संदेश

क्या वाजपेयी फिर नहीं आयेंगे" ?

चित्र
"क्या वाजपेयी फिर नहीं आयेंगे" ? हानि लाभ के पलडो में ,तुलता जीवन व्यापर हो गया .!
मोल लगा विकने वालों का ,बिना बिका बेकार हो गया !
मुझे हाट में छोड़ अकेला ,एक एक कर मीत चला
जीवन बीत चला ....
एक दार्शनिक -राजनीतिग्य अटल बिहारी वाजपेयी जीवन के 93 वे वसंत पूरा कर इन दिनों जिंदगी के अखिड़ी पड़ाव पर खड़े हैं ।राजनीती के अखाड़े में अपनी प्रखर बौधिक क्षमता की बदौलत अटल जी 50 साल तक निरंतर अजेय रहे। अपने सिधान्तो लेकर वे हमेशा अटल रहे ..
हार नहीं मानूँगा,
रार नहीं ठानूँगा,
काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ।
गीत नया गाता हूँ। .गैर कांग्रेसी सरकार के वे पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने 6 साल देश के शासन की जिम्मेदारी संभाली और देश के आर्थिक प्रगति खासकर संचार और सड़क निर्माण से देश के गाँव को जोड़ने में अटल जी का योगदान इस सदी का सबसे बड़ा संचार क्रांति माना जा सकता है। .संवाद और संपर्क अटल जी के विकास दर्शन में शामिल थे और यही दर्शन उनके शासन काल में आदर्श बना। हजारो -लाखो लोगों के लिए यह वाकई कर लो दुनिया मुठ्ठी में का व्यवहारिक पाठ था। यही वजह है की भारत में संचार क्रांति और सड़क निर्माण का जो सिलसिल…

आज़ादी के 70 साल : देशवासी होने का कुछ कर्तव्य भी है

चित्र
आज़ादी के 70 साल ! और भारत ,कई दृष्टिकोण कई नजरिया ! ठीक वैसा ही जैसे सात अंधो ने एक हाथी के बारे में अपनी राय दी थी ,किसी ने हाथी को विशाल दीवार जैसा ,किसी ने उसके कान को छूकर  बड़ा पंखा जैसा जानवर बताया। . अपने अनुभव से सबने हाथी का सही आकर बताया  था लेकिन समग्रता में ही इनके अनुभव को हाथी कहा जा सकता था। आज़ादी के 70 साल में देश ने काफी तरक्की की है ऐसी तरक्की की आज हर भारतवासी चलता फिरता "प्रेस" हो गया है और हर कोई अपनी राय सार्वजानिक कर रहा है। यही तो था आज़ादी का संकल्प जिसके लिए गाँधी महात्मा बने और हज़ारो ने अपने प्राणो की आहुति दी। लेकिन एक सवाल यक्ष प्रश्न बनकर आज भी खड़ा है कि आर्थिक आज़ादी के बगैर राजनितिक आज़ादी या मुहं खोल कर किसी को गरियाने की आज़ादी सार्थक है ? आपका जवाब जो भी हो लेकिन एक राष्ट्र के रूप में आज़ादी के नाम पर मीडिया-सोशल मीडिया  में बे सिर -पैर का शोर ने आज़ाद भारत की  छवि को  धूमिल किया  है। 

मौलिक अधिकारों  को लेकर रात में भी अदालत लगवाने वाले लोग कभी संविधान के  मौलिक कर्तव्यों को लेकर कोर्ट गए हैं ? तो क्या आज़ादी का मतलब आज सिर्फ सत्ता पर कायम होना और…

मीडिया : हम भी हैं पत्रकार

चित्र
कुत्ता पालो ,बिल्ली पालो ,कुछ भी पालो लेकिन गलतफेहमी मत पालो। दरअसल टीवी मीडिया में सम्पादकों ने अपने को लार्जर देन लाइफ पेश कर अपने को सेलिब्रेटी बना लिया है। और इस ग़लतफ़हमी में कुछ टीवी संपादक /एंकर ने जीने की आदत डाल ली है कि वे जब कुछ बोलते हैं तो पूरा देश सिर्फ उन्ही को सुन रहा है। मानो देश इतनी फुर्सत में है कि लोग या तो टीवी देखते हैं या सिर्फ सोशल मीडिया पर एक्टिव है। कोई गला फाड़ के चिल्ला रहा है तो कोई फ्लोर डांस करते हुए अलग अलग भाव में खबर बेच रहा है तो कोई संपादक उपदेशक की मुद्रा में देश को स्कूली बालक समझ कर एजेंडा परोस रहा है। हालात यह है कि संपादक /एंकर और पार्टी प्रवक्ता में विभेद करना मुश्किल है। गाँधी जी ने कहा था स्वस्थ , जांची परखी सूचना ,संतुलित आलोचना सार्बजनिक जीवन में ओज़ोन लेयर का काम करती है। जाहिर है इस कसौटी पर आज एक भी संपादक खड़े नहीं उतर पाएंगे। कारण संस्थागत कम व्यक्तिगत ज्यादा है। आपातकाल के निर्णय को कभी सही बतानेवाले महान संपादक खुशवंत सिंह को अपने ऑफिस घुसने की इजाजत गार्ड ने नहीं दी और उन्हें बताया गया कि उनकी सेवा समाप्त कर दी गयी है। ऐसी स्थित गिरि…

चुनावी एजेंडे में गुम हो रही है नए भारत की कहानी

चित्र
आज के दिन देश के 4 लाख गाँव खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं। अबतक देश के 417 जिले और 19 राज्यों ने भी खुले में शौच से मुक्ति का एलान कर दिया है।  भारत के लगभग 90 फीसद भूभाग पर स्वच्छ भारत अभियान ने किला फतह कर लिया है। लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि इसमें सरकार के 12000 रूपये से ज्यादा सहयोग 95  वर्ष की कुंवर बाई  की है जिसकी प्रेरणा से उनका  पूरा गाँव ओ डी एफ हो गया। बिहार के सीतामढ़ी के गाँव में 12 -15 साल  क़े किशोरों की टोली ने सीटी बजाकर  लोगो को खुले में शौच जाने की गन्दी आदत को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। वही डीएम रंजीत कुमार जिले में  स्वच्छाग्रही बनकर हर घर में शौचालय निर्माण को संभव बनाया। सुबह सवेरे सड़क के किनारे गश्त लगाकर बैठे डीएम को लोगों ने भले ही न पहचाना हो लेकिन बिहार के इस पिछड़े जिले में लोगों ने उनकी बात सुनी और सीतामढ़ी बिहार का पहला ओ डी  एफ  जिला बन गया । ऐसे अनेको कहानियाँ है जिसने स्वच्छ भारत अभियान को विश्व का सबसे असरदार  बेहेवियर चेंज का  आंदोलन बना दिया है उसमे आपके घर के बच्चों का भी योगदान है । लेकिन मीडिया और सोशल मीडिया में किसी टूटे हुए शौचालय  और कचरे…

कश्मीर मसला या पावर शेयरिंग फार्मूला

चित्र
यह सवाल आम हिंदुस्तानी के मन में जरूर उठता है कि कश्मीर का मसला क्या है। जितना मैं समझ पाया हूँ कि वर्षो पहले कुछ नेताओं ने जो गांठ हाथों से लगायी थी मौजूदा पीढ़ी को वह गांठ दातों से खोलना पड़ रहा है। भारत के सबसे प्राचीन ऐतिहासिक ग्रन्थ राजतरंगनी के रचयिता कल्हण को भी शायद इस बात का इल्म नहीं रहा होगा कि जिस कश्मीर के चश्मे से वे भारत की सामजिक और राजनितिक व्यवस्था को झांक रहे हैं वह कश्मीर कभी अपने को अलग सामाजिक संरचना मानकर भारत की अस्मिता पर सवाल उठाएगा । या फिर 14 वी शदी के ऋषि परंपरा में कश्मीर के शेख उल आलम या नुंद ऋषि हो या फिर लल डेड या लल्लेश्वरी। भारत को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत करके कश्मीर के महान सूफी संतो और ऋषियों ने मजहबी दकियानूसी को हमेशा ख़ारिज किया। फिर वह कौन सा दौर था जिसमे कश्मीर की हजारो साल की परंपरा गौण हो गयी और व्यक्तिगत महत्वाक्षा ने कश्मीर को मसाला बना दिया। हालात यह है कि जावेद अहमद डार ,औरंगजेब ,उमर फ़ैयाज़ जैसे दर्जनों कश्मीरी नौजवान देश की अस्मिता की रक्षा में जान दे रहे हैं वही उसी कश्मीर में कुछ नौजवान बुरहान वानी बन बन्दुक उठा रहे है तो कुछ नौजवानो…

सामाजिक न्याय के नए युवराज और ग्राम स्वराज

चित्र
बाबा नागार्जुन का  जन्मदिन 30 जून किसके लिए महत्वपूर्ण है किसके लिए नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है लेकिन आज़ादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी गाँव ,गरीब ,मजदूर की हालत कितनी  बदली है यह आज भी एक बड़ा सवाल है। 50 साल पहले बाबा जिस सिस्टम की बात अपनी कविता में कर रहे थे  वह कितना बदल पाया है :
सपने में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,
भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे!
माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का,
हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का!
मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को ... तो क्या  गाँव सचमुच आज भी  मेहनतकश किसान /मजदूरों को  दो जून की रोटी जुटाने की जुगत नहीं जोड़ पाया। मौजूदा सरकार की ग्राम स्वराज अभियान ने कमोवेश इसी सच से पर्दा उठाने का काम किया है।
जिला रोहतास का प्रखंड नौखा ,दिल्ली से आये नोडल ओफिसर अत्यानन्द  गांव वालो से पूछते है कितने लोगों को अबतक घर नहीं मिला है ?सबने हाथ उठाया ,कितने घरों में शौचालय है ?एक भी घर में  नहीं . बिजली क्यों नहीं आयी . स्थानीय प्रशासन इसके लिए नक्सल को जिम्मेदार ठहराते है। जबकि पिछले 10 वर्षों में इन इलाकों में एक भी…

"यही तो रोना है कश्मीर में कोई नयी बात नहीं बोल रहा है"

चित्र
जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा -केरल से करगिल घाटी तक
सारा देश हमारा ..एक नारा कश्मीर में सरहद पार से भी प्रायोजित हुआ  कश्मीर बनेगा पाकिस्तान मीट के रहेगा हिंदुस्तान। तो क्या एक ऐतिहासिक भूल ने कश्मीर को समस्या बना दिया है और लगातार इंसानी जाने जा रही है।  डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी की रहस्मयी मौत पर दुःख व्यक्त करते हुए  तात्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने  कहा था  जब बड़ी गलतियां की जाती हैं, तब इस उम्मीद में चुप रहना अपराध है कि एक-न-एक दिन कोई सच बोलेगा" .. और यह सच बोलने की हिम्मत श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिखाई और बिना परमिट लिए   एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान, नहीं चलेगा- नही चलेगा के नारे के साथ कश्मीर में दाखिल हो गए   थे। मुश्किल यह है कि आज भी 65 साल बीत जाने के बाद भी  कोई सच बोलने की हिम्मत नहीं दिखा रहा है।  दिल्ली स्थित सैयद अली शाह गिलानी के घर से लौटते वक्त मुझे उनका एक रिश्तेदार मिला पूछा क्या खबर लेकर जा रहे हो ? मैंने कहा भाई पुरानी टेप और आज में कोई अंतर नहीं है। मुस्कुराते हुए उसने कहा "यही तो रोना है कश्मीर में कोई नयी बात…