वेस्ट मॉडल (नेहरू ) की सियासत में आज  देशी मॉडल (मोदी ) कश्मीर मामले में  ज़्यदा प्रभावी साबित हुए  


यह पहला मौका है  जब पाकिस्तानी फौज के जनरल  वाजबा के खिलाफ विपक्षी पार्टियों ने हल्ला बोल कर दिया है। साबिक प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ आर्मी चीफ जनरल   बाजवा से  पूछते हैं  अवाम की  चुनी सरकार को कठपुतली  इमरान खान को आगे करके क्यों हटाई ?  हर बार अवाम के फैसलों को फौज के बूटों के नीचे क्यों रौंदा जाता है ?  कश्मीर के सियासत दा पूछते हैं कि जब सारे अधिकार पंचायत और लोकल बॉडी  को मिल जाएंगे फिर मंत्री ,मुख्यमंत्री को  कौन पूछेगा ? उन्हें जनभागीदारी वाली व्यवस्था नहीं चाहिए ..  दिक्कत दोनों पार है! पाकिस्तान में जनरल जम्हूरियत को पनपने नहीं देना चाहती कश्मीर में अलगाववादी के साथ सियासी पार्टियां  जनता की सत्ता में  भागीदारी नहीं चाहती। जम्मू कश्मीर में डी डी सी बनाये जाने के बाद साबिक मंत्रियों की तीखी प्रतिक्रिया आयी  है कि  डिस्ट्रिक्ट डवलपमेंट कौंसिल ,ब्लॉक डवलपमेंट कौंसिल और पंचायती राज ही अपने इलाके के फैसले लेंगे फिर कैबिनेट और मुख्यमंत्री क्या करेंगे ? गाँधी जी कहते थे देश के विकास का रास्ता गाँव से निकलेगा । कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्री  पी चिदंबरम साहब और पार्टी कहते हैं जम्मू कश्मीर में विकास का रास्ता स्पेशल स्टेटस और धारा 370 से ही संभव है। कांग्रेस के साथ कश्मीर की सत्ता में रही पार्टियाँ नेशनल कांफ्रेंस और पीडी पी गुपकर डिक्लेरेशन के जरिये 5 अगस्त 2019 के पहले के स्टेटस लाने के लिए संघर्ष की बात कर रहे हैं। 

मेहबूबा जी का डिटेंशन जिस दिन ख़तम हुआ ,पिता पुत्र अब्दुल्ला उनके   घर पहुंच गए। एक दूसरे के खिलाफ आग उगलने वाली पार्टियां आज  एक होने की कसमें ले रही  हैं क्योंकि इन्हे पावर चाहिए जो नयी व्यवस्था ने  इनके हाथ से निकालकर जनता के हाथों तक पहुंचा दी  है। पिछले एक साल में जम्मू कश्मीर ने 52000 करोड़ रुपया खर्च किया है। इसमें अधिकांश पैसा रूरल डवलपमेंट में खर्च हुआ है। खास बात यह है कि यह पैसा पंचायतों के प्रतिनिधि और ग्रामसभा ने मिलकर योजना बनायीं है और खर्च किया है। अफसर बैक टू विलेज के तहत गाँव में कैंप करके जन भागीदारी से विकास कार्यों को जमीन पर उतरा है। न कोई झनझट न कोई करप्शन ! लोग पूछते हैं केंद्र सरकार से पैसा तो उतने ही पहले भीआये   फिर वो पैसे गए कहाँ ? 2019 -20 में कश्मीर ने सारे फ्लैगशिप स्कीम को 100 फीसदी पूरा किया है। 70 वर्षों बाद जम्मू कश्मीर में पीपुल्स  गवर्नेंस को लोगों ने  पहली बार साकार होते हुए देखा है । दूर दराज के पहाड़ी इलाकों में लोगों ने आजतक अपने मुख्यमंत्री को नहीं देखा था लेकिन तमाम सुरक्षा की  चुनौती को दरकिनार करते  एल जी मनोज सिन्हा गाडी से या पाँव पैदल  एक एक इलाका पहुंचे हैं। कोरोना महामारी के बीच मनोज सिन्हा हर जिले में जनता दरबार लगाकर सीधे लोगों से इलाके की और लोगो की समस्या जानने की कोशिश की और इसका निदान करवाया . . तीन तीन पूर्व  मुख्यमंत्री संघर्ष करने के लिए बेताब हैं कि उन्हें धारा 370 चाहिए और सिर्फ उन्ही का शासन चाहिए लेकिन एक वर्षों के कश्मीर की कार्यसंस्कृति ने रियायत की सियासत में  वर्षो पुराने फ्यूडल हुकूमत को आइना  दिखा दिया है। आज अगर डिस्ट्रिक्ट डवलपमेंट कौंसिल में जनता को अपना कौंसिलर /चैयरमेन चुनने का अधिकार दिया गया है तो सियासी पार्टियों को इसमें दिक्कत क्या है? क्यों वे सत्ता के विकेन्द्रकरण के खिलाफ हैं ,क्यों केंद्रीय फण्ड पर कुछ हीं लोगों का कब्ज़ा चाहते हैं ? आर्टिकल 370 हटाए जाने के बाद  लोकतंत्र में जनता के सारे अधिकार जम्मू कश्मीर के अवाम को भी मिला है तो इसमें उन्हें इसमें दिक्कत क्या है ? क्या कश्मीर कुछ परिवारों की जागीर है यह सवाल शायद लोग देश की आज़ादी दिलाने का श्रेय लेने  वाली कांग्रेस पार्टी से जरूर पूछेगी !


 कुछ अंग्रेजी दा बुद्धिजीवी और अंग्रेजी अखबारों के लेफ्ट लिबरल वरिष्ठ पत्रकारों के सामने दिक्कत यह है कि  नेहरू के भारत में वेस्ट मॉडल की पॉलिसी के सामने ईस्ट यानी देशी स्टाइल की मोदी की पॉलिसी प्रभावी  होने लगी  है... भारत की पारम्परिक सोच  सत्ता की जोड़ तोड़ वाले फ़ॉर्मूले  पर भारी पड़ने लगी है और 70 सालों के फेक  नेरेटिव दरकने लगे हैं।  
 पूर्व मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला अक्सर कहते थे कि जम्मू कश्मीर रियासत अपने संसाधन से अपने मुलाजिम को एक महीने का तनख्वाह नहीं दे सकती। रियासत के हर छोटे  बड़े बजट में पैसा केंद्र  ,भारत के टैक्सपेयर का लेकिन कश्मीर में सियासत में इनके खानदान को ऑटोनोमी चाहिए ,मेहबूबा जी को सेल्फ रूल चाहिए ,धारा 35A  चाहिए लेकिन इन्हे ग्राम पंचायत नहीं चाहिए इन्हे डी डी सी में अवाम की भागीदारी से दिक्कत है। क्योंकि ये  सेक्युलर है इसलिए  अपने लाखों कश्मीरी पंडित , बाल्मीकि समाज  ,गोरखा ,पाकिस्तानी रिफ्यूजी  की संघर्षपूर्ण  जीवन की चिंता कभी नहीं की ।  धारा 370 हटाए जाने के बाद मैं एक महीने कश्मीर रहा हूँ ,जो सियासतदां  इस ग़लतफहमी में थे कि मकामी लोग सड़कों पर निकलेंगे वही अवाम हुकूमत को इस बात की मजम्मत  कर रही थी   कि कश्मीर को लूटने वालों पर सरकार करवाई क्यों नहीं करती ? लोग अब पंचायतों की नयी  कार्यसंस्कृति  से रियासत के 70 साल की हुकूमतों की तुलना करने लगे हैं। यानी जनभागीदारी जिन्हे दिक्कत उन्हें जनता ही ख़ारिज कर देगी। 

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