संदेश

जब फैक्स मशीन ने बदली कश्मीर की सियासत !

चित्र
गर्व करें या रोएं?,स्वार्थ की दौड़ में कहीं आजादी फिर से न खोएं। अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र न खोदो ,अपने पैरों आप कुल्हाड़ी नहीं चलाओ ,सत्ता की अनियंत्रित भूख...(अटल जी ) ... अटल बिहारी वाजपेयी की इस कविता ने शायद जम्मू कश्मीर के गवर्नर सत्य पाल मालिक को प्रेरणा दी और उन्होंने सत्ता पर काबिज होने की कश्मीर से उठी सियासी आंधी को फैक्स मशीन का सहारा लेकर रास्ता ही बदल दिया। राजभवन की फैक्स मशीन अटक गयी या फिर गुलाम नबी आज़ाद ने अपने 2008 के अपमान का बदला लेने के लिए मेहबूबा मुफ़्ती को भटका दिया। कभी मेहबूबा ने भी आज़ाद जी को कश्मीर में पैदल कर दिया था। क्या सही है ? कहना मुश्किल है लेकिन उधर सरकार बनाने की दो चिठ्ठी फैक्स मशीन में फंसी उधर मौजूदा विधान सभा भंग। गठबंधन की तमाम अटकले धरी की धरी रह गयी। दो साल पहले बीजेपी और पीडीपी के सत्ता समीकरण को बेमेल शादी करार देने वाले लोग ओमर अब्दुल्ला और मेहबूबा मुफ़्ती के सत्ता गठबंधन  को आदर्श शादी करार दे रहे थे। पीडीपी और बीजेपी की तथाकथित बेमेल शादी को लेकर बीजेपी मुल्क में एक आदर्श स्थापित करने की बात कह रही थी , कुछ लो...

मीडिया का स्वर्णिम काल ::आज़ादी तो शायद कुछ ज्यादा ही मिल गयी है !

चित्र
राष्ट्रीय प्रेस दिवस के मौके पर अपने भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने  कहा कि आज के समय में मीडिया पर दबाव बना पाना नामुमकिन है। इमेर्जेंसी और सेंसरशिप की बात तो सोची भी नहीं जा सकती क्योंकि बहुआयामी मीडिया प्रिंट, इलेक्ट्रनिक, वेब ,सोशल मीडिया जैसे तमाम माध्यम आज टेक्नोलॉजी की  बदौलत ओपेनियन मेकर्स की भूमिका में हैं और इसने लोगों को फ्रीडम ऑफ़ स्पीच की एक  बड़ी ताक़त दी है. हालाँकि  विश्वसनीयता (क्रेडिबिलिटी ) का सवाल कल भी था और आज भी है। लेकिन मेरा सवाल अपनी जगह दुरुस्त है क्या हमारे कुछ पत्रकारों /सम्पादकों ने जब तब इसी क्रेडिबिलिटी /शाख को नहीं बेचा है ? क्या पत्रकारों ने अपनी मार्केटिंग के जरिये क्रेडिबिलिटी नहीं बनायीं है  और उसे सियासी बाजार में जब तब  ऊँचे दामों में बेचा है ?  बड़े पत्रकारों के ऊँचे दाम की बोली दो दशक पहले नेताजी मुलायम सिंह ने लगाई थी । जब सूची बाहर आई तो कौन सूप और कौन चलनी सबके एक जैसे ही छेद और सबके जुबान  पर अलीगढ का ताला। लेकिन हम आजादी के रक्षक और चौ...

अयोध्या में दीपोत्सव यानी राजीव गाँधी के रामराज्य का शंखनाद !

चित्र
1989 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने अयोध्या से चुनावी रैली की शुरुआत की थी और  "रामराज्य" लाने का संकल्प दोहराया था। लेकिन पिछले वर्षो में ऐसा क्यों हो रहा है कि  जब कभी भी बात "अयोध्या" और रामलला की होती है  तो बहस सेक्युलर कम्युनल पर टीक जाती है । कौन हैं ये लोग जनमानस के राम को टीवी स्टूडियो में बैठा दिया है। पहलीबार   अयोध्या में आयोजित   भव्य दीपोत्सव में दक्षिणी कोरिया की प्रथम महिला किमजोंग सुक  मुख्य अतिथि के रूप में पधार रही हैं । आयोजन में दुनियाभर  के करीब 900 कलाकार प्रस्तुति देंगे ।  इंडोनेशिया के रामलीला के कलाकार  ओर श्रीलंका, रूस व त्रिनिदाद सहित अलग-अलग महाद्वीपों के कुल सात सौ कलाकार अपनी प्रस्तुति से भारत से अपने संस्कृति के रिश्तों की डोर मजबूत करेंगे।इस  भव्य दीपोस्तव के आयोजन में राम के घर वापसी का भाव है अयोध्यावासी की ख़ुशी में दुनियाभर से लोग पहुँच रहे हैं ।  फैजाबाद से गुजरती हुई ट्रेन में किसी यात्री ने कहा...

15 साल जंगल राज बनाम सुशासन का 15 साल ? अब हम बिहारी नहीं हैं !

चित्र
सबसे ज्यादा अख़बार पढ़ने वाला बिहार ,अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा टीवी न्यूज़   देखने वाला बिहार, औसतन   सबसे ज्यादा मोबाइल फ़ोन धारक बिहार आज   नेतृत्व विहीन क्यों है ? ग्लोबल पावर के रूप में उभर कर सामने आया सोशल मीडिया में बिहार की उपस्थिति क्यों सिर्फ कुछ लफंगे की करतूतों को लेकर सिमट गयी है। क्यों पिछले 30 वर्षो में बिहार अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाने में विफल रहा है ? क्यों कुछ    परिवार और मुठ्ठी भर लोगों के हाथों बिहार की सियासत कैद हो कर रह गयी है। क्या वजह सिर्फ चरम   जातिवाद है या प्रवासी बिहारियों का अपने राज्य के प्रति उपेक्षा ? वजह जो भी हो लेकिन इतना तय है कि देश के हर आंदलोन में अग्रणी भूमिका निभाने वाला क्रन्तिकारी   बिहार की बेबसी के लिए हम सब का जातिगत   अहंकार और लालच जिम्मेदार है।  2019 के लोक सभा चुनाव के लिए बिहार में  जीत का फॉर्मूला क्या है ? इस जीत के लिए नीतीश कुमार और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह 50 --50 पर अपनी रजामंदी दे चुके हैं ,राम विलास पासवान जी के पुरे पर...

अमृतसर का हादसा और मीडिया की हताशा

चित्र
शाम का वक्त ! पत्रकारों के जीवन में ऐसा कम ही मौका मिलता है जब वह अपने परिवार के साथ मार्केट में तफरी करने निकला हो। शायद मीडिया में  "खुश करो " का दर्शन से मै भी अभ्यस्त होने लगा था।  लेकिन तभी किसी चैनल के पुराने सहयोगी का फोन मुझे फिर अपनी पत्रकार की दुनिया में खींच लाया था । बलबीर का नंबर है ? कौन बलबीर मैंने पूछा ?अरे आपका पुराना मित्र  पंजाबी चैनल वाला ,तो ! मैंने कहा .. अरे भाई साहब अमृतसर ट्रेन  हादसे में दर्जनों लोग मर गए है , ट्रेन  से कटकर। कुछ और नंबर जुगाड़ कर दीजिये  ... मैने  डिटेल जानने के बजाय पहले नंबर ही ढूँढना उचित समझा। लेकिन मन में यह सवाल भी उठ रहा था कि क्या  सरकार ,प्रशासन ,पुलिस ,हॉस्पिटल की तरह मीडिया भी किसी बड़े हादसे से निपटने /रिपोर्टिंग के लिए स्किल्ड हुआ  है ? क्या प्रशासन की तरह न्यूज़  चैनल्स भी  सिर्फ खानापूर्ति ही नहीं कर रहे होते हैं ? या कभी कभी  आपाधापी में अफसर सिर्फ मीडिया को हैंडल करन...

जब मोहम्मद इक़बाल के "राम" को ढूढ़ने निकले संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत !

चित्र
पांच राज्यों में चुनाव का बिगुल बज चुका  है। 2019 के लोक सभा चुनाव को लेकर राजनितिक पार्टियों से ज्यादा मीडिया सक्रिय है। चुनावी बाजार की टोह में शिकारी जाल बिछा रहे है। हर तरफ प्रपंच और झूठ वोट के लिए  बेचने की कोशिशे जारी  है। कहीं राम शाश्वत  है तो कही मुखौटा पहन कर संविधान के संशोधन वाला सेक्युलर की धज्जिया उड़ाई जा रही है लेकिन मूल सवाल कोई नहीं पूछ रहा है कि हिंदुस्तान में हिंदुत्व और राम को लेकर बहस क्यों हो रही है ? क्या इस देश में सियासत का मतलब सिर्फ प्रपंच है और मीडिया का मतलब सिर्फ बाज़ार है?  "भविष्य का भारत " राष्ट्रीय संघ का दृष्टिकोण सम्मेलन में मुझे एक सवाल संघ प्रमुख मोहन भागवत जी से पूछने का मौका मिला  था। देश के बड़े बुद्धिजीवियों /सम्पादको के बीच इस सम्मलेन में मेरे जैसे पत्रकार की कोई अहमियत नहीं थी लेकिन मेरे सवाल का आधार अल्लामा इक़बाल की यह कविता थी।  " लबरेज़ है शराबे हक़ीक़त से जामे हिन्द , सब फ़लसफ़ी है खित्ता ए मग़रिब के रामे हिन्द।  ये हिन्दियो के फ़िक्रे फलक उसका है असर।  ...

किस पाकिस्तान से लड़े हम ?

चित्र
मीडिया में पाकिस्तान को लेकर हाहाकार मचा है। विपक्षी पार्टिया पीएम मोदी के  सीने  का साइज पूछ रही है। देश के मीडिया  एक्सपर्ट सरकार को युद्ध का एलान करने को उकसा रहे हैं। देश को चाहिए एक और सर्जिकल स्ट्राइक किस पाकिस्तान पर ? जिसका आज  न कोई भूगोल है न इतिहास। यकीन मानिये जिस वज़ीरे आज़म इमरान पर भारत का मीडिया गोले दाग रहा है उसकी हैसियत इस्लामाबाद के मेयर से ज्यादा नहीं  है और जो प्रधानमंत्री इमरान खान सऊदी अरब पर किसी भी आक्रमण का मुहंतोड़ जवाब पाकिस्तानी फ़ौज देगी का दम्भ भर रहे हैं  उस पाकिस्तानी फ़ौज  ने आजतक अपने 60 फीसद भूभाग पर पाकिस्तानी हुकूमत के कब्जे बहाल नहीं कर सकी वहां आज भी किसी कबीले या फिर आतंकवादी तंजीम का कब्ज़ा है।  यानी आज की तारीख में पाकिस्तानी फ़ौज और हुकूमत का रिट महज 40 फीसद भूभाग पर है। पिछले साल पेशावर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने कहा था कि कोर्ट के फैसले का दायरा सिर्फ 10 कि मी तक है बाकी किसकी सत्ता है नहीं मालूम। यह वही पाकिस्तान है जहाँ इमरान खान पी एम हाउस के गाड़िया ,कारें यहाँ तक की भैश की भी न...