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आज़ादी के 80 साल और दिमागी नक्सली

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  आज़ादी के 80 साल और दिमागी नक्सली  हजारों साल के भारत की  सभ्यता के इतिहास में विचार को लेकर हमेशा द्वन्द रहा है लेकिन गुरुकुल परम्परा में हर विचार को ज्ञान माना गया जिसे तर्कों के कसौटी पर परखा गया। जिसे शास्त्रार्थ के जरिये जीता या हराया गया। वैदिक परम्परा से निकलकर सैकड़ों पंथ विकसित हुए। फले फुले ,समाज के कुछ हिस्सों में उन्हें स्वीकृति भी मिली। लेकिन विचारों को लेकर युद्ध कभी नहीं हुए ,विचारों को लेकर तलवारें नहीं चली। हालांकि  भारत में विदेशी आक्रांताओं के आगमन के साथ विचारों को थोपने की कोशिश शुरू हुई। तर्क और मीमांसा की जगह हथियारों ने ले ली। मकसद था कब्ज़ा ,मकसद था अधिपत्य ,मकसद था डर दिखाकर सत्ता हासिल करना।  विचारों का यह संघर्ष आज़ादी के बाद भारत में और प्रबल हुआ। अभावग्रस्त समाज में सुविधासम्पन्न लोग देश का नेतृत्व करने आगे आये। आज़ादी के दीवाने जिनके दिल में भारत था एक संप्रभु राष्ट्र था वे हासिये पर धकेल दिए गए। लोकतंत्र में विक्टिम कार्ड खेलकर सत्ता की सीढ़ी चढ़ना एक फार्मूला बना जिसका उद्देश्य सिर्फ पावर हासिल करना था। संविधान प्रदत अधिकारों की चर्चा...