शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

भारतीय राजनीति में परिवार और उनके ब्रांड अब फीके पड़ने लगे हैं ?

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित कहती हैं राहुल गाँधी अभी पॉलिटिक्स में नौशिखुआ हैं ,उन्हें कुछ और समय दीजिये। लेकिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी अपने बेटे तेजस्वी को अब मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती हैं। वह दौर था जब लालू जी ने अपने घरेलु पत्नी को चाहा तो मुख्यमंत्री बना दिया ,राहुल गाँधी से कम उम्र में  उनके पिता राजीव गाँधी को  कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे योग्य माना। लेकिन आज क्या हो गया कि ओडिशा में ब्रांड बीजू धरासायी हो रहे है ,ब्रांड ठाकरे की हवा निकल रही है ,शरद पवार सही ठिकाना  तय नहीं कर पा रहे हैं। ब्रांड मुलायम को ब्रैंड अखिलेश ने  चुनौती देने की कोशिश की तो उसे मजबूरी में सहारे की जरूरत पड़  रही है।  मायावती हर चुनावी रैली में दुबारा पत्थर न लगाने की कसमे ले रही है। तो क्या भारतीय राजनीति में परिवार और उनके ब्रांड अब फीके पड़ने लगे हैं ?



 2014 ने भारतीय राजनीति को जो आईना दिखया था उसे सियासतदां आज भी झूठलाने की कोशिश कर रहे हैं। बिहार के चुनाव को आदर्श मानकर राजनितिक पंडित आज भी चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग को अहम् मानते हैं। ध्रुविकरण के गणित को चुनावी विज्ञानं बता रहे हैं ,शायद यह जानते हुए भी कि मतदाता इससे आगे निकल चूका है। आज जीत या हार प्रगतिशील  मतदाता तय कर रहे हैं और उनका मजहब /जाति से कोई लेना देना नहीं है। वो दौर था जब अदम गोंडवी को लिखना पड़ा था काजू भुने हैं प्लेट में, व्हिस्की गिलास में,उतरा है रामराज विधायक निवास में
 पक्के समाजवादी हैं, तस्कर हों या डकैत,इतना असर है खादी के उजले लिबास में...

 अब इस दौर में विनय बिहारी तिवारी जैसे जनप्रतिनिधि सामने हैं जो अपने इलाके में रोड न बन पाने के कारण घुटनो के बल चल कर विधान सभा पहुँच रहे हैं। समाजवादी पार्टी में सबसे ज्यादा दौलत कमाने वाले गायत्री प्रजापति के मंच शेयर करने से आज अखिलेश और मुलायम परहेज कर रहे हैं।  धनवल और परिवार के नाम पर चुनाव जीतने की परंपरा अब ख़तम हो रही ,सिर्फ विकास मुद्दा बने या न बने लेकिन पढ़े लिखे नौजवान अपने  प्रतिनिधि में अपना चेहरा जरूर देखना चाहता है। 

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

चुनावी संग्राम में कुछ दिन गुजारिये तो उत्तर प्रदेश में

लोकतंत्र के महापर्व को देखना है तो कुछ दिन गुजारिये उत्तर प्रदेश में। यकीन मानिये भारत की इस शानदार छवि को टी वी स्टूडियो से नहीं देखा जा सकता क्योंकि इस दौर में यहाँ या तो एजेंडा चलता है या फिर शोर। आज हर कोई पूछ रहा है किस दल की बढ़त है,किसकी बन रही है सरकार। सिर्फ सवाल हैं ,उत्तर किसी के पास नहीं है।  क्योंकि ये उत्तर प्रदेश है यानी मिनी इंडिया। अहम् बात यह है कि करप्शन और बैमानी के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश की पुलिस और प्रशासन इलेक्शन कमिशन के निज़ाम के अंदर आते ही अदभुत क्षमता  दिखा रहे है यानी निज़ाम सही हो तो तंत्र को संभलने में वक्त नहीं लगता । तीसरे चरण के चुनाव आते आते यहाँ हर दल दावा जीत का कर रहा है और पूरी ताकत लगा रखा है तो यकीन मानिये जंग के केंद्र में  सिर्फ नरेंद्र मोदी  है और जंग 2017 से भी आगे की है। 

पिछले कुछ वर्षो से चुनावी भाषणों का एजेंडा मोदी तय कर रहे है ,टीवी के विद्वान कहते है पी एम् मर्यादा लांघ रहे है ,लेकिन यह समझने की जरूरत है कि मोदी के भाषणों पर सपा ,बसपा और कांग्रेस से इतनी तीखी प्रतिक्रिया क्यों आ रही है । अगर चुनावी सभाओं में दो दिनों तक अपना बच्चा और गोद लिया हुआ बच्चा पर बहस होती रही है  तो यकीन मानिये हर दल के भाषण का एजेंडा मोदी गढ़ रहे हैं। बच्चा जहाँ का भी हो लेकिन वाराणसी के सांसद बनकर मोदी आज उत्तर प्रदेश में किसी से भी ज्यादा लोकल हैं ,यकीन नहीं होता तो उनकी रैली से घूम कर आइये ।  में दो महीने चलने वाला चुनाव को सड़क ,पानी ,बिजली जैसे मुद्दे से  नहीं  लड़ा जा सकता ,आज हर दिन मीडिया को लीड खबर चुनावी भाषणों से मिलता है यानी खबर मीडिया नहीं लोकल कार्यकर्ता बना रहे है ,पी एम् मोदी सिर्फ उसमे अपनी बाक पटुता डाल रहे है। 

हर दल के जनसभाओ में पब्लिक की भारी भीड़ जुटती है ,लेकिन यह भीड़ वोट में तब्दील हो रही है या नहीं यह कोई नहीं जानता। कोई नहीं जानता कि कांग्रेस के कार्यकर्ता समाजवादी पार्टी को वोट दे रहा है या नहीं ,समाजवादी पार्टी भी नहीं जानती कि उसका वर्कर कांग्रेस को जीता रहे हैं या नहीं। यह बात मायावती भी नहीं जानती कि जिस सोशल इंजीनिरिंग की वो दुहाई दे रही है  उसे उनका वोटर पसंद कर रहा है या नहीं। यह बात बीजेपी भी नहीं जानती कि पिछले 15 साल से एक बेहतर ऑप्शन ढूढ रहे मतदाताओं ने उन्हें ऑप्शन चुना है या नहीं। परिवर्तन  उत्तर प्रदेश की जनता जरूर करती है  लेकिन यह तय होना अभी बांकी है कि जनता के मूड को किसने बेहतर समझा है 

रविवार, 29 जनवरी 2017

अच्छे दिन ! आने वाले हैं .... कब, यह किसी ने नहीं पूछा

अच्छे दिन ! आने वाले हैं .... कब, यह किसी ने नहीं पूछा। भलेमानुष एक दिन बदलने में 24 घंटे लगते हैं ,हालात बदलने में कुछ तो वक्त चाहिए। मेरे जैसा एक साधारण  व्यक्ति अच्छे दिन के लिए जीवन भर संघर्ष करता है फिर राहुल गाँधी ,लालू यादव ,अखिलेश ,मायावती जैसे नेता किस अच्छे दिन का उपहास कर रहे हैं। क्या जिन प्रयासों से इन लीडरों ने अपने लिए अच्छे दिन बनाये है.  यह  क्या आम आदमी के लिए संभव है ? यानी ईमानदारी की कमाई और व्यवस्था से अच्छे दिन लाने में कुछ तो वक्त लगेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि अच्छे दिन का मतलब क्या है ? किसी के लिए अच्छे दिन का मतलब एक छोटे काम के लिए सरकारी दफ्तरों का चक्कर न लगाना पड़े ,किसी के लिए उसके बच्चो की शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त हो जाए ,किसी के लिए उन्हें रोजगार मिल जाये ,किसानों को खेत में पानी और खाद मिल जाए ,किसी बुजुर्ग को वक्त पर पेंशन मिल जाय ,स्कूल कालेज जाने वाली बेटिया निर्भीक घूम सके ,स्वास्थ्य  और सड़क यातायात आसान हो सके कचहरी /अदालत से जल्दी न्याय मिल जाय  ,हर तरफ कानून का राज हो .. अच्छे दिन की ये छोटी सूची है लेकिन यकीन मानिये इस सूची का सरोकार शायद ही मोदी सरकार से है। 
ये राज्य सरकार की व्यवस्था से होनी है लेकिन अच्छे दिन के लिए लालू जी /अखिलेश जी मोदी को पानी पीकर गरिया रहे हैं जबकि राज्यों में उनकी सरकार है। लेकिन इन ढाई वर्षों में पी एम मोदी ने अपना कीमती वक्त राज्यों के चुनाव में ही लगाए हैं ,हर चुनाव उनकी सरकार के लिए जनमत बन जाता है,..  जनता से लगातार और सीधा  संवाद पी एम मोदी को कुशल प्रशासक और जननेता के तौर पर मजबूती देता है लेकिन जिस व्यवस्था परिवर्तन की बात मोदी ने की थी उसका एहसास आमलोग अबतक महसूस नहीं कर रहे है ,नोटबंदी को सफल बनाने में आम जनता ने जितना बड़ा त्याग/संघर्ष  किया है शायद उनके अफसर /मंत्री ने न किया हो। यह बजट उनके अच्छे दिन का सबसे बड़ा इम्तिहान है ,अब तक लोगों ने उन्हें दिया है अब चुकता सरकार को करना है। यह मनरेगा जैसे पॉपुलर घोषणा से नहीं होगा ,यह नोटबंदी जैसे ठोस फैसले से होगा।  नोटबंदी ने पहलीबार लोगों के नैतिक चरित्र को सार्वजानिक किया है। .. सोच बदलेगा तो देश  बदलेगा ,यह सोच पहले सरकार और सिस्टम को बदलनी चाहिए .....लोगों ने अपनी सोच का एहसास करा दिया है वह 60 साल से  हर जरूरत की चीजो के लिए लाइन में ही खड़ा है ,कुछ दिन और खड़ा हो लेगा। . 

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

सियासी फलसफा अब मोदी को केंद्र में रखकर ही गढ़ा जा सकता है

यू पी तो झांकी है असली जंग तो अभी बाकी है। देश की सियासत में अचानक पाँच राज्यों का चुनाव इतना क्यों महत्वपूर्ण हो गया यह देश में बन रहे  नए समीकरण  रेखांकित करता है ।2017 को 2019 के प्रोमो में फ़ीट करने के लिए बाप बेटे में तलवार खिंची हुई है ,तो कही महागठबंधन दरक रहा है। तीसरा मोर्चा हो या सेक्युलर फ्रंट सियासी फलसफा मोदी को केंद्र में रखकर गढ़ा जा रहा है। यानी कही एक पार्टी में दो अध्यक्ष हैं ,तो कही असली और नकली के बीच जंग जारी है। सियासी पंडित फेंट रहे हैं ,यू पी में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन किसी  एक पार्टी के लिए आत्मघाती होगा ,तो कही इसे ऐतिहासिक बताकर राहुल गांधी को मोदी के बराबर खड़े करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इसी कोशिश में केजरीवाल से लेकर नीतीश कुमार तक राष्ट्रीय नेतृत्व की अपनी कुशल छवि बनाने के लिए अपने मोहरे भी बदल रहे हैं।
 
पुरे साढ़े 4  साल तक साढ़े चार चीफ  मिनिस्टर का तोहमत अखिलेश ढोते रहे लेकिन अचानक उन्होंने कौन सी सियासी टॉनिक पी कि  वे न केवल पार्टी के सर्वे सर्वा बन गए बल्कि जिम्मेदार मुख्यमंत्री बन गए। यानी अखिलेश के पांच साल के प्रशासनिक क्षमता का विश्लेषण अब बीते दिनों की बात है ,चर्चा इसकी करो सियासी अखाड़े में मुलायम कैसे पस्त हुए ,शिवपाल को अखिलेश ने कैसे धुल चटाई। दस साल पहले अमिताभ बच्चन ने  मुलायम सिंह सरकार के प्रचार की कमान संभाली "यू पी में दम है क्योंकि जुर्म यहाँ कम है " और मुलायम की लुटिया डूब गयी थी ,आज अखिलेश अपने नकारेपन और एंटी इनकंबेंसी  को कभी अपने ताऊ के मत्थे  डालता है तो कभी इसका रुख केंद्र की ओर मोड़ता है। यानी इम्तिहान में अखिलेश  नहीं मोदी को पास या फेल होना है। बुआ मायावती ने अपने पांच साल के कार्यकाल को अपने चुनाव चिन्ह हाथी को स्थापित करने में लगाया तो बबुआ अखिलेश ने   सड़क के किनारे साइकिल ट्रैक बनाकर अपने चुनाव चिन्ह  स्थापित कर लिया ,लेकिन शायद ये भूल गए कि इस सिंबल को अमर करने में इन लीडरो ने लोगों के हजारों करोड़ रूपये पानी के तरह बहा दिए ।  यानी हर सियासी मोहरे को रंग रोगन से फ़ीट करके 2019 के लिए खड़ा किया जा रहा है।मोदी के समर्थन और विरोध में  देश की सियासत ने एक नई तस्वीर गढ़ी है ।लेकिन  दो ध्रुबों में बटी सियासत में फायदा किसे मिलता है यह स्क्रिप्ट उत्तर प्रदेश को ही लिखना है। 


शनिवार, 31 दिसंबर 2016

डिमोनेटाइजेशन : सबका साथ सबका विकास

2016  आपके जीवन में क्यों महत्वपूर्ण रहा ,इसके कई व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन यह देश के लिए क्यों महत्वपूर्ण बना ,इसकी वजह भी व्यक्तिगत ही है। पिछले 30 वर्षो में सत्ता परिवर्तन आने जाने का ऐसा सिलसिला बना कि किस किस को याद कीजिये ,किस किस को रोइये। .आराम बड़ी चीज है मुँह ढक के सोइये। लेकिन 2016  ने ऐसा मौका नहीं दिया। नोटबंदी का ऐलान , 50 दिनों का संघर्ष और पीएम मोदी की कामयाबी इसे ऐतिहासिक बना दिया। क्या यह कामयाबी पी एम् मोदी की थी जिसने चीफ जस्टिस जे एस ठाकुर के दंगे की आशंका को निराधार साबित किया  या फिर उन सबा सौ करोड़ जनता की जिसने पी एम् मोदी के डेमोनेटाइजेशन पर  यकीन किया . . 

नोटबंदी के  दौर  में एक सियासी फैमिली ड्रामा उत्तर प्रदेश में भी चल रहा था ,राजनीतिक पंडितो ने मोदी के नोटबंदी के फैसले को आगामी विधान सभा चुनाव से भी जोड़ा। लेकिन आख़िरकार लोगों को लगा कि सपा के  ड्रामा में सबकुछ था लेकिन क्लाइमेक्स कभी नहीं आया ,लेकिन नोटबंदी इस दौर में ऐसा फैमिली सीरियल बना जिसमे हर उम्र ,वर्ग ,सम्प्रदाय टीवी न्यूज़ के स्क्रिप्ट बने और खबरिया चैनल अपने व्यक्तिगत वजह को सामाजिक उथल पुथल के चासनी में डूबा दिया। लेकिन इन तमाम आलोचनाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी का आम लोगों से संवाद निरंतर बना रहा। यह पीएम की जिद थी या उनका  साहस था ,जिसमे उन्होंने  17 लाख करोड़ रुपया बदलने का  इतना बड़ा फैसला लिया। यह उनका राजनीतिक  कौशल और मास कम्युनिकेशन था जिसने लोगों के भरोसे को टूटने नहीं दिया। अगर वे कहते थे कि" ये भ्रष्टाचारी उन्हें जीने नहीं देंगे ,ये इस देश के आमलोगों की ताकत है जिसके कारण मैं नोटबंदी का फैसला ले पाया हूँ "। यकीन मानिये ये प्रधानमंत्री की दिमाग से उपजी बात नहीं थी बल्कि यह उनके दिल से निकली आवाज सबका साथ सबका विकास को लोगों से संस्तुति मिली थी। 

2016  पिछले कई दशको से रूटीन बन गयी व्यवस्था को लगभग झकझोर दिया था। न तेज चलेंगे और न गिरेंगे के दर्शन वाले लोगों को भी गतिशील होने के लिए प्रेरित किया। नोटबंदी से खोदा पहाड़ और निकली चुहिया बात साबित हुई या फिर जैसे प्रधानमंत्री मानते है इस नोटबंदी ने चुहिए को एक्सपोज़ कर दिया जिसने अर्थ से लेकर मूल्यों तक को कुतर दिया था। 70 के दशक के बाद देश में पहलीबार एक राष्ट्रीय चरित्र और एक राष्ट्रीय नेतृत्व मुखरित हुआ है ।यानी सबका साथ सबका विकास ही डेमोनेटाइजेशन का मूल मंत्र साबित हुआ है। 

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

,राहुल गाँधी को अभी इंदिरा को समझना बेहतर होगा।

" मेरा देश बदल रहा है " .या यूं कहे  पिछले 30 वर्षों में पहलीबार कोई स्लोगन आगे बढ़ रहा है। 70 के दशक में इंदिरा गाँधी का गरीबी हटाओ का समाजवादी नारा जन जन तक प्रचारित हुआ इसके पीछे इंदिरा  के बातों पर लोगों को भरोसा था, उनके इरादे पर लोगों को यकीन था। 1969 में उन्होंने अपने विरोधियों (सिंडिकेट) के खिलाफ मास्टर स्ट्रोक चलते हुए बैंक नॅशनॅलिजेशन की घोषणा की तो जिनका बैंको से कभी दूर दूर तक सरोकार नहीं था, वे दिल्ली के चांदनी चौक पर हज़ारों की संख्या में जमा हो गए ,मानो 14 बड़े  बैंकों में रखे अरबो रूपये  उनके हिस्से में ट्रांसफर होने वाला है । ये अलग बात थी कि अगले 50 वर्षो में इस भीड़ का बैंक से कोई सरोकार नहीं जुड़ा। आम आदमी को जन धन एकाउंट ने पहलीबार बैंक से  मुखातिब किया। तो क्या  मोदी इंदिरा जी के नक्से कदम पर आगे बढ़ रहे हैं या इंदिरा के बाद मोदी पहला प्रधानमंत्री हैं जिनके नियत  पर देश को कोई शंका नहीं है। बैंक नॅशनॅलिजेशन के बाद नोटबंदी पहली ऐसी घटना या सियासी फैसला है जिसमे  आम आदमी एक भरोसे के साथ  जुड़ा है। 


  विपक्ष में बैठे सियासी दल देश के मिजाज को समझने में  नाकाम  रहे हैं।  खासकर राहुल गाँधी और उनके इमेज को चमकाने में  लगे लोग  वही गलती कर रहे है जो कभी मोदी  ने बिहार के चुनाव प्रचार में की थी। जहाँ 16 घंटे बिजली रहती थी वहां पी एम मोदी बिजली आयी ? लोगों से सवाल पूछते थे। यानी प्रधानमंत्री को लोकल फीड करने वाले पूरी तरह से गलत थे। ठीक उसी तरह राहुल की टीम को भी ग्राउंड जीरो से कोई कनेक्शन नहीं है। राहुल हर दिन बचकाना कर रहे हैं और मोदी के प्रति लोगों के भरोसे को पुख्ता  रहे हैं। माना ! यू पी  चुनाव राहुल के लिए लिटमस टेस्ट है। राष्ट्रीय नेतृत्व  उनके कंधे पर डालने के लिए ,कुछ उत्साही दरबारी  उनमे हवा भर रहे हैं लेकिन वे भूल रहे हैं कि मोम की  गुड़िया कही कही जाने वाली इंदिरा को दरबारी नेताओं ने  राष्ट्रीय नेता नहीं बनाया बल्कि आम जन  से सीधा संवाद जोड़कर इंदिरा ने  देश की सियासत में  अपने विपक्षियों को बौना बना दिया था। मोदी ने अपना सीधा संवाद देश के जनमानस से जोड़ लिया है।  अभी पी एम मोदी को कुछ वक्त  देना पड़ेगा ,राहुल गाँधी को मोदी   के खिलाफ अनर्गल प्रचार  के वजाय अभी अपनी दादी इंदिरा को  समझना  ही  बेहतर होगा। 

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

नोटबंदी : सबका कारण व्यक्तिगत है ?

नोटबंदी का आर्थिक लाभ / हानि  १० दिनों के बाद दिखने को मिल सकते हैं। लेकिन इसका सियासी फायदा किसको मिला है और मिलेगा यह कहना अभी मुश्किल हैं। लेकिन क्या प्रधानमंत्री मोदी ने यह फैसला सियासी लाभ के लिये लिया   था ? तो कहा जा सकता है बिलकुल नहीं। करप्शन के खिलाफ, कालाधन के खिलाफ अभियान अगर चुनावी मुद्दा हो सकता था तो पिछले 70 सालों में यह मुद्दा कई बार आजमाया गया होता। अगर इंदिरा जी ने चुनावी सियासत में नोटबंदी को  अव्यवहारिक माना था। तो माना जा सकता है कि वे इस देश के जनमानस के चरित्र को बेहतर समझती थी। अपनी काबिलयत और क्षमता को साबित करने के लिए इंदिरा जी 1971 में पाकिस्तान के साथ  जंग जरूर लड़ ली लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने कोई अभियान नहीं चलाया।  रही बात मोदी जी की  तो जिनका चिंतन और कार्य फकीरी से शुरू होकर निष्काम कर्म पर ख़त्म होता है उसे चुनाव की चिंता क्या बिगाड सकती है। 

पिछले  70 वर्षो में देश  में ऐसी कोई घटना नहीं थी जिसमे मुल्क के  जनमानस को  व्यक्तिगत रूप से प्रभावित किया हो।  नोटबंदी/नोटबदली ने समाज के हर तबके को प्रभावित किया है क्या ये बात मोदी जी नहीं जानते थे ?क्या वह नहीं जानते थे 17 लाख करोड़ करेंसी में 14 लाख करोड़ से ज्यादा  सर्कुलेशन में 500 और एक हजार के नोट हैं ? अगर यह  जानते हुए भी उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में सबसे बड़ी चुनौती ली है तो क्या वे राहुल गाँधी के भुकंप लाने वाले आरोप से डरेंगे ? नोटबंदी के सवाल पर विपक्षी दलों ने 25 दिनों तक संसद को ठप्प करके कौन सी सियासी बढ़त ले ली ?अगर नोटबंदी फेल हुई तो विपक्ष को मौका खुद जनता देगी।  यह बात मेरे जैसे अदना लोग भी जानते हैं लेकिन यह बात कांग्रेस और राहुल जी के पल्ले नहीं पड़ी। 

इस बात को नीतीश ,नवीन पटनायक सहित  कई मुख्यमंत्री  ने बेहतर समझा। दीवारों पर लिखी इबारत को उन्होंने बखूबी पढ़ा। यानी  सियासत 30 दिसंबर के बाद भी हो सकती है,जैसा  नितीश नीतीश जी ने कहा । यानी लालू ,ममता ,मुलायम से लेकर राहुल ,केजरीवाल ,मायावती सबने मीडिया की ख़बरों के आधार पर सहानुभूति की सियासत शरू की और न ही नोटबंदी का ठीक से विरोध कर पाए न ही समर्थन। पहला सवाल तो यह कि भ्रष्टाचार के खिलाफ या समर्थन में खड़े होने का नैतिक आधार हमारे कितने सियासतदानो में  है ? दूसरा यह कि इस देश की बड़ी आवादी बगैर किसी सरकार और किसी पार्टी के फलसफे के अपनी जिंदगी की गाडी खिंचती  उसे मौजूदा संघर्ष में सियासी लीडरों की  सहानुभूति क्यों चाहिये ? इस सदी के सबसे बड़े प्रयोग को वह देखने के लिए तैयार है। लेकिन मीडिया में गॉशिप से अपनी राय बनाने और दर्शकों पर थोपते हुए कुछ वरिष्ठ पत्रकारों को देखकर यह जरूर कहा जा  सकता है कि  विरोध किसी  पालिसी  या फैसले को लेकर नहीं है, सबका कारण व्यक्तिगत है। 

शनिवार, 3 दिसंबर 2016

केंद्रीय सेवा का इम्तिहान एक समान तो फिर शिक्षा क्यों न हो एक समांन



सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर जम्मू कश्मीर में स्कूल की बदहाली पर एक बार फिर भावुक हो   उठे , उनका मानना है कि सिर्फ शिक्षा से ही विकास संभव है जो जम्मू कश्मीर में हो नहीं रहा है । पिछले साल  इलाहाबाद उच्च न्यांयालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में सभी अधिकारियों और मंत्रियों के  बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने का आदेश यू पी के समाजवादी सरकार को दिया था। समाजवाद की बात करने वाली सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह कर अभी तक उस फैसले को टाल रही है। यह वही देश है जहां टॉप ब्यूरेक्रेट के बच्चों को पढ़ने के लिए 1 रूपये में कई एकड़ जमीन  राजधानी दिल्ली में  लीज पर दी जाती है।
यह वही देश है जहाँ बच्चो को स्कूल में पोशाक मिल जाते हैं लेकिन किताब नहीं। यह वही देश है जहाँ संसद में स्कूल के मीड डे मील घोटाले की  चर्चा होती है लेकिन जर्जर शैक्षणिक व्यवस्था पर कोई नहीं बात करता।  एक देश सैकड़ो सिलैबस ,कोई बरगद के नीचे पढ़ रहा है कोई सेंट्रलाइज़ड ऐ सी वाले स्कूल में। लेकिन कॉम्पेटीशन एक समान  ,केंद्रीय सेवा का इम्तिहान एक समान तो फिर शिक्षा क्यों न हो  एक समांन?

नोटबंदी पर चीफ जस्टिस साहब  का रबैया थोड़ा सख्त  है। नोटबंदी के बाद एक क्रांति माय लार्ड भी कर दे। काले धन में जो पैसा सरकार के खजाने में आता है उसे पुरे देश में स्कूल बनवाने का आदेश दे ।
कोर्ट में जज की जरुरत है ,इंफ्रास्टकचर की जरुरत है ,माय लॉर्ड इसके लिए पूरी कोशिश  रहे   हैं। लेकिन  देश में स्कूल भी चाहिए ,अच्छे शिक्षक चाहिए इसकी कोई चिंता नहीं कर रहा  है।  कर के देखिये मुल्क याद रखेगा 

गुरुवार, 24 नवंबर 2016

रूपये का एयर फ्लाइंग

दुनिया में तीन तरह के लोग होते  हैं एक वे जो जन्मजात  ईमानदार होते हैं ,एक वो जिनकी फितरत में बेईमानी  है एक तीसरा भी है जो परिस्थिति के अनुरूप संकल्प बदलता  हैं।  कालेधन के खिलाफ अभियान में सबसे ज्यादा बेचैनी  दूसरे नंबर के लोगों में ज्यादा है ये बात अलग है कि ईमानदार बनने की कोशिश में लगे आम आदमी को भी इस दौर में नोटबंदी ने मुश्किलें बढ़ा दी  है। 

 जनधन योजना और उसकी सफलता विफलता पर खूब चर्चा हुई। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हुई कि ज़ीरो बैलेंस के इन खातों की किश्मत कैसे बदलेगी।  लेकिन नोटबंदी के बाद पिछले एक हफ्ते में इन खातों में 21000 करोड़ रुपया जमा होना एक नयी हलचल की ओर इशारा करती है। जनधन के 25ooo एकाउंट्स की किश्मत कैसे पलटी यह आईटी के लोगों के लिए उत्सुकता का विषय हो सकता है लेकिन पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में इन अकाउंट्स में बढ़ी हलचल ने ब्लैक एंड व्हाइट पर छिड़ी बहस को तेज कर दिया है। चार्टर्ड प्लेन से मंगलावार को नागालैंड के दिमापुर एयरपोर्ट पर  पहुंचा करीब 4 करोड़  रुपया नोटबंदी के बाद अचानक रूपये का एयर फ्लाइंग एक नए साजिश का खुलासा किया है। 

यानी नोट की चोट से आहत कुछ लोगों ने नार्थ ईस्ट के पहाड़ी और आदिवासी लोगों को मिले टैक्स में  छूट को कारगर हथियार बनाने की कोशिश की है। . 
उत्तर पूर्व के राज्यो में नागालैंड ,मणिपुर ,त्रिपुरा ,अरुणाचल प्रदेश ,मिजोरम और असम  के अनुसूचित जनजातियों के इनकम के किसी भी सोर्स पर आयकर की छूट है। ऐसी छूट लद्दाख ,सिक्किम और मेघालय के कुछ जनजातियों को भी मिली हुई है। यानी व्यवस्था में मिली इनकी छूट को कुछ लोगों ने जुगाड़ के रूप में विकसित करने की कोशिश की है। 
 मुश्किल जॉग्राफी हालात में रहने वाले भोले भाले लोगों से संपर्क बढ़ा है तो हर कानून का तोड़ ढूंढने वाले लोगों ने कृषि क्षेत्र में होने वाली आमदनी से लेकर पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट ,कड़ी एंड विलेज इंडस्ट्री कुछ शिक्षण संस्थानों को मिली टैक्स की छूट को ढाल बनाने की कोशिशें हो रही है। हालाँकि सरकार ने यह पहले साफ़ कर दिया है कि ऐसे लोगों को कानून के दायरे में लाया जाएगा लेकिन अरबो -खरबो रूपये के ब्लैक मनी को बचाने की छटपटाहट साफ़ नज़र आती है 

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोटबंदी : देश में सियासत के तर्क और अर्थ दोनों बदल जाएंगे


कालेधन के खिलाफ अभियान  को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश  कुमार शेर की  सवारी मानते हैं ,वे मानते हैं कि मोदी सरकार के इस फैसले से जनसमूह की भावना जुडी हुई है।ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी लगभग ऐसा ही विचार रखते हैं  लेकिन नीतीश जी के सत्ता के साथी  लालू जी माया ,मुलायम , ममता  ,केजरीवाल और कांग्रेस के साथ खड़े  है। ममता जी के बंगाल में नोटबंदी के खिलाफ एक भी रैली सामने नहीं आयी है न ही लोगों का विरोध केरल,कर्नाटक,नार्थ ईस्ट के राज्यों और त्रिपुरा से सुना गया है. ममता दिल्ली में केजरीवाल के साथ रैली कर रही है तो कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक  दल संसद के अंदर प्रदर्शन कर रहे हैं।

विमुद्रीकरण के बाद असल बात तो यह है कि आज अपनी सियासत जिन्दा रखने  के पीछे लीडरों के पास  सही तर्क नहीं है ।यही वजह है कि संसद के अंदर और बहार विरोध करने वालों की अलग अलग जमात हैं।
देश के आम अवाम राष्ट्रहित में इसे एक बड़ा फैसला मानकर  एटीएम /बैंक के लाइन में खड़े है, हालाँकि अब जमीनी हालात में काफी तबदीली आयी है  लेकिन सियासी लीडर जनता का  नाम लेकर  संसद ठप्प कर रहे है।सरकार हर दिन लोगों के हित में प्रक्रिया को आसान बना रही है लेकिन हंगामे के कारण संसद चल नहीं रही है। जिसमे नुक्सान आम अवाम का ही है । असल में यह सियासी जंग फील इन  द ब्लैन्कस के लिए है..लोगों का मानना है कि ये सियासी जंग राष्ट्रीय नेता के रूप में पहचान बनाने का निजी संघर्ष है..  यकीन मानिये अगर नोटबंदी से ब्लैकमनी का १० लाख करोड़ रुपया सरकार के खजाने में आ जाता है ,जिसकी शुरुआत हो चुकी है तो देश में सियासत के तर्क और अर्थ दोनों बदल जाएंगे।  इन्तजार कीजिये..

शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

अगला नोबेल पीस प्राइज़ क्या भारत आयेगा ?


अगला नोबेल पीस प्राइज़ क्या भारत आयेगा ? बहुत ही सरल सवाल पूछ कर सुप्रीम कोर्ट ने देश के एक जटिल सवाल की ओर लोगों का ध्यान दिलाया है।  पिछले 50  वर्षो से मार्क्सिस्ट गुरिल्ला आतंक से लहुलहान कोलंबिया ने बामपंथी अतिवादियों से पीस डील करके इन्शानियत को नयी फ़िज़ा में सांस लेने का मौका दिया है। कोलंबिया में बामपंथी अतिवादियों की हिंसा में दो लाख साठ हजार लोग मारे गए और ६ लाख से अधिक ग्रामीण लोगों को  पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था।  जाहिर है कोलंबिया के प्रेसिडेंट जॉन मानुएल सांतोस को इस महान समझौते के लिए  सर्वश्रेष्ठ पीस प्राइज़ नोबेल प्राइज से सम्मानित किया गया। सुप्रीम कोर्ट का सवाल अपने आप में गंभीर है क्या जॉन  मानुएल सांतोस के महान कार्य को भारत में दोहराया नहीं जा सकता ? क्या भारत के विभिन्न प्रान्तों में जारी हिंसक आंदलोनों से संवाद का तार नहीं जोड़ा जा सकता ? इस देश की व्यवस्था ,बुद्धिजीबी और जन साधारण क्या इस चुनोती को स्वीकार करेंगे ?

कश्मीर में पिछले 25 वर्षों से जारी अतिवादी हिंसा का स्वरूप माओवाद हिंसा से अलग है। कश्मीर के  उग्रवाद का नियंत्रण पाकिस्तान के  हाथ में है जाहिर टेप कब और किस बक्त ढीला करना है यह पाकिस्तान तय करता है ,लेकिन माओवादी हिंसा एक स्थानीय संघर्ष है जसमे गुरिल्ला जंग का   उद्देस्य सिर्फ सत्ता है। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों की सनक घडी की सुई को उलटी दिशा में घुमाने की है जो जनतंत्र की जमीनी सचाई को झूठ बताकर मार्क्स और माओ को आदर्श बनाने की  की जींद पर अड़े हुए हैं। लेकिन क्या दिल्ली इतना पाक साफ़ है कि सारे इल्जाम इन्ही गुरिल्लों के सिर थोप दिया जाय ?

नक्सल आतंक के खिलाफ पिछले कई वर्षों   से सरकार पूरी ताकत लगा रखी है , कांग्रेस सरकार  यह नही तय कर पायी की इस जंग की कमान किसके हाथ मे होगी ?. यानी यह जंग राज्य सरकार   लड़ेगी या केंद्र।  एलेक्शन  का सवाल लगभग हर पार्टी के लिए अहम् है सो कई पूर्वर्ती सरकार  सामने नही  आना चाहती थी।  केंद्र की चालाकी यह थी कि  राज्य सरकारों को आर्थिक मदद के साथ साथ  ४० से ५० बटालियन सी आर पी ऍफ़  नक्सल प्रभावित राज्यों को भेज रहे  थे .लेकिन लड़ाई की जिम्मेदारी राज्य सरकारों  पर छोड़ रहे थे। राज्य सरकार चाहती थी  कि नक्सल  खिलाफ  लड़ाई  केंद्र सरकार  खुद लड़े.  यह देश का सवाल नही था यह  वोट का सवाल था  . मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नक्सल के खिलाफ सख्त बयानवाजी करते दीखते है लेकिन करवाई के सवाल पर हमेशा पीछे हट  जाने के   लिए  मसहूर हैं। बंगाल की पूर्वर्ती  सरकार को कई टॉप नक्सली  सेफ पैसेज देना पड़ा था ,अपने  अफसर को आज़ाद  कराने के लिए कई नक्सली कमांडर को छोड़ना पड़ा था। यही हाल ओडिशा  छत्तीसगढ़ का था  जहा  हर होस्टेज क्राइसिस के समय राज्य सरकार नक्सली के  सामने घुटने टेकते नज़र आयी।लेकिन इस सियासी दावपेंच का भारी नुक्सान हमेशा सुरक्षाबलों को उठाना पड़ा था ।  

 .पिछले ४ वर्ष पहले तक देश के तकरीबन १४  राज्यों में नक्सलियों का दबदवा कायम था  .पिछले वर्षो में नक्सलियों ने ३ ५०० से ज्यादा हिंसक वाकये को अंजाम देकर १७०००  से ज्यादा लोगों की जान ले ली है  ,जिसमे २००० से ज्यादा सुरक्षाबलों ने अपनी जान की कुर्वानी दी है .अरबों खरबों रूपये के निवेश नक्सली सियासत की भेट चढ़े है  .. यह दिल्ली को तय करना था लेकिन जिम्मेदारी दूसरे पर डाली जा रही थी। 
मौजूदा दौर में नक्सल के खिलाफ अभियान के  ढोल नगाड़े नहीं बज रहे है। .न ही किसी आपरेशन की खबर मिडिया में छप रही है। तो क्या सरकार ने नक्सल के खिलाफ अभियान को पिछे धकेल दिया है ? अभी हाल में बिहार में नक्सलियों ने घात लगा कर १० से ज्यादा सी आर  ऍफ़ जवानों को शहीद कर दिया है । जाहिर है इस हमले  से माओवादी केंद्र की अगली कार्रवाई और धैर्य  की लीमिट परखना चाहते थे।  नक्सली इस दौर में यह जान चुके है कि केंद्र अपनी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार है सो लड़ाई आसान नहीं है। 

लेकिन यह बात केंद्र को भी समझना होगा कि  माओवादी हो या कश्मीर के अलगाववादी भले ही इन्होंने देश के संप्रभुता के खिलाफ मोर्चा  खोला हो लेकिन जम्हूरियत में बात बोली से बनती है गोली से  नहीं। एक  दौर में कश्मीर  में अलगाववाद और  आतंक जम्हूरियत की मजबूती से कमजोर हुई थी। सेना की भूमिका इसमें न के बराबर थी। जम्हूरियत के तई भरोसा बढ़ाने को लेकर  अटल जी कश्मीर में आज भी आदर्श माने जाते है ,तो क्या इस परंपरा को मोदी सरकार आगे नहीं बढ़ा सकती है?  इस देश में हर समस्या का समाधान लोकतंत्र में ढूंढा जा सकता है यह समझने में मणिपुर की  आयरन लेडी इरोम  शर्मीला को १६ साल लगे। हो सकता है कि माओवादी  और अलगाववादी को  समझने में थोड़ा और वक्त लगे लेकिन सरकार इन प्रभावित इलाकों में स्थनीय निकायों में  जम्हूरियत की फ़िज़ा लौटा सकती है और व्यवस्था के प्रति लोगों में भरोसा बढ़ा  सकती है ।  करके देखिये अगला नोबेल भारत का होगा।