शनिवार, 3 दिसंबर 2016

केंद्रीय सेवा का इम्तिहान एक समान तो फिर शिक्षा क्यों न हो एक समांन



सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर जम्मू कश्मीर में स्कूल की बदहाली पर एक बार फिर भावुक हो   उठे , उनका मानना है कि सिर्फ शिक्षा से ही विकास संभव है जो जम्मू कश्मीर में हो नहीं रहा है । पिछले साल  इलाहाबाद उच्च न्यांयालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में सभी अधिकारियों और मंत्रियों के  बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने का आदेश यू पी के समाजवादी सरकार को दिया था। समाजवाद की बात करने वाली सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह कर अभी तक उस फैसले को टाल रही है। यह वही देश है जहां टॉप ब्यूरेक्रेट के बच्चों को पढ़ने के लिए 1 रूपये में कई एकड़ जमीन  राजधानी दिल्ली में  लीज पर दी जाती है।
यह वही देश है जहाँ बच्चो को स्कूल में पोशाक मिल जाते हैं लेकिन किताब नहीं। यह वही देश है जहाँ संसद में स्कूल के मीड डे मील घोटाले की  चर्चा होती है लेकिन जर्जर शैक्षणिक व्यवस्था पर कोई नहीं बात करता।  एक देश सैकड़ो सिलैबस ,कोई बरगद के नीचे पढ़ रहा है कोई सेंट्रलाइज़ड ऐ सी वाले स्कूल में। लेकिन कॉम्पेटीशन एक समान  ,केंद्रीय सेवा का इम्तिहान एक समान तो फिर शिक्षा क्यों न हो  एक समांन?

नोटबंदी पर चीफ जस्टिस साहब  का रबैया थोड़ा सख्त  है। नोटबंदी के बाद एक क्रांति माय लार्ड भी कर दे। काले धन में जो पैसा सरकार के खजाने में आता है उसे पुरे देश में स्कूल बनवाने का आदेश दे ।
कोर्ट में जज की जरुरत है ,इंफ्रास्टकचर की जरुरत है ,माय लॉर्ड इसके लिए पूरी कोशिश  रहे   हैं। लेकिन  देश में स्कूल भी चाहिए ,अच्छे शिक्षक चाहिए इसकी कोई चिंता नहीं कर रहा  है।  कर के देखिये मुल्क याद रखेगा 

गुरुवार, 24 नवंबर 2016

रूपये का एयर फ्लाइंग

दुनिया में तीन तरह के लोग होते  हैं एक वे जो जन्मजात  ईमानदार होते हैं ,एक वो जिनकी फितरत में बेईमानी  है एक तीसरा भी है जो परिस्थिति के अनुरूप संकल्प बदलता  हैं।  कालेधन के खिलाफ अभियान में सबसे ज्यादा बेचैनी  दूसरे नंबर के लोगों में ज्यादा है ये बात अलग है कि ईमानदार बनने की कोशिश में लगे आम आदमी को भी इस दौर में नोटबंदी ने मुश्किलें बढ़ा दी  है। 

 जनधन योजना और उसकी सफलता विफलता पर खूब चर्चा हुई। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हुई कि ज़ीरो बैलेंस के इन खातों की किश्मत कैसे बदलेगी।  लेकिन नोटबंदी के बाद पिछले एक हफ्ते में इन खातों में 21000 करोड़ रुपया जमा होना एक नयी हलचल की ओर इशारा करती है। जनधन के 25ooo एकाउंट्स की किश्मत कैसे पलटी यह आईटी के लोगों के लिए उत्सुकता का विषय हो सकता है लेकिन पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में इन अकाउंट्स में बढ़ी हलचल ने ब्लैक एंड व्हाइट पर छिड़ी बहस को तेज कर दिया है। चार्टर्ड प्लेन से मंगलावार को नागालैंड के दिमापुर एयरपोर्ट पर  पहुंचा करीब 4 करोड़  रुपया नोटबंदी के बाद अचानक रूपये का एयर फ्लाइंग एक नए साजिश का खुलासा किया है। 

यानी नोट की चोट से आहत कुछ लोगों ने नार्थ ईस्ट के पहाड़ी और आदिवासी लोगों को मिले टैक्स में  छूट को कारगर हथियार बनाने की कोशिश की है। . 
उत्तर पूर्व के राज्यो में नागालैंड ,मणिपुर ,त्रिपुरा ,अरुणाचल प्रदेश ,मिजोरम और असम  के अनुसूचित जनजातियों के इनकम के किसी भी सोर्स पर आयकर की छूट है। ऐसी छूट लद्दाख ,सिक्किम और मेघालय के कुछ जनजातियों को भी मिली हुई है। यानी व्यवस्था में मिली इनकी छूट को कुछ लोगों ने जुगाड़ के रूप में विकसित करने की कोशिश की है। 
 मुश्किल जॉग्राफी हालात में रहने वाले भोले भाले लोगों से संपर्क बढ़ा है तो हर कानून का तोड़ ढूंढने वाले लोगों ने कृषि क्षेत्र में होने वाली आमदनी से लेकर पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट ,कड़ी एंड विलेज इंडस्ट्री कुछ शिक्षण संस्थानों को मिली टैक्स की छूट को ढाल बनाने की कोशिशें हो रही है। हालाँकि सरकार ने यह पहले साफ़ कर दिया है कि ऐसे लोगों को कानून के दायरे में लाया जाएगा लेकिन अरबो -खरबो रूपये के ब्लैक मनी को बचाने की छटपटाहट साफ़ नज़र आती है 

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोटबंदी : देश में सियासत के तर्क और अर्थ दोनों बदल जाएंगे


कालेधन के खिलाफ अभियान  को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश  कुमार शेर की  सवारी मानते हैं ,वे मानते हैं कि मोदी सरकार के इस फैसले से जनसमूह की भावना जुडी हुई है।ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी लगभग ऐसा ही विचार रखते हैं  लेकिन नीतीश जी के सत्ता के साथी  लालू जी माया ,मुलायम , ममता  ,केजरीवाल और कांग्रेस के साथ खड़े  है। ममता जी के बंगाल में नोटबंदी के खिलाफ एक भी रैली सामने नहीं आयी है न ही लोगों का विरोध केरल,कर्नाटक,नार्थ ईस्ट के राज्यों और त्रिपुरा से सुना गया है. ममता दिल्ली में केजरीवाल के साथ रैली कर रही है तो कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक  दल संसद के अंदर प्रदर्शन कर रहे हैं।

विमुद्रीकरण के बाद असल बात तो यह है कि आज अपनी सियासत जिन्दा रखने  के पीछे लीडरों के पास  सही तर्क नहीं है ।यही वजह है कि संसद के अंदर और बहार विरोध करने वालों की अलग अलग जमात हैं।
देश के आम अवाम राष्ट्रहित में इसे एक बड़ा फैसला मानकर  एटीएम /बैंक के लाइन में खड़े है, हालाँकि अब जमीनी हालात में काफी तबदीली आयी है  लेकिन सियासी लीडर जनता का  नाम लेकर  संसद ठप्प कर रहे है।सरकार हर दिन लोगों के हित में प्रक्रिया को आसान बना रही है लेकिन हंगामे के कारण संसद चल नहीं रही है। जिसमे नुक्सान आम अवाम का ही है । असल में यह सियासी जंग फील इन  द ब्लैन्कस के लिए है..लोगों का मानना है कि ये सियासी जंग राष्ट्रीय नेता के रूप में पहचान बनाने का निजी संघर्ष है..  यकीन मानिये अगर नोटबंदी से ब्लैकमनी का १० लाख करोड़ रुपया सरकार के खजाने में आ जाता है ,जिसकी शुरुआत हो चुकी है तो देश में सियासत के तर्क और अर्थ दोनों बदल जाएंगे।  इन्तजार कीजिये..

शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

अगला नोबेल पीस प्राइज़ क्या भारत आयेगा ?


अगला नोबेल पीस प्राइज़ क्या भारत आयेगा ? बहुत ही सरल सवाल पूछ कर सुप्रीम कोर्ट ने देश के एक जटिल सवाल की ओर लोगों का ध्यान दिलाया है।  पिछले 50  वर्षो से मार्क्सिस्ट गुरिल्ला आतंक से लहुलहान कोलंबिया ने बामपंथी अतिवादियों से पीस डील करके इन्शानियत को नयी फ़िज़ा में सांस लेने का मौका दिया है। कोलंबिया में बामपंथी अतिवादियों की हिंसा में दो लाख साठ हजार लोग मारे गए और ६ लाख से अधिक ग्रामीण लोगों को  पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था।  जाहिर है कोलंबिया के प्रेसिडेंट जॉन मानुएल सांतोस को इस महान समझौते के लिए  सर्वश्रेष्ठ पीस प्राइज़ नोबेल प्राइज से सम्मानित किया गया। सुप्रीम कोर्ट का सवाल अपने आप में गंभीर है क्या जॉन  मानुएल सांतोस के महान कार्य को भारत में दोहराया नहीं जा सकता ? क्या भारत के विभिन्न प्रान्तों में जारी हिंसक आंदलोनों से संवाद का तार नहीं जोड़ा जा सकता ? इस देश की व्यवस्था ,बुद्धिजीबी और जन साधारण क्या इस चुनोती को स्वीकार करेंगे ?

कश्मीर में पिछले 25 वर्षों से जारी अतिवादी हिंसा का स्वरूप माओवाद हिंसा से अलग है। कश्मीर के  उग्रवाद का नियंत्रण पाकिस्तान के  हाथ में है जाहिर टेप कब और किस बक्त ढीला करना है यह पाकिस्तान तय करता है ,लेकिन माओवादी हिंसा एक स्थानीय संघर्ष है जसमे गुरिल्ला जंग का   उद्देस्य सिर्फ सत्ता है। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों की सनक घडी की सुई को उलटी दिशा में घुमाने की है जो जनतंत्र की जमीनी सचाई को झूठ बताकर मार्क्स और माओ को आदर्श बनाने की  की जींद पर अड़े हुए हैं। लेकिन क्या दिल्ली इतना पाक साफ़ है कि सारे इल्जाम इन्ही गुरिल्लों के सिर थोप दिया जाय ?

नक्सल आतंक के खिलाफ पिछले कई वर्षों   से सरकार पूरी ताकत लगा रखी है , कांग्रेस सरकार  यह नही तय कर पायी की इस जंग की कमान किसके हाथ मे होगी ?. यानी यह जंग राज्य सरकार   लड़ेगी या केंद्र।  एलेक्शन  का सवाल लगभग हर पार्टी के लिए अहम् है सो कई पूर्वर्ती सरकार  सामने नही  आना चाहती थी।  केंद्र की चालाकी यह थी कि  राज्य सरकारों को आर्थिक मदद के साथ साथ  ४० से ५० बटालियन सी आर पी ऍफ़  नक्सल प्रभावित राज्यों को भेज रहे  थे .लेकिन लड़ाई की जिम्मेदारी राज्य सरकारों  पर छोड़ रहे थे। राज्य सरकार चाहती थी  कि नक्सल  खिलाफ  लड़ाई  केंद्र सरकार  खुद लड़े.  यह देश का सवाल नही था यह  वोट का सवाल था  . मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नक्सल के खिलाफ सख्त बयानवाजी करते दीखते है लेकिन करवाई के सवाल पर हमेशा पीछे हट  जाने के   लिए  मसहूर हैं। बंगाल की पूर्वर्ती  सरकार को कई टॉप नक्सली  सेफ पैसेज देना पड़ा था ,अपने  अफसर को आज़ाद  कराने के लिए कई नक्सली कमांडर को छोड़ना पड़ा था। यही हाल ओडिशा  छत्तीसगढ़ का था  जहा  हर होस्टेज क्राइसिस के समय राज्य सरकार नक्सली के  सामने घुटने टेकते नज़र आयी।लेकिन इस सियासी दावपेंच का भारी नुक्सान हमेशा सुरक्षाबलों को उठाना पड़ा था ।  

 .पिछले ४ वर्ष पहले तक देश के तकरीबन १४  राज्यों में नक्सलियों का दबदवा कायम था  .पिछले वर्षो में नक्सलियों ने ३ ५०० से ज्यादा हिंसक वाकये को अंजाम देकर १७०००  से ज्यादा लोगों की जान ले ली है  ,जिसमे २००० से ज्यादा सुरक्षाबलों ने अपनी जान की कुर्वानी दी है .अरबों खरबों रूपये के निवेश नक्सली सियासत की भेट चढ़े है  .. यह दिल्ली को तय करना था लेकिन जिम्मेदारी दूसरे पर डाली जा रही थी। 
मौजूदा दौर में नक्सल के खिलाफ अभियान के  ढोल नगाड़े नहीं बज रहे है। .न ही किसी आपरेशन की खबर मिडिया में छप रही है। तो क्या सरकार ने नक्सल के खिलाफ अभियान को पिछे धकेल दिया है ? अभी हाल में बिहार में नक्सलियों ने घात लगा कर १० से ज्यादा सी आर  ऍफ़ जवानों को शहीद कर दिया है । जाहिर है इस हमले  से माओवादी केंद्र की अगली कार्रवाई और धैर्य  की लीमिट परखना चाहते थे।  नक्सली इस दौर में यह जान चुके है कि केंद्र अपनी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार है सो लड़ाई आसान नहीं है। 

लेकिन यह बात केंद्र को भी समझना होगा कि  माओवादी हो या कश्मीर के अलगाववादी भले ही इन्होंने देश के संप्रभुता के खिलाफ मोर्चा  खोला हो लेकिन जम्हूरियत में बात बोली से बनती है गोली से  नहीं। एक  दौर में कश्मीर  में अलगाववाद और  आतंक जम्हूरियत की मजबूती से कमजोर हुई थी। सेना की भूमिका इसमें न के बराबर थी। जम्हूरियत के तई भरोसा बढ़ाने को लेकर  अटल जी कश्मीर में आज भी आदर्श माने जाते है ,तो क्या इस परंपरा को मोदी सरकार आगे नहीं बढ़ा सकती है?  इस देश में हर समस्या का समाधान लोकतंत्र में ढूंढा जा सकता है यह समझने में मणिपुर की  आयरन लेडी इरोम  शर्मीला को १६ साल लगे। हो सकता है कि माओवादी  और अलगाववादी को  समझने में थोड़ा और वक्त लगे लेकिन सरकार इन प्रभावित इलाकों में स्थनीय निकायों में  जम्हूरियत की फ़िज़ा लौटा सकती है और व्यवस्था के प्रति लोगों में भरोसा बढ़ा  सकती है ।  करके देखिये अगला नोबेल भारत का होगा। 

शनिवार, 24 सितंबर 2016

चिनगारी का खेल बुरा होता है...

चार बांस चौबीस गज ,अंगुल अष्ट प्रमान 
ता ऊपर सुल्तान है ,चुको मत चौहान....चंदबरदाई ने यह संकेत  पृथ्वीराज को महमूद गोरी को मारने के लिए दिया था और अंधे कर दिए जाने के वाबजूद चौहान आतंकी सुल्तान का खात्मा कर दिया था। यह बीरो की धरती है यहाँ नगारे बजा के जंग नहीं लड़ी जाती ,यह इस देश का स्वाभिमान है कि वह अपनी लड़ाई खुद लड़ लेता है। इंडिया फर्स्ट लोगों ने यह  सीख किसी राजनेता से नहीं ली है बल्कि यह इसके स्वाभाव में है चाहे वह किसी जाति और मजहब से हो। फिर वर्षो से जारी पाकिस्तान के अघोषित युद्ध का जवाब हम क्यों नहीं ढूढ पाते ?  इस उहापोह की स्थिति में राष्ट्र कवि दिनकर जरूर याद आते है
 "ये देख गगन मुझमे लय है
ये देख पवन मुझमे लय है,मुझमे विलीन झनकार सकल
मुझमे लय है संसार सकल,अमरत्व फूलता है मुझमे,संहार झूलता है मुझमे..याचना नहीं अब रण होग.....जीवन जय या की मरण होगा.अटल बिहारी वाजपेयी दिनकर जी के बड़े प्रशंसक थे ..युद्ध की ऐसी स्थिति अटल जी के सामने भी आयी लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के लिए अलग तर्क गढ़ा... इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो, चिनगारी का खेल बुरा होता है । औरों के घर आग लगाने का जो सपना, वो अपने ही घर में सदा खरा होता है ।धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो ।
हमलो से, अत्याचारों से, संहारों से भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो ।..\


यह सिर्फ अटल जी कविता नहीं थी बल्कि उनका कन्विक्शन था... नेहरू से लेकर इंदिरा तक अटल बिहारी से लेकर नरेंद्र मोदी तक हर दौर में इस देश ने पाकिस्तान के विध्वंशक/निगेटिव  चेहरे को ही देखा है। हर दौर में राजनेताओ ने इसका डिप्लोमेसी और  जंग  से जवाब दिया   है।  आज भी  पाकिस्तान ५० के दशक  में खड़ा है और बैनलअकुयामी मदद पर आश्रित है  और भारत एक बड़ी आर्थिक ताकत बनकर विकसित देशो को टक्कर दे रहा है। बटबारे के अभिशप्त यह दो भाइयो की कहानी है  २४ घंटे चलने वाला चैनल भले ही आज इंडिया पाकिस्तान को राफेल और ऍफ़ १६  तुलना करके मुल्क को जंग के लिए उकसा रहे हों लेकिन नीति  निर्माता कुछ और सोच रहे हो.. .... यह कौन जनता है। भारत को इन्तजार का सब्र है।  

रविवार, 4 सितंबर 2016

हमें चाहिए इस कश्मीर से आज़ादी.

इंसानियत ,जम्हूरियत ,कश्मीरियत के घिसे पिटे दर्शन के साथ वादी पहुंची सांसदों की हाई प्रोफाइल टीम ठीक वैसी ही थी जैसी गोरखपुर में हर साल ब्रेन फीवर से २००-४०० बच्चो की मौत के बाद देशी-विदेशी एक्सपर्ट टीम वहां पहुँचती है।  न तो आजतक पूर्वांचल के ११ जिलों में इनशेफलाइटिस फैलने की वजह तलाशी गयी न ही कश्मीर में  रोग को ढूंढा गया कि ये पत्थर चलानेवाले कौन लोग है और इनकी बीमारी क्या है ? हरबार की तरह इस बार भी कुछ  बुद्धिजीवी और विवेकशील सांसद हुर्रियत लीडरों से मिलकर अपनी प्रखर भूमिका चाहते थे ,लेकिन पथरवाजों के डर से हुर्रियत के लीडरों ने फोटो ओप का मौका नहीं दिया। पथरवाजो का नारा है "हम क्या चाहते आज़ादी किससे आज़ादी यह साफ़ नहीं है लेकिन 58   दिन से बंद -हड़ताल और कर्फ्यू से पीड़ित लोगों को पूछिये वो मांग रहे हैं हमें चाहिए इस कश्मीर से आज़ादी। 
 
मीडिया में खबर सिर्फ पिलेट गन की होती है ,कश्मीर पर तथाकथित जानकार अलगाववादी लीडरों से बातचीत की  पुरजोर सलाह देते है और हुकूमत चार्वाक दर्शन को मानकर अँधेरा छटने का इंतज़ार कर रही है।  मेहबूबा अपना जनाधार खोने के डर  से लोकल पंचैती में विदेशी तर्क का सहारा ले रही है ,ओमर साहब  अपने को साबित करने के लिए इसे  बेहतर मौका मान रहे है। हुर्रियत के लीडरो की हालात कमोवेश उस खाप पंचायत जैसी है जिसका सुनता कोई नहीं है लेकिन चौधरी होने का दम्भ वो मीडिया  में  रखता है।  किसी के घर में चाहे कितना बड़ा भी शोक /मातम  हो  वह  ५८ दिनों तक अपना  सब कुछ छोड़ कर मातम नहीं मना सकता तो क्या एक लोकल रोमांटिक आतंकवादी बुरहान वानी की मौत से लोग  इतने आहात है कि  अपने छोटे छोटे बच्चो को पत्थर मारने के लिए उकसा रहे है ? 

कश्मीर के लोगों को पता है कि नेशनल -इंटरनेशनल मीडिया की सुर्खियों में  होना भी उनकी  परेशानी की  वजह है। कश्मीर केंद्रित सियासत से कुछ लोग जरूर मालामाल हुए लेकिन आमलोगों की हालात वैसी ही है जैसे जम्मू और लदाख के लोगों की है।  कश्मीर के लोगों ने पिछले २० साल के आतंकवाद को देखा है,  अपने अजीजो को खोने का दर्द देखा है , कश्मीर में जिहाद करने वाले सैयद सलाहुद्दीन के बच्चो को सरकारी अफसर बनते देखा  है। कश्मीर बनेगा पाकिस्तान का नारा देने वाले गिलानी साहब को सरकारी स्कूल टीचर से करोड़पति बनते हुए  देखा है ,उनके बच्चो की आला स्कूल में तालीम लोगों ने देखी है ,उनकी सरकारी आला नॉकरी देखी है। ..

 कश्मीर के लोग इन जज्वात के नुमाइंदे को अच्छी तरह जानते हैं।  हर एलक्शन में हुर्रियत और आतंकवादियों के बॉयकॉट को नज़रअंदाज़ करके वो  भारत की जमहुर्रियत को मजबूत करते हैं। .. लेकिन वो  कौन सी दुरी और मजबूरी है कि जम्हूरियत जिंदाबाद कहनेवाले लोग हम क्या चाहते आज़ादी की भीड़ में शामिल हो जाते हैं? यह पालिसी  फेल होने का नमूना है।    यह पांच फीसद बनाम पिचानवे फीसद  का का मामला नहीं है। यह जमहुर्रियत फेल होने का मामला है।   सत्ता में आमलोगों की भूमिका और स्थनीय निकायों को अधिकार देकर जमहुर्रियत को मजबूत किया जा सकता है। ओमर अब्दुल्लाह  की  हुकूमत में १०० से ज्यादा पंचायत प्रधान मारे गए ,अगर उस वक्त हमारे सांसद इसकी चिंता किये होते ,कोई प्रतिनिधिमंडल कश्मीर गया होता तो शायद आज ७० मासूम नहीं मरते। जम्हूरियत मजबूत कीजिये ,कश्मीरियत  और इंसानियत कश्मीर के  जर्रे जर्रे में मौजूद है। .. 
.... 

रविवार, 21 अगस्त 2016

कश्मीर पर बकैती नहीं , बात कीजिये

क्या कश्मीर के नौजवाब  बुरहान वानी  की मौत से इतना  खफा है कि वे स्टोन ऐज में लौट आया है ? क्या अलगाववादी ग्रुप वाकई हाउस अरेस्ट हैं और पिछले ४४ दिनों  से  बंद हड़ताल खेल रहे है ? क्या मकामी हुकूमत वाकई नौजवानों के पत्थर से घबराई हुई है और कर्फ्यू का कबच  ओढ़ रखी है।  क्या साबिक मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्लाह कश्मीर के हालात को लेकर वाकई गंभीर है ? कश्मीर में सवाल  ढूंढने जाएंगे तो जवाब कम सवाल ज्यादा मिलेंगे।  
कौन है ये नौजवान जिन्होंने इस्लाम को जाना नहीं लेकिन उन्हें इस्लाम पर खतरा नज़र आ रहा है , उनके साथ जो पत्थर नहीं उठा रहा वह काफ़िर है। क्या ५० से ज्यादा मासूमो की मौत से इन नौजवानों को जरा भी अफ़सोस है ? छोटे छोटे बच्चो के हाथ पत्थर पकड़ा कर वो किस्से बदला ले रहे है ?   हम क्या चाहते आज़ादी जैसे चंद जुमले उन्हें   इसलिए याद है क्योंकि उन्हें  पता है कि अब्बाजान की जबतक कमाई है तबतक भोजन  सुरखित है। इसमें कोई दो राय  नहीं कि यहाँ बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है लेकिन यह भी सच है  कि सबसे ज्यादा सरकारी नौकरी लोगों को यही मिली हुई है। हुर्रियत के हर छोटे बड़े लीडरान के बच्चे  या तो बड़े मुलाजिम है या बड़ा कारोबारी ,फिर इस बंद -हड़ताल और कर्फ्यू से कौन मुश्किल में इसकी पड़ताल जरुरी है 

,लेकिन हुकूमत सियासत में  उलझी हुई है। कश्मीर की हर छोटी बड़ी घटना इंटरनेशनल न्यूज़ है , सबसे ज्यादा मीडिया की सरगर्मी यहाँ है ,यही वजह है कि यहाँ  ४४ दिनों तक हड़ताली कैलेंडर चलता है तो कर्फ्यू भी. . राजनैतिक पहल के नाम पर मीडिया के जरिये लीडरान की बकैती सामने आ रहा, , हर सियासी दलो  की अपनी दलीले है ,एक  दूसरे को फैल कराने के तर्क दिए जा रहे है..लेकिन निदान किसी के पास नहीं   है।   ओमर अब्दुल्ला  हों या मीरवाइज उमर फ़ारूक़ आज हर कोई जनरल हूडा की बातचीत और सियासी पहल की वकालत कर रह है तो यह पूछा जाना लाजिमी है कि बातचीत किससे हो ?  क्या हुर्रियत पत्थरबाजो  को घर   बैठने की नसीहत देने का माद्दा रखता है ?  हा !  तो उन्हें लीडर मानने में क्या दिक्कत है।  याद रहे अटल बिहारी वाजपेयी ने भी उन्हें बातचीत के लिए खुला निमंत्रण दिया था। लेकिन आजतक अलगाववादी अपना रोडमैप सरकार के  सामने नहीं रख सकी।  अगर गृहमंत्री राजनाथ जी को वाकई कश्मीर और कश्मीरी से प्यार है तो उन्हें आम अवाम की मुश्किलो को समझना  चाहिए और बिना कैमरा कश्मीर में बैठना चाहिए। .बस पहल की जरुरत है। . 

शनिवार, 13 अगस्त 2016

कश्मीर क्या सचमुच मसला है ?

90 के दशक में "स्काई  इज द लीमिट " का फार्मूला देकर  पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने कश्मीर मसले के हल के लिए शानदार पहल की थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कदम आगे बढ़कर बातचीत को इंसानियत के दायरे में लाने की कोशिश की।  संवैधानिक दायरे से आगे बढ़ने का जोखिम लेकर अटल जी ने कश्मीर में  विश्वास का वातावरण बनाया तो  पचास साल बाद  फ्री एंड फेयर चुनाव के संकल्प को कश्मीर में जमीन पर उतारकर लोगों में लोकतंत्र के प्रति भरोसा पैदा किया। लेकिन आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने  अगर कश्मीर के   दायरे को आगे बढाकर ,जम्मू ,लदाख और पाकिस्तान मकबूजा कश्मीर के मसले को रेखांकित करने की कोशिश की है तो माना जायेगा की उन्होंने इतिहास से सबक ली है।

कश्मीर के कई जिलों में लगातार ३५ दिनों के बंद -हड़ताल और कर्फ्यू के बाद यह सवाल पूछा जाना लाजिमी है कि  कौन चाहता है कश्मीर मसले का हल ?  एक रोमांटिक आतंकवादी बुरहान वानी की मौत से कश्मीर सचमुच खफा है ? या फिर कश्मीरियत की रिवायत वाली वादी में आई एस के तथाकथित खिलाफत के तई नॉज़वानो में बढ़ी उत्सुकता ,इस विरोध को धारदार बना दिया है ?. ऐसी चिंता पीडीपी सांसद मुज़्ज़फ़र बेग कर  रहे हैं।  या  फिर पाकिसातनी हुकूमत और उनकी हुर्रियत  के  डूबती नाव को किनारा मिल गया है ?

. १९४८ से लेकर आजतक कश्मीर मसले को लेकर भारत -पाकिस्तान के बीच दर्जनों  मर्तबा बातचीत हो चुकी है लेकिन मामला जस का तस है . अक्सर इस बातचित में हमारे विवेकशील रहनुमाओ ने पाया कम है ,खोया ज्यादा है  तो क्या  इस दौर में सचमुच डिस्कोर्स बदलने की जरुरत है ? जैसा कि कश्मीर स्टडी ग्रुप के अरुण कुमार जी बताते है  ?
 आखिर वे कौन लोग है जो कश्मीर को  मसला मान रहे है ?  बात साफ़ है जिनका इस मसले से निजी या सियासी फ़ायदा है उन्होंने  हर दौर मे इस मसले को जिदा रखने की कोशिश की  है और वे काफी हद तक कामयाब भी हुए है.. जम्मू कश्मीर की बड़ी आवादी ने कभी इसे मसला नहीं माना। .अगर यह बाकई आम लोगों के लिए बड़ा मसला होता तो हर चुनाव में 75 -80 फीसद पोलिंग नहीं होती।   . कश्मीर के सबसे बड़े अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी से मैंने यही सवाल पूछा था ,उनका जवाब था क्या कश्मीर की हालत ७० के दशक मे ऐसी थी ?. गिलानी साहब खुद दो बार अस्सेम्ब्ली का चुनाव जीत कर एम् एल ए बने थे। .  आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के सरबरा शलाहुद्दीन ने खुद असेम्बली  चुनाव मे अपना सिक्का आजमाया था . ये अलग बात थी कि तत्कालीन कांग्रेस -एन सी हुकूमतों ने सैयद शलाहुद्दीन को चुनाव जीतने नहीं दिया  था और पाकिस्तान ने  उसे बन्दूक पकड़ा  दिया था। ..

 हमें याद रखना चाहिए कि ये वही कश्मीर के लोग थे जिन्होंने १९४८ मे पाकिस्तान की  फौज को खदेड़ने मे भारतीय फौज के साथ कंधे से कन्धा मिलकर जंग जीती थी . हजारों लोगों ने पाकिस्तान के इस आक्रमण मे अपनी कुर्बानिया  दी थी . लेकिन ऐसा क्या हुआ कि बाद के दौर मे कुछ गुमराह नौजवानों ने  जीवे जीवे पाकिस्तान का नारा लगाने लगा  ? पाकिस्तान में फ़ौज ने सत्ता पर काविज होने के लिए कश्मीर को चावी के तौर पर इस्तेमाल किया तो . पाकिस्तान की पैरवी करने वाले कश्मीरी अलगाववादी लीडरों पर दो दशको  में मानो धन वर्षा हुई . कल तक गाँव मे रहने वाले इन लीडरों ने श्रीनगर मे आलिशान महल बनाया .इनके बच्चो ने उची तालीम ली . कई के बच्चे सरकारी मह्कामे मे ऊँचे दर्जे के पद पर  कायम  है .खुद शलाहुद्दीन के तीन बच्चे स्थानीय सरकारी सेवा में है।
पिछले वर्षों मे कश्मीर मे विकास के नाम पर, पुनर्वास के नाम पर  भारत सरकार की ओर से अरबो रूपये के पकेज मिले है .लेकिन इन पैसों की हकीकत कश्मीर जा कर ही पता चलता है. यानी लूट में छूट को कश्मीर मसले से .जोड़ दिया गया है।  .. मैंने  सैयद अली शाह  गिलानी से एक बार पूछा था कि आप भारत सरकार से बातचीत के लिए तैयार क्यों नहीं हुए।  . उनका जवाब था जिन्होंने ने भारत सरकार से बात की है उन्होंने क्या हासिल किया है . .. यानी राजनैतिक प्रक्रिया यहाँ हासिल करने जुडी है , यही वजह है कि कश्मीर में अलगाववादियों के २४ धरो का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है न ही पथरबाजो का । . सबके अपने निजी स्वार्थ है।  कश्मीर मे एक  बड़े ओहदे से सेवा निवृत अधिकारी से मैंने पूछा , आखिर इस मसले का क्या हल है ?,उनका जवाब था कश्मीर मसले का हल कोई नहीं चाहता है , कश्मीर मसले का हल सिर्फ वो माँ चाहती है जिनके  बच्चे .सियासी साजिश के शिकार  हुए  हैं। ..

रविवार, 17 जुलाई 2016

"इतनी नाराजगी क्यों है "

30 साल पहले सिस्टम से नाखुश युसूफ शाह सरहदपार चला गया और आतंकवादी सईद सलाहुद्दीन बन गया अब पाकिस्तान में जेहादी कौंसिल के चेयरमैन हैं. । ३० साल बाद उसी कश्मीर का एक नाखुश नौजवान बुरहान वानी ,हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का कमांडर बनकर सिस्टम बदलने के बजाय मुल्क की अस्मिता पर चोट करने लगा और मारा गया। उसी सिस्टम से नाराज कश्मीर के कुछ नौजवानों ने पत्थर उठा लिया  है और सुरक्षाबलों से दो दो हाथ करने को तैयार है। लेकिन उसी सिस्टम में शब्बीर अहमद पिछले एक हफ्ते से रात -दिन एम्बुलेंस चलाकर रगड़ा में  घायल नौजवानों को हस्पताल पहुंचा रहा है। पथरवाजो के नाराजगी से बचने के लिए वह हेलमेट पहनकर एम्बुलेंस चलाता है लेकिन एक सवाल जरूर पूछता है "इतनी नाराजगी क्यों है " ?


आज हर कोई कुछ ज्यादा ही नाखुश है ,कश्मीर में ओमर अब्दुल्लाह नाखुश है. (उन्ही की हुकूमत में ११० बच्चों की पथ्थरवाजी में मौत हुई थी ) महबूबा नाराज है कि अलगाववादी उन्हें काम करने नहीं दे रहे ,अलगाववादी नाराज है कि महबूबा ने उनकी अहमियत क्यों कम कर दी ? दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल नाराज है ,जनता उनसे सवाल पूछ रही है ऊँगली पी एम मोदी पर उठा रहे है।  राहुल बाबा नाराज है ,यहाँ भी कसूरबार मोदी ही हैं. नीतीश जी नाराज है लालू नाराज है ,मायावती ,मुलायम नाराज है और तो और शिवसेना और अकाली  सरकार की व्यवस्था से नाराज हैं. फिर नाराज़ शब्बीर अहमद जैसे लोग नहीं है जो अपने काम को जिम्मेदारी से करते है और उसी में जीते हैं. 

जिनके हाथ में सिस्टम ठीक करने की जिम्मेदारी है और ओ नाराज है तो माना जायेगा कि वे सिर्फ सियासत करना जानते है और कुछ नहीं।  लेकिन सिस्टम बदलने और चलाने की जिद में एक स्वतः अहंकार कभी कभी लोगो की नाराजगी बढ़ा देती है जो आज कश्मीर में हो रहा है। बुरहान वानी हिज़्बुल का पोस्टर बॉय था ,जिसके हजारो फ्रैड्स फॉलोविंग  थे। यह बात कश्मीर की हुकूमत जानती थी।   ऐसी स्थिति में गुस्साए नौजवानों को पुलिस के भरोसे छोड़ना कितनी समझदारी थी।  हुर्रियत के लोग जनाजे में जाना चाहते थे तो हुकूमत की क्या परेशानी थी ,कानून व्यवस्था तोड़ने के लिए उनको जिम्मेदार ठहराया जा सकता था। आज गुस्साए भीड़ का कोई लीडर नहीं है।    इलाके के  एम एल ए ,एम पी और दूसरे प्रतिनिधि जो  टैक्सपेयर के पैसे से अपनी सियासत करते है वो  कहाँ है ? अगर स्थानीय लोगों का गुस्सा महबूबा सरकार से है तो १० साल से राजभवन में बैठे गवर्नर क्या कर रहे थे ? सत्तापक्ष और विपक्ष अगर कश्मीर में अपनी भूमिका खो चुके थे  ,तो देश का गृहमंत्रालय नज़र रखने के बजाय सीधे दखल क्यों नहीं दे रहा  है ?

अगर कश्मीर हमारा है तो वहां के लोगों की नाराजगी भी हमें समझनी होगी।सिर्फ संसद में चर्चा भर कर लेने से सरकार और विपक्ष अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते । देश की संसद और उसके सांसद अगर लोगों से संवाद करने जमीन पर उतरेंगे तो शायद लोगों में नाराजगी  कम  होगी , टुटा हुआ संवाद फिर जुड़ेगा। . बरना अपनी डफरी ,अपना राग यहाँ सब बजा रहा है ,यहाँ हर कोई हर से नाराज है। 

शनिवार, 9 जुलाई 2016

और बुरहान तुम चले गये .....

बुरहान तुम्हारे जाने का बहुत अफसोस है ! ठीक वैसे ही अफसोस मुझे तब हुआ था जब लोग तुम्हे कश्मीर में हिज़्ब के पोस्टर बॉय कहने लगे थे। अबतक लोग यह मानते थे कि गरीब और अनपढ़ लोग ज्यादा वल्नरेबल होते है जिन्हे कुछ चालक लोग आसानी से बरगला सकते है, लेकिन तुम तो एक पढ़े -लिखें  खानदान में पैदा लिया अच्छी तालीम पाई , स्थानीय कॉलेज के प्रिंसिपल तुम्हारे अब्बाजान मुजफ्फर अहमद वानी ने कभी सोचा भी न होगा कि अपने क्लास का टॉपर बुरहान कभी हिज़्ब का बंदूक उठा लेगा।  अफसोस इस बात को लेकर भी है कि तुम्हारे तंजीम हिज़्बुल मुजाहिदीन के सरबरा सैयद सलाहुद्दीन ने अपने किसी बच्चे को मिलिटेंट नहीं बनाया ,उन्हें बंदूक से दूर रखा और तुम ने अपने जैसे दर्जनों नौजवानों को बंदूक उठाने  के लिए प्रेरित किया।  माना कि  तुम्हे  सोशल मीडिया/ इंटरनेट  का शौक था ,कश्मीर में इससे पहले किसी मिलिटेंट ने अपने  ग्रूप का सेल्फी फेसबुक  पर नहीं डाला था। कश्मीर में कुछ लोग तुम्हे हीरो मान  बैठे थे,और यह तुम्हारी गलतफहमी थी कि तुम सेना के साथ जंग लड़ रहे थे।बांग्लादेश कैफे हमले में मारे  गए 20 साल का आतंकवादी  रोहन इम्तियाज़  को भी तुम्हारी तरह इंटरनेट और फसबूक चैटिंग का शौक था। आज उसके वालिद  को अफसोस है कि इंटरनेट ने  काबिल बच्चे को खतरनाक आतंकवादी बना दिया। तुम्हे खोकर क्या ऐसा ही अफसोस हमे नहीं करना चाहिए?   
आखिर यह जानने की  तुमने कभी कोशिश नहीं की कश्मीर में तुम्हारी दुश्मनी किससे है , क्या यहाँ सीरिया ,इराक़ ,फिलिस्तीन जैसी स्थिति है ? क्या यहाँ लोगो को  किसी बात के लिए प्रतिबंध है ? तुम्हारे ही ही बालदेन और   समाज की यहां चुनी हुई सरकार है फिर किस आज़ादी के लिए तुम जंग लड़ रहे थे ? आज बुरहान की  मौत के बाद कश्मीर में अलगाववाद की सियासत में एका दिखाई जा रही  है।  लेकिन इस दौर में यह बताने की भी जरूरत थी कि  बंदूक की सियासत ही अलगाववाद की लाइफलाइन रही है। . किस बंदूक  से कौन मरा यहां रहस्य की बात हो  जाती  है।  बुरहान तुम इस  रहस्य  को नहीं समझ पाए  और तुमने  हुर्रियत लीडरों के मास्टर होने  दम्भ  पाल लिया था । जबकि वे लोग तुम्हे मोहरा बनाकर अपनी सियासी रोटी सकते रहे। 
पिछले दिनों  हुर्रियत कान्फेरेंस के साबिक चेयरमेन अब्दुल गनी बट का  एक  खुलासा सबको चौका दिया  था।  ,उन्होंने कहा था " मारे गए हमारे हुर्रियत के लीडर वाकई मे शहीद है या फिर हमारी अंतर्विरोध के साजिश के शिकार " .हुर्रियत कान्फेरेंस के चेयरमेन ओमर फारूक और बिलाल गनी लोन की मौजदगी मे प्रो बट ने यह सवाल उठाया था कि इनके पिता की हत्या किसने की थी ?उन्होंने जोर देकर कहा कि झूठ बोलने की आदत छोड़कर हम यह सच बताये कि मौलवी फारूक ,प्रो गनी लोन और प्रो अहद जैसे लीडरो की हत्या हम मे से ही किसीने  की थी।  इनकी हत्या किसी सुरक्षा वालों ने नही की थी।  हुर्रियत लीडरो की हत्या की एक लम्बी फेहरिस्त है मौलवी मुश्ताक ,पीर हिसमुदीन ,शेख अजीज़ रफीक शाह ,माजिद डार इनकी हत्या के बारे मे यही बताया गया कि अज्ञात बन्दुक धारियों ने इनकी हत्या  दी ।  . इस दौर मे मौलवी मिरवैज  ओमर  फारूक पर भी  आतंकवादियों का कई बार हमला हुआ है , वो कौन थे ? किस तंजीम थे , आज भी रहस्य बना हुआ है।  लेकिन सियासत ऐसी कि हुर्रियत लीडर आज प्रचण्ड एकता दिखा  रहे रहे है। 
.बन्दूक ने कश्मीर मे न केवल सियासी लीडरों की भीड़ खड़ी की बल्कि अकूत पैसे की बरसात  भी की।   गाँव के झोपड़ियों में रहने वाले कई लीडरों के श्रीनगर और   दिल्ली मे आलिशान बंगले देखे जा सकते है। तथाकथित आज़ादी के नाम पर  पैसे की यह बरसात  कश्मीर मे आज भी जारी है।   बन्दूक की बदोलत जिसने राजशाही सुख  सुविधा बटोरी है क्या वे कश्मीर मे बन्दूक की अहमियत को ख़तम होने देंगे ?.बुरहान  हुर्रियत के इस रहस्य को समझ नहीं पाया। बुरहान वानी को शहीद के तौर पर पेश करके अलगववादी और आतंकवादी तंजीम आज कश्मीर में जज्वात को भड़काने की जी तोड़ कोशिश  कर रहे है,। 1990 के  बाद पहलीबार कुछ मस्जिदों से आजादी के नारे लगाए गए ,जज्वात भड़काने की यह पहली कड़ी सामने आई है लेकिन सबसे बड़ा इम्तिहान मकामी इंतजामिया के लिए है जिन्हे  हर हाल  लोगों से संवाद बनाए रखना जरूरी है।  अत्याधुनिक गैजेट से लैश कश्मीर में हमारे नौजवान बार बार क्यों गुमराह हो रहे है यह भी हम सबका आत्मचिंतन का विषय हो सकता है  । 

शनिवार, 25 जून 2016

उत्तर प्रदेश और "माया" की सियासत


" माया" जिसे भारतीय परम्परा में कभी भ्रम तो कभी देवी दुर्गा तो कभी भगवान बुध की माता के रूप में सम्बोधित किया जाता है लेकिन सियासत में माया सिर्फ धन और भ्रम के रूप में प्रचलित है। माया जिसका  सरोकार वोट से है ,सत्ता से है ,व्यवथा से है और तथाकथित सामाजिक न्याय से भी है। यह कोई इज्म या वाद से बंधी  नहीं होती बल्कि मौके और दस्तूर से इसकी व्याख्या की जा सकती है। तो क्या उत्तर प्रदेश की मौजूदा सियासत सिर्फ माया के इर्द गिर्द घूमती है ? 

मंडल- कमंडल के सियासी बवंडर का जोर कमोवेश बिहार और उत्तर प्रदेश में कायम है ,सत्ता पाने का इससे आसान तरीका इतिहास में इससे पहले कभी ईजाद नहीं किया गया था। कांग्रेस पार्टी के दिग्गज राजनेता अभी भी  इन प्रदेशों में अपनी जड़ खोजने की भरपूर कोशिश कर रहे है लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि  ऐतिहासिक भूल ने इनके जड़ो पर मट्ठा डाल दिया है। बहरहाल  माया की चर्चा करते है . ..बी एस पी के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्या पार्टी को बाय - बाय करने के साथ ही मायावती पर जोरदार आरोप लगाते है " ये दलित की नहीं दौलत की बेटी है ,बी एस पी में टिकट की बोली लगती " यह पहलीबार नहीं था जब ये विशेषण मायावती के लिए गढ़े जा रहे थे , बी एस  पी  की "माया "से निकले हर नेता ने  इसी अंदाज से खुली हवा में सांस लेने की बात की है... लेकिन मायावती हो या मुलायम उनके आय से अधिक सम्पति का मामला सी बी आई /आई टी नहीं सुलझा पाई फिर ये बेचारे युगल किशोर ,स्वामी जैसे लोगों  का आरोप  नक्कार खाने में तूती की आवाज़ ही बन कर रह गई है। . लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या दूसरे दलों में टिकट मेरिट के आधार पर दी जाती है ?

 ये उत्तर प्रदेश की सियासी माया है जहां पांच साल की सियासत में कंगले भी अरबपति  बन गए है। लेकिन माया की चर्चा सिर्फ मायावती के लिए होती है क्योंकि वह सफाई महोत्सव के जरिए अपने बैवभ का भोंडा प्रदर्शन नहीं करती ,वो अपने किसी रामबृक्ष को सरकारी जमीन पर कब्जा के लिए नहीं उकसाती। वैभव का सरोकार सिर्फ मायावती से है यही इस पार्टी का वसूल है। 
"उम्मीदों  का प्रदेश उत्तर प्रदेश" को लेकर वाकई अखिलेश यादव उत्साहित हैं। विकास को लेकर वे अपनी अलग छवि बनाने के लिए संजीदा भी है, लेकिन यू पी के  साढ़े तीन मुख्यमंत्री  के आरोप से वे अबतक उबर नहीं पाए। यानी यह यू पी का ही समाजवाद है जिसमे एक परिवार के 43 लोग सीधे सरकार और सियासत से जुड़े है।सुश्री  मायावती कहती है एक परिवार के बच्चे के बच्चे और उनके बच्चों ने सत्ता हथिया ली है " ये सामाजिक न्याय की देन है ठीक उसी तरह जैसे मायावती पार्क और अपनी मूर्ति लगवाकर उसे प्रेरणा स्थल का नाम देती है।  लेकिन सवाल यह है कि दोनों के राज में करोड़ो अरबो का घोटाला सामने आता है लेकिन आजतक न तो मायावती ने मुलायम  सिंह के खिलाफ कोई केस दर्ज की नहीं मुलायम और अखिलेश ने कभी मायावती के भ्रष्टाचार के खिलाफ कभी मुंह खोला। 

राज्य सरकार के खिलाफ लोगो में गुस्सा  है कमोवेश यह गुस्सा केंद्र सरकार के खिलाफ भी है । सियासी पंडित इसे एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर बताते है लेकिन ये गुस्सा कानून व्यवस्था को लेकर है ,,अखिलेश के खिलाफ   गुस्सा नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार को लेकर है। जातीय और साम्प्रदायिक गुंडागर्दी को मिली छूट को लेकर है ,तो क्या यह बी जे पी के लिए मौका है ? शायद पार्टी ने ये गलतफहमी पाल ली है ,अमित शाह और शीर्ष नेतृतव का  चुनावी लहजा वही है जो कमोवेश बिहार में था।  पार्टी अध्यक्ष अमित शाह उत्तर प्रदेश में उसी तरह उत्साहित है जो कमोवेश जंगल राज पार्ट 2  को लेकर बिहार में थे।  बिहार की  तरह यू पी में  भी बी जे पी जातीय  समीकरण बिठानी लगी है।  ये  उत्तर प्रदेश की माया है जिसमे लोग जाति के नाम  पर सम्प्रदाय के नाम पर एक दूसरे से लड़ने में कोई कोताही नहीं छोड़ते। यही  वजह है क़ि ,1917  के असेम्ब्ली चुनाव में हर पार्टी का जोर सामाजिक न्याय पर ही है ,राजनेता ये मान  बैठे है  कि , विकास से यहां  लोगों का  कोई लेना देना नहीं है।  सच ये भी है कि  गरीबी के नाम पर यहां कभी भी साझा लड़ाई नहीं लड़ी गई न ही भ्रष्टाचार कभी यहाँ मुद्दा बना  .. जाहिर है इस बार भी उत्तर प्रदेश में माया की सियासत की ही ज़िंदाबाद होगी। " माया "किसकी होगी यह कहना अभी मुश्किल है।