी स्थिति में गुस्साए नौजवानों को पुलिस के भरोसे छोड़ना कितनी समझदारी थी।  हुर्रियत के लोग जनाजे में जाना चाहते थे तो हुकूमत की क्या परेशानी थी ,कानून व्यवस्था तोड़ने के लिए उनको जिम्मेदार ठहराया जा सकता था। आज गुस्साए भीड़ का कोई लीडर नहीं है।    इलाके के  एम एल ए ,एम पी और दूसरे प्रतिनिधि जो  टैक्सपेयर के पैसे से अपनी सियासत करते है वो  कहाँ है ? अगर स्थानीय लोगों का गुस्सा महबूबा सरकार से है तो १० साल से राजभवन में बैठे गवर्नर क्या कर रहे थे ? सत्तापक्ष और विपक्ष अगर कश्मीर में अपनी भूमिका खो चुके थे  ,तो देश का गृहमंत्रालय नज़र रखने के बजाय सीधे दखल क्यों नहीं दे रहा  है ?

अगर कश्मीर हमारा है तो वहां के लोगों की नाराजगी भी हमें समझनी होगी।सिर्फ संसद में चर्चा भर कर लेने से सरकार और विपक्ष अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते । देश की संसद और उसके सांसद अगर लोगों से संवाद करने जमीन पर उतरेंगे तो शायद लोगों में नाराजगी  कम  होगी , टुटा हुआ संवाद फिर जुड़ेगा। . बरना अपनी डफरी ,अपना राग यहाँ सब बजा रहा है ,यहाँ हर कोई हर से नाराज है। 

शनिवार, 9 जुलाई 2016

और बुरहान तुम चले गये .....

बुरहान तुम्हारे जाने का बहुत अफसोस है ! ठीक वैसे ही अफसोस मुझे तब हुआ था जब लोग तुम्हे कश्मीर में हिज़्ब के पोस्टर बॉय कहने लगे थे। अबतक लोग यह मानते थे कि गरीब और अनपढ़ लोग ज्यादा वल्नरेबल होते है जिन्हे कुछ चालक लोग आसानी से बरगला सकते है, लेकिन तुम तो एक पढ़े -लिखें  खानदान में पैदा लिया अच्छी तालीम पाई , स्थानीय कॉलेज के प्रिंसिपल तुम्हारे अब्बाजान मुजफ्फर अहमद वानी ने कभी सोचा भी न होगा कि अपने क्लास का टॉपर बुरहान कभी हिज़्ब का बंदूक उठा लेगा।  अफसोस इस बात को लेकर भी है कि तुम्हारे तंजीम हिज़्बुल मुजाहिदीन के सरबरा सैयद सलाहुद्दीन ने अपने किसी बच्चे को मिलिटेंट नहीं बनाया ,उन्हें बंदूक से दूर रखा और तुम ने अपने जैसे दर्जनों नौजवानों को बंदूक उठाने  के लिए प्रेरित किया।  माना कि  तुम्हे  सोशल मीडिया/ इंटरनेट  का शौक था ,कश्मीर में इससे पहले किसी मिलिटेंट ने अपने  ग्रूप का सेल्फी फेसबुक  पर नहीं डाला था। कश्मीर में कुछ लोग तुम्हे हीरो मान  बैठे थे,और यह तुम्हारी गलतफहमी थी कि तुम सेना के साथ जंग लड़ रहे थे।बांग्लादेश कैफे हमले में मारे  गए 20 साल का आतंकवादी  रोहन इम्तियाज़  को भी तुम्हारी तरह इंटरनेट और फसबूक चैटिंग का शौक था। आज उसके वालिद  को अफसोस है कि इंटरनेट ने  काबिल बच्चे को खतरनाक आतंकवादी बना दिया। तुम्हे खोकर क्या ऐसा ही अफसोस हमे नहीं करना चाहिए?   
आखिर यह जानने की  तुमने कभी कोशिश नहीं की कश्मीर में तुम्हारी दुश्मनी किससे है , क्या यहाँ सीरिया ,इराक़ ,फिलिस्तीन जैसी स्थिति है ? क्या यहाँ लोगो को  किसी बात के लिए प्रतिबंध है ? तुम्हारे ही ही बालदेन और   समाज की यहां चुनी हुई सरकार है फिर किस आज़ादी के लिए तुम जंग लड़ रहे थे ? आज बुरहान की  मौत के बाद कश्मीर में अलगाववाद की सियासत में एका दिखाई जा रही  है।  लेकिन इस दौर में यह बताने की भी जरूरत थी कि  बंदूक की सियासत ही अलगाववाद की लाइफलाइन रही है। . किस बंदूक  से कौन मरा यहां रहस्य की बात हो  जाती  है।  बुरहान तुम इस  रहस्य  को नहीं समझ पाए  और तुमने  हुर्रियत लीडरों के मास्टर होने  दम्भ  पाल लिया था । जबकि वे लोग तुम्हे मोहरा बनाकर अपनी सियासी रोटी सकते रहे। 
पिछले दिनों  हुर्रियत कान्फेरेंस के साबिक चेयरमेन अब्दुल गनी बट का  एक  खुलासा सबको चौका दिया  था।  ,उन्होंने कहा था " मारे गए हमारे हुर्रियत के लीडर वाकई मे शहीद है या फिर हमारी अंतर्विरोध के साजिश के शिकार " .हुर्रियत कान्फेरेंस के चेयरमेन ओमर फारूक और बिलाल गनी लोन की मौजदगी मे प्रो बट ने यह सवाल उठाया था कि इनके पिता की हत्या किसने की थी ?उन्होंने जोर देकर कहा कि झूठ बोलने की आदत छोड़कर हम यह सच बताये कि मौलवी फारूक ,प्रो गनी लोन और प्रो अहद जैसे लीडरो की हत्या हम मे से ही किसीने  की थी।  इनकी हत्या किसी सुरक्षा वालों ने नही की थी।  हुर्रियत लीडरो की हत्या की एक लम्बी फेहरिस्त है मौलवी मुश्ताक ,पीर हिसमुदीन ,शेख अजीज़ रफीक शाह ,माजिद डार इनकी हत्या के बारे मे यही बताया गया कि अज्ञात बन्दुक धारियों ने इनकी हत्या  दी ।  . इस दौर मे मौलवी मिरवैज  ओमर  फारूक पर भी  आतंकवादियों का कई बार हमला हुआ है , वो कौन थे ? किस तंजीम थे , आज भी रहस्य बना हुआ है।  लेकिन सियासत ऐसी कि हुर्रियत लीडर आज प्रचण्ड एकता दिखा  रहे रहे है। 
.बन्दूक ने कश्मीर मे न केवल सियासी लीडरों की भीड़ खड़ी की बल्कि अकूत पैसे की बरसात  भी की।   गाँव के झोपड़ियों में रहने वाले कई लीडरों के श्रीनगर और   दिल्ली मे आलिशान बंगले देखे जा सकते है। तथाकथित आज़ादी के नाम पर  पैसे की यह बरसात  कश्मीर मे आज भी जारी है।   बन्दूक की बदोलत जिसने राजशाही सुख  सुविधा बटोरी है क्या वे कश्मीर मे बन्दूक की अहमियत को ख़तम होने देंगे ?.बुरहान  हुर्रियत के इस रहस्य को समझ नहीं पाया। बुरहान वानी को शहीद के तौर पर पेश करके अलगववादी और आतंकवादी तंजीम आज कश्मीर में जज्वात को भड़काने की जी तोड़ कोशिश  कर रहे है,। 1990 के  बाद पहलीबार कुछ मस्जिदों से आजादी के नारे लगाए गए ,जज्वात भड़काने की यह पहली कड़ी सामने आई है लेकिन सबसे बड़ा इम्तिहान मकामी इंतजामिया के लिए है जिन्हे  हर हाल  लोगों से संवाद बनाए रखना जरूरी है।  अत्याधुनिक गैजेट से लैश कश्मीर में हमारे नौजवान बार बार क्यों गुमराह हो रहे है यह भी हम सबका आत्मचिंतन का विषय हो सकता है  । 

शनिवार, 25 जून 2016

उत्तर प्रदेश और "माया" की सियासत


" माया" जिसे भारतीय परम्परा में कभी भ्रम तो कभी देवी दुर्गा तो कभी भगवान बुध की माता के रूप में सम्बोधित किया जाता है लेकिन सियासत में माया सिर्फ धन और भ्रम के रूप में प्रचलित है। माया जिसका  सरोकार वोट से है ,सत्ता से है ,व्यवथा से है और तथाकथित सामाजिक न्याय से भी है। यह कोई इज्म या वाद से बंधी  नहीं होती बल्कि मौके और दस्तूर से इसकी व्याख्या की जा सकती है। तो क्या उत्तर प्रदेश की मौजूदा सियासत सिर्फ माया के इर्द गिर्द घूमती है ? 

मंडल- कमंडल के सियासी बवंडर का जोर कमोवेश बिहार और उत्तर प्रदेश में कायम है ,सत्ता पाने का इससे आसान तरीका इतिहास में इससे पहले कभी ईजाद नहीं किया गया था। कांग्रेस पार्टी के दिग्गज राजनेता अभी भी  इन प्रदेशों में अपनी जड़ खोजने की भरपूर कोशिश कर रहे है लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि  ऐतिहासिक भूल ने इनके जड़ो पर मट्ठा डाल दिया है। बहरहाल  माया की चर्चा करते है . ..बी एस पी के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्या पार्टी को बाय - बाय करने के साथ ही मायावती पर जोरदार आरोप लगाते है " ये दलित की नहीं दौलत की बेटी है ,बी एस पी में टिकट की बोली लगती " यह पहलीबार नहीं था जब ये विशेषण मायावती के लिए गढ़े जा रहे थे , बी एस  पी  की "माया "से निकले हर नेता ने  इसी अंदाज से खुली हवा में सांस लेने की बात की है... लेकिन मायावती हो या मुलायम उनके आय से अधिक सम्पति का मामला सी बी आई /आई टी नहीं सुलझा पाई फिर ये बेचारे युगल किशोर ,स्वामी जैसे लोगों  का आरोप  नक्कार खाने में तूती की आवाज़ ही बन कर रह गई है। . लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या दूसरे दलों में टिकट मेरिट के आधार पर दी जाती है ?

 ये उत्तर प्रदेश की सियासी माया है जहां पांच साल की सियासत में कंगले भी अरबपति  बन गए है। लेकिन माया की चर्चा सिर्फ मायावती के लिए होती है क्योंकि वह सफाई महोत्सव के जरिए अपने बैवभ का भोंडा प्रदर्शन नहीं करती ,वो अपने किसी रामबृक्ष को सरकारी जमीन पर कब्जा के लिए नहीं उकसाती। वैभव का सरोकार सिर्फ मायावती से है यही इस पार्टी का वसूल है। 
"उम्मीदों  का प्रदेश उत्तर प्रदेश" को लेकर वाकई अखिलेश यादव उत्साहित हैं। विकास को लेकर वे अपनी अलग छवि बनाने के लिए संजीदा भी है, लेकिन यू पी के  साढ़े तीन मुख्यमंत्री  के आरोप से वे अबतक उबर नहीं पाए। यानी यह यू पी का ही समाजवाद है जिसमे एक परिवार के 43 लोग सीधे सरकार और सियासत से जुड़े है।सुश्री  मायावती कहती है एक परिवार के बच्चे के बच्चे और उनके बच्चों ने सत्ता हथिया ली है " ये सामाजिक न्याय की देन है ठीक उसी तरह जैसे मायावती पार्क और अपनी मूर्ति लगवाकर उसे प्रेरणा स्थल का नाम देती है।  लेकिन सवाल यह है कि दोनों के राज में करोड़ो अरबो का घोटाला सामने आता है लेकिन आजतक न तो मायावती ने मुलायम  सिंह के खिलाफ कोई केस दर्ज की नहीं मुलायम और अखिलेश ने कभी मायावती के भ्रष्टाचार के खिलाफ कभी मुंह खोला। 

राज्य सरकार के खिलाफ लोगो में गुस्सा  है कमोवेश यह गुस्सा केंद्र सरकार के खिलाफ भी है । सियासी पंडित इसे एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर बताते है लेकिन ये गुस्सा कानून व्यवस्था को लेकर है ,,अखिलेश के खिलाफ   गुस्सा नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार को लेकर है। जातीय और साम्प्रदायिक गुंडागर्दी को मिली छूट को लेकर है ,तो क्या यह बी जे पी के लिए मौका है ? शायद पार्टी ने ये गलतफहमी पाल ली है ,अमित शाह और शीर्ष नेतृतव का  चुनावी लहजा वही है जो कमोवेश बिहार में था।  पार्टी अध्यक्ष अमित शाह उत्तर प्रदेश में उसी तरह उत्साहित है जो कमोवेश जंगल राज पार्ट 2  को लेकर बिहार में थे।  बिहार की  तरह यू पी में  भी बी जे पी जातीय  समीकरण बिठानी लगी है।  ये  उत्तर प्रदेश की माया है जिसमे लोग जाति के नाम  पर सम्प्रदाय के नाम पर एक दूसरे से लड़ने में कोई कोताही नहीं छोड़ते। यही  वजह है क़ि ,1917  के असेम्ब्ली चुनाव में हर पार्टी का जोर सामाजिक न्याय पर ही है ,राजनेता ये मान  बैठे है  कि , विकास से यहां  लोगों का  कोई लेना देना नहीं है।  सच ये भी है कि  गरीबी के नाम पर यहां कभी भी साझा लड़ाई नहीं लड़ी गई न ही भ्रष्टाचार कभी यहाँ मुद्दा बना  .. जाहिर है इस बार भी उत्तर प्रदेश में माया की सियासत की ही ज़िंदाबाद होगी। " माया "किसकी होगी यह कहना अभी मुश्किल है।  

गुरुवार, 26 मई 2016

क्या मोदी राजनेता हैं या फॉर्मूले का पैकेज !

मोदी सरकार पास या फेल ! पिछले एक हफ्ते से इस सवाल का हल ढूंढने में मीडिया एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है। लेकिन मूल सवाल पीछे छूट जाता है कि मोदी सरकार कौन सी परीक्षा दे रही है  ? सवाल यह भी फेहरिस्त से बाहर है कि क्या ऐसे ही सवाल देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों के लिए भी पूछा गया था ... अगर नहीं तो सिर्फ मोदी के लिए ही क्यों ? सवाल केजरीवाल भी पूछ रहे है ,नीतीश ,लालू और कांग्रेस के हर नेता पूछ रहे हैं जो मोदी से अपने को बेहतर मानते हैं।यानि देश को यह बताया जा रहा है कि "कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली "
पिछले एक दशक में इस मुल्क ने भले ही जी डी पी ग्रोथ का आंकड़ा डबल डिजिट को छू लिया हो लेकिन राजनेता या राष्ट्रीय नेता के तौर पर उसे फुके कारतूस ही मिले, क्षेत्रीय क्षत्रपों और जातीय सरगनाओं की महत्वकांक्षा  इस दौर में राष्ट्रीय क्षितिज पर छा जाने की है  , सेक्युलर गठबंधन से लेकर त्याग और विरासत के कई फॉर्मूले सामने आये लेकिन देश को राष्ट्रीय नेता के रूप में न तो इंदिरा मिली न ही अटल।  न ही लोहिया मिले न ही नम्बूदरीपाद। . यह दौर ऐसा था जिसमे सत्ता और अपनी व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री दिल्ली में नियुक्त किये जाने लगे। . तो क्या मोदी ने वर्षो बाद इस व्यवस्था को तोड़ दिया था ,क्या मोदी वर्षो बाद एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर स्थापित हुए थे ।  शायद हाँ ! वर्षो बाद पहली बार इस देश ने उम्मीदों के साथ एक प्रधानमंत्री का चुनाव किया था... फिर क्षेत्रीय क्षत्रप उन्हें फेल क्यों करार दे रहे हैं ? वजह वे मोदी को सिर्फ फॉर्मूले का पैकेज मान रहे है ,मोदी को राष्ट्रीय नेता मानने में उन्हें आज भी झिझक है। 
लेकिन इससे भी बड़ा सवाल मोदी सरकार के लिए यह है कि  जिस परिवर्तन और सम्पूर्ण क्रांति का नारा देकर उन्होंने सत्ता पायी थी ....क्या  परिवर्तन दिख रहा है ? क्या मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेंस का एहसास लोगों को हो पाया है।  क्या आम आदमी की ज़िंदगी में कोई परिवर्तन आया है? क्या यह सरकार भी परसेप्शन से प्रभावित नहीं है ?  क्या यह सरकार भी लम्बा चलने के लिए जुगाड़ का रास्ता नहीं ढूंढ रही है ? पिछले दो साल में पी एम मोदी लगातार चुनाव मैदान में ही है ,मीडिया  हर चुनाव को मोदी के  जनमत संग्रह के तौर पर पेश करता है और उनके सिपहसलार ग्राफ बनाए रखने के लिए तुकबन्दी और जुगलबंदी में जुटे रहते है। कभी हिट तो कभी फ्लॉप लेकिन परिवर्तन की बात पीछे छूट जाती है।  इस देश ने पी एम मोदी को एक मजबूत इच्छाशक्ति वाले ,ईमानदार और कर्मठ नेता के रूप में पहचाना है अब यह मोदी पर निर्भर करता है कि वे जनता के उम्मीदों पर कितना खरे उतरते हैं। जुमले और   चुनावी सियासत से ऊपर उठकर उन्हें तीन साल सिर्फ परिवर्तन के लिए काम करना होगा बरना अगलीबार यह उन्हें भी सुनने को मिले "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है "
विनोद कुमार मिश्र

रविवार, 1 मई 2016

मोदी को हराने के लिए भौकने से काम नहीं चलेगा ....

दिल्ली के मुख्य्मंत्री अरविन्द केजरीवाल को प्रधानमंत्री मोदी की शैक्षणिक योग्यता की जानकारी चाहिए ,क्यों चाहिए इसका  आर टी आई में खुलासा नहीं है ,लेकिन CIC ने  तुरंत जानकारी देने के लिए कहा है। कांग्रेस के नेताओं के लिए यह बड़ा मुद्दा है कि देश को यह जानना जरूरी है कि मोदी इंदिरा जी से ज्यादा पढ़े है या राहुल से कम। इस देश में आजतक किसी मंत्री और प्रधानमंत्री की योगयता के लिए सवाल नहीं पूछे गए ,,बजह ! शैक्षणिक योगयता इनके लिए अपेक्षित नहीं है। वैसे प्रधानमंत्री मोदी एम ए  प्रथमश्रेणी से उत्तीर्ण है ऐसा गुजरात यूनिवर्सिटी का दावा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि मौजूदा हालत में देश जिन समस्यायों से गुजर रहा है ,सूखे की चपेट में ७ राज्य के ११ करोड़ से ज्यादा लोग पानी के लिए तरस रहे हैं.. प्रति दिन ४ किसान आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या कर रहे है ,मंदी के कारण बेरोजगारों को नौकरी नहीं मिल रही है।  देश के प्रधानमंत्री को सवाल पूछने के बजाय हमारे सांसद अपने आका को खुश करने के लिए बे सिरपैर के तर्क गढ़ रहे है।  सियासी बहस प्रधानमंत्री की योगयता को लेकर  हो रही है। 

संविधान सभा में जनप्रतिनिधियों की योगयता पर जब बहस चलरही थी तो कई गणमान्य सदस्यों का तर्क था कि एम एल ए और एम पी की योगयता स्नातक और नहीं तो मैट्रिक जरूर होनी चाहिए। .यह बात गांधी जी तक पहुंची उन्होंने इसे देश के साथ इसे बड़ा मजाक माना। गांधी जी का तर्क था भारत का किसान आज भी मिटटी को पैर से दबाकर मौसम की भविष्यवाणी करता है ,उस देश में उनके अनुभव को किसी के योगयता से कमतर नहीं आँका जा सकता और वही हुआ जो गांधी जी चाहते थे। .यानि देश चलाने के लिए अनुभव को तरजीह मिली । अमेरिकी कांग्रेस के स्पीकर अगर पी एम मोदी को अपने सदन को सम्बोधित करने के लिए निमंत्रण दिया है तो मन जायेगा उन्होंने मोदी के अनुभव को तरजीह दिया उससे वे कुछ सिखना चाहते हैं।  

यह बात केजरीवाल जी को समझाना जरूरी है कि करोडो रूपये खर्च करके दिल्ली में ओड -इवन इसलिए चर्चा में है क्योंकि दिल्ली को हरियाणा और उत्तर प्रदेश अपने हिस्से का पानी पिला रहा है ,जिस दिन दिल्ली के लोगों को  लातूर जैसी ,बुंदेलखंड जैसी समस्या से दो चार होना पड़े उस दिन न तो केजरीवाल जी किसी विज्ञापन में नज़र आएंगे न ही रेडियो टीवी पर ज्ञान देते नज़र आएंगे। नेता अपनी योगयता से नहीं ,अपने अनुभव से भौकने और सियासी सवाल रखने में फर्क करता है। .यह अनुभवहीनता ही है की कोई अपनी गली में भौक रहा है तो कोई पालतू बने रहने के लिए भौके जा  रहा है।मोदी को हराने के लिए भौकने से काम नहीं चलेगा बल्कि सियासी सवाल पूछने होंगे। लेकिन ऐसी स्थिति दूर दूर तक बनती नज़र नहीं आ रही है। ...

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

बीजेपी का यह राष्ट्रवाद किस काम का

" द पार्टी विद  ए डिफरेंस " वाली बीजेपी ३६ साल की हो गयी है यानी ३६ साल के इस सफर में बीजेपी को श्यामा प्रसाद मुखर्जी ,दीनदयाल उपाध्याय ,अटल बिहारी वाजपेयी ,लाल कृष्ण आडवाणी जैसे प्रखर नेताओं का नेतृत्व मिला। लेकिन राष्ट्रवाद को लेकर जितनी चर्चा बीजेपी की आज है उतनी कभी नहीं हुई। कश्मीर में दो विधान दो निशान का विरोध करने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने क्या इसलिए बलिदान दिया था कि अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी कश्मीर में सरकार बना सके। क्या बीजेपी का यही राष्ट्रवाद था कि तिरंगा के सम्मान में खड़े नौजवानों को उनकी ही सरकार में पुलिस की बेरहमी का शिकार होना पड़े।
 आज अगर एन आई टी के नौजवान भारत की अस्मिता और तिरंगे के सम्मान के खातिर लाठी खा रहे है तो बीजेपी का यह राष्ट्रवाद किस काम का। भारत के टुकड़े टुकड़े होंगे और आज़ादी का नारा लगाने वाले जे एन यू के तथाकथित सेक्युलर नौजवानों को इसी देश के मीडिया और बुद्धिजीवी लोगों ने हीरो बनाकर पेश किया है लेकिन कश्मीर का वाकया न तो मीडिया के लिए और न ही बुद्धिजीवियों को शर्मसार कर रहा न ही सरकार इसमें ज्यादा प्रचार चाहती है। राज्य के साबिक़  मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्लाह आज सरकार को नसीहत दे रहे हैं कि इसे टैक्टफूली डील करना चाहिए था पुलिस की भूमिका नहीं होनी चाहिए थी।  यह वही अब्दुल्लाह है जिनकी हुकूमत में 112 बच्चे महज एक साल में पथ्थरवाजो और पुलिस के झड़प में मारे गए थे। वो आज उपदेश दे रहे है..  भारतमाता की जय और तिरंगा का सम्मान चुनावी मुद्दा नहीं हो सकता यह बीजेपी को अच्छी तरह पता है क्योंकि यह वही देश है जिसने श्यामा प्रसाद और दीनदयाल की कुर्बानी को एक हादसा से ज्यादा तब्ब्ज्ो नहीं दिया था। हलाकि जो कुछ भी बदलाव जम्मू कश्मीर में हुए वह श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान का ही नतीजा था।  एन आई टी के संघर्ष में भले ही बीजेपी कन्नी काट रही हो लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए बीजेपी में आदर्श श्यामा प्रसाद मुखर्जी ही रहेंगे। .सरकार सरकार खेल कर अमित शाह  आदर्श कभी स्थापित नहीं कर पाएंगे। ..

शनिवार, 5 मार्च 2016

अब मैं कन्हैया हो गया हूँ......

मै हूँ अन्ना ,मैं हूँ केजरिवाल अब मैं कन्हैया हो गया हूँ। .. लेकिन मैं कभी ललितपुर का लोटन नहीं बनना चाहता हूँ और न ही  बुंदेलखंड और  नागपुर  के मंगतू राम जैसे हज़ारो किसानो में मेरी कोई दिलचस्पी है जो महज पचास हज़ार कर्ज न चुकाने के कारण आत्महत्या कर लेता है..मैं आज कन्हैया इसलिए हूँ कि वह मोदी को गरिया रहा है कल मैं केजरीवाल इसलिए था क्योकि वह मनमोहन सिंह को चोर कह रहा था....मीडिया में आज सिर्फ"" आज़ादी" की खबरे छप रही है मानो कुछ संपादको को गांधी के रूप में कन्हैया मिल गए  हो और वर्षो से गुलामी के बेड़ियों में जकड़े टीवी के स्वनामधन्य संपादको को खुली हवा में साँस लेने का मौका मिल गया हो। मीडिया में कही मोदी के समर्थन में जे एन यु के अति उत्साहित छात्रों को राष्ट्रद्रोही बताया जा रहा है तो कही  कुटिल संपादको की फौज जिन्हे मोदी और उनकी सत्ता से चिढ है वे इसे hight ऑफ़  इंटॉलरेन्स बता रहे है..
. एक गरीब माँ का बेटा कन्हैया जिसे आज मीडिया स्टार बता रहा है और लोगों को मानने के लिए विवश भी कर रहा है..कभी केजरीवाल को बेईमान तंत्र के सामने कठोर व्रती ईमानदार पेश करके मीडिया एक नयी उम्मीद का छदम माहोल बनाता है। . . ठीक वैसा ही गरीब माँ का बेटा मोदी अपने संघर्ष और मीडिया \सोशल मीडिया पराक्रम से आज देश का प्रधानमंत्री बन गए है.. लेकिन इस देश के गरीबो ,बेरोजगारो की हालात में कोई तबदीली नहीं आई। लेकिन इस सियासत को समझना जरुरी है कि पत्नी सीमा चिस्ती बतौर संपादक इंडियन एक्सप्रेस में कन्हैया के भाषण का अंग्रेजी अनुवाद छाप रही है और पति सीताराम येचुरी कन्हैया को बंगाल के इलेक्शन में स्टारप्रचारक बना रहे है
.केजरीवाल के चाटुकार आज संवैधानिक सत्ता की नई परिभाषा गढ़ रहे है   तो मोदी जी  जुमले और नित नयी योजनाओ के साथ विकास का दिवा स्वप्न दिखा रहे है .वो शायद भूल रहे है कि कुछ लोगो को उपकृत करने के लिए इस देश ने उन्हें प्रधानमंत्री नहीं चुना है। वे देश को एक नयी दिशा देने के संकल्प लेकर आये थे।  मीडिया अगर कांग्रेस का नहीं हुआ तो किसी का नहीं हो सकता इस बात की चिंता किये बगैर प्रधानमंत्री मोदी  कुछ तब्दीली का एहसास कराएँगे तो बगैर अमित शाह और स्मृति ईरानी,राजनाथ सिंह ,अरुण जेटली  के कई चुनाव जीत जायेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो मीडिया जैसे यू पी ए टू पर हावी था वैसा ही हावी होने की कोशिश एक बार फिर करेगा। .. 
 आज का मीडिया देश की मूल समस्या से लोगों को और सरकार को भटका रहा है..... देश के बंज़र हो रही धरती ,मर रहे किसानो और बढ़ रहे भ्रष्टाचार पर संसद को बहस के लिए कम्पेल किया जा सकता है लेकिन कुछ मुठी भर बैमानो के साजिश के कारण बहस का मुद्दा टॉलरेंस हो गया है,,,बहस कन्हैया की आज़ादी को लेकर हो रही है बहस कन्हैया और उमर  खालिद के बहाने  जे एन यू की सुचिता की  हो रही है । "आज़ादी का   मतलब देश के उन किसानो से पूछा जाना चाहिए जिसे इस देश का भ्रष्टतंत्र हरदिन आत्महत्या के लिए उकसा रहा है ...... .  . 
" जिस खेत से दहक़ाँ को मय्यसर ना हो रोज़ी ,
उस खेत के हर खोशा ए गन्दुम को जल दो। 
उठो मेरी दुनिया के ग़रीबो को जगा दो। .इक़बाल 

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

मोदी सरकार के इक़बाल पर सवाल


उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से बीजेपी "मिशन यू पी " की शुरुआत कर रही है... कही से भी करे ये पार्टी  का मामला है ,लेकिन बलरामपुर क्यों ? शायद इसलिए कि बलरामपुर का सरोकार अटल जी से रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी ने  इसे अपना कर्मभूमि माना था और यही से पहला लोकसभा चुनाव लड़ा था । लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में न तो अटल की चर्चा थी ,न ही आडवाणी की और न ही पंडित दीनदयाल की.... सिर्फ मोदी। .इसी मोदी को आगे करके पार्टी ने केंद्र  सहित 7 राज्यों में सरकार बनाली ,लेकिन आज अलग अलग राज्यों में अलग अलग आदर्श और नाम ढूंढे जा रहे है, तो क्या मोदी की चमक फीकी पड़  रही है या यूँ कहे की  मोदी सरकार का इकबाल कमजोर हो  रहा है ? क्या इसके लिए देशी-विदेशी एन जी ओ जिम्मेदार है ?

मोदी सरकार की जन - धन और फसल बीमा योजना इस दशक का सबसे बड़ा रेफोर्मेशन माना जा सकता है लेकिन अगर चर्चा सिर्फ जे एन यू  के देश भक्त और देश द्रोही की हो रही है तो माना जा सकता है कि सरकार दिशाहीन है।  बीजेपी के एक विधायक  यूनिवर्सिटी में शराब की बोतल  और कॉन्डोम गीन रहे है और दिल्ली पुलिस पिछले 50 घंटे से कैंपस के बाहर खड़ी हो कर यह इन्तजार कर रही है कि तथाकथित देशद्रोही छात्र देश के कानून का पालन करे, वही मुल्क की 1. 5 अरब लोग बड़ी उम्मीद से सरकार के बजट फैसले का इंतजार कर रहे हैं लेकिन संसद जे एन यू और हैदराबाद यूनिवर्सिटी मामले पर चर्चा के लिए अड़ी है..... मुठी भर जाट आंदोलनकारी पुरे हरियाणा को जला डाला और सरकार उन्हें पुचकारने में लगी है यहाँ भी साजिश की बात हो रही है। कश्मीर के पोमपोर में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में हमने तीन ब्रिलिएंट कमांडो  खो दिए। जवानो ने अपनी जान  देकर ५०० से ज्यादा लोगों को फायरिंग रेंज से बाहर निकाला। .लेकिन कुछ लोग वहा भी पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगा रहे थे। ठीक उसी वक्त राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर देश के दो होनहार नेता राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल सेडिशन कानून और बोलने की आज़ादी छीनने के लिए मोदी सरकार को जी भर गरिया रहे थे।

अरविन्द केजरीवाल के आरोप गौर करने लायक है या नहीं यह बहस का विषय है लेकिन बोलने की आज़ादी रोकने का आरोप टोटल बकवास माना जा  सकता है। यहाँ प्रधानमंत्री से ज्यादा साक्षी महराज ,साध्वी निरंजना ,गिरिराज ,महेश शर्मा जैसे धुरंधर नेता अखबारों में छपते है। यहाँ पार्टी के प्रवक्ता हर विषय पर बाइट देने के लिए सदा उपलब्ध हैं। बांकी कसर सोशल मीडिया पूरा कर देता है।  ये वही सोशल  मीडिया है जिसके ट्रेन्डिन्डिंग  कभी नमो हुआ करता था आज #jnu हो गया है। फिर दिक्कत कहाँ है ,दिक्कत सोच में है। मोदी सरकार कांग्रेस की रणनीति अपनाकर लम्बी पारी खेलने की जुगत लगा रही है। प्रधानमंत्री शायद अपनी ही बात भूल चुके है कि "कितनी दूर चले और कहाँ पहुंचे इसका विशेष महत्व नहीं है महत्व यह है इस यात्रा का अनुभव कैसा रहा " फार्मूला से भले पहले सियासत चलती  रही हो देश चलता रहा हो लेकिन आज इसका कोई मह्त्व नहीं है ,मोदी सरकार में चार जाट मंत्री और राज्य के छह जाट मंत्री हरियाणा को  जलने से नहीं बचा सके तो माना जा सकता है समाज में जात का नहीं त्याग  का मह्त्व रहा है। देश ने प्रधानमंत्री मोदी  जाति के फॉर्मूले से प्रधानमंत्री नहीं बनाया था लेकिन उन्होंने मंत्रिमंडल का गठन में कॉंग्रेसी परंपरा का पालन किया अपने ही आदर्श को किनारा कर दिया। नतीजा दो साल बाद देश के सामने है। अगर एक अख़लाक़ , रोहित वेमुला सरकार के किये कराये पर पानी फेर सकता है तो माना जा सकता सरकार की संरचना में कोई खोट है या सरकार मंजिल से भटक चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी परिवर्तन के आदर्श हैं लेकिन इस दौर में इमेज के प्रति कुछ ज्यादा सावधान हो   चले है.  अनेकता में एकता इस देश की सांस्कृतिक पहचान है लेकिन घर हो  या देश सिर्फ इक़बाल से चलता है और इसके लिए इमेज से जरुरी वह फैसला है जिसके सामने लोग,समाज और संप्रदाय नहीं सिर्फ देश देश होता है।  जय हिन्द !
विनोद मिश्रा


शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

ये सब रंगमंच की कठपुतलियाँ है

 
विश्वगुरु भारत इनदिनों टीवी गुरुओं के प्रवचनों से थोड़ा कंफ्यूज है। भक्त और तथाकथित गैर भक्त संपादको-पत्रकारों   ने अपनी तरफ से आंदोलन छेड़ रखा है। देश प्रेम और देश द्रोह के मुद्दे पर टीवी स्टूडियो में समुद्र मंथन जारी है फर्क सिर्फ इतना है कि इस मंथन का विष पिने के लिए सिर्फ  दर्शक मजबूर है....     टीवी पर अपनी  ज्ञान धारा बहाने के बाद संपादको का सोशल मीडिया पर बक.... यानी संपादकों के मुख से निकले एक एक शब्द देश के दशा और दिशा तय करने का दम्भ भर रहा है।  तमसो मा ज्योतिर्गमय  की बात करने वालों का ऐसा अहंकारी भाव पहले शायद ही देखा गया हो।

"ये सब रंगमंच की कठपुतलियाँ है जिनकी डोर उपरवाले की उँगलियों में बंधी है। .कब, कौन और कबतक ज्ञानी बना रहेगा ये कोई नहीं बता सकता सिर्फ ऊपर वाला जनता है  हा हा हा .".... दिल पर मत लो यार ........