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बीजेपी मे सिविल वार

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अबकी बारी अटल बिहारी .... का जमाना ख़तम हुआ । समझा गया कि आडवानी जी ही बीजेपी के खेवनहार बनेंगे । लोकसभा चुनाव के दौरान आडवानी जी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर पेश कर पार्टी ने यह एहसास कराया था कि अटल जी की छाया से दूर हटकर बीजेपी ने एक नए युग की शुरुआत की है । लेकिन इस पहल पर जब मतदाताओं ने सवाल खड़ा किया तो पार्टी में हर ओर से तलवार खीच चुकी है । सबसे पहले ख़ुद पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह की ओर से बयान आया "अटल जी कमी हमने मह्शूश की है " लेकिन पार्टी अध्यक्ष को यह कहने का साहस नही था कि बीजेपी की इस करारी हार की समीक्षा होनी चाहिए । यानि अध्यक्ष की कुर्शी उन्हें भी सलामत चाहिए । ख़बर आई कि आडवानी जी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते है ॥ लेकिन यह बात सामने नही आई कि किन लोगों ने उन्हें ऐसा करने से मना किया । या फ़िर मान लिया जाय कि बीजेपी में आडवानी जी का अभी कोई तोड़ नही है । कुछ अलग दिखने का दावा करने वाली पार्टी में कांग्रेस संस्कृति हावी है । जसवंत सिंह और यसवंत सिन्हा का ताजा बयान पार्टी के अंदर घमासान मचा दिया है । यानि अनुशाशन के नाम पर पार्टी अध्यक्ष गीदड़ ...

vinod mishra ka blog: बदले बदले से आडवानी या बदली बदली सी सरकार

vinod mishra ka blog: बदले बदले से आडवानी या बदली बदली सी सरकार

बदले बदले से आडवानी या बदली बदली सी सरकार

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१५ वी लोक सभा कई मामले मे ऐतिहासिक है । सिर्फ इसलिए नहीं कि इस बार ३५० से ज्यादा नए सांसद सदन में पहुचे है । सिर्फ इसलिए नहीं कि इन सांसदों में ३०० से ज्यादा करोड़ पति है । न ही सिर्फ इसलिए कि १२५ सांसदों की उम्र ५० से कम है । यह शायद इसलिए कि सत्ता और विपक्ष का रुख बदला बदला सा है । राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का समर्थन करते हुए लाल कृष्ण अडवानी ने यह साफ़ कर दिया कि विपक्ष का रुख २००४ के बरक्स सकारात्मक रहेगा । आडवानी ने कहा सरकार को यह जनादेश स्थायित्व के लिए है ,जाहिर है उन्हें यह पूरा यकीन है है कि यह सरकार पांच साल बिना किसी हिलो हुज्जत के चलेगी । आडवानी ने सरकार को रचनात्मक सहयोग का ऐलान करके यह भी साफ़ किया कि देश हित मे सरकार द्वारा लिए गए फैसले का समर्थन कर बीजेपी इसमें अपनी सहभागिता बढाएगी । पिछले सदन में बीजेपी के हंगामें और वहिष्कार ने विपक्ष की जो छवि बनायीं थी शायद इस छवि से बाहर निकलने की कोशिश आडवानी जी ने शुरू कर दी है । २१ वी सदी की संसद में भले ही निति निर्माता २० वी सदी के हो लेकिन उन्हें इस बात का एहसास हो गया है कि उनका दौर पीछे छुट गया है । सरकार क...

vinod mishra ka blog: न लेफ्ट न राईट परिवार है राईट चोईस

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न लेफ्ट न राईट परिवार है राईट चोईस

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नई सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री श्री प्रकश जायसवाल ने राहुल जी को सुपर प्रधानमंत्री बताते हुए यह साफ़ किया कि सभी मंत्रियों के कार्यों की समीक्षा राहुल जी करेंगे । प्रधानमंत्री इस समीक्षा से बाहर हैं या अन्दर इसका खुलासा मंत्री जी ने नही किया । यानि पॉवर सेंटर इस बार दो नही तीन है ।संवैधानिक सत्ता के ऊपर परिवार हावी है । जीत का सारा श्रेय राहुल जी को देकर कांग्रेसी लीडरों ने यह पहले ही साफ़ कर दिया है कि कोई इकोनोमिक्स नही , कोई पॉलिटिक्स नही सिर्फ़ परिवार ही चुनाव जितने के लिए काफ़ी है । यही वजह है जब भारी हिलो हुज्जत के बाद मंत्रियो की सूचि आई तो मंत्री परिषद् मे परिवार ही छाया रहा ।पी ऐ संगमा को सोनिया गांधी से शिकायत है लेकिन जब उनकी बेटी को मंत्री बना दिया जाय तो फ़िर कौन सी शिकायत । करूणानिधि के लिए राजसत्ता अपना कारोबार है इसलिए बड़े बेटे अझ्हगिरी को केन्द्र की सत्ता में बैठकर छोटे बेटे स्तालिन को राज्य में सत्ता सौपने की तैयारी पुरी कर ली है । अपने फारूक साहब गद गद है । राहुल जी की कृपा से बेटा उमर ने रियासत में सत्ता सिंहासन पा लिया , दामाद सचिन केन्द्र में मंत्री हो गए ,अपने गोबर ...

vinod mishra ka blog: बीजेपी की नाकामयाबी पर रोएँ या कांग्रेस की कामयाबी पर इतराएँ#links#links

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बीजेपी की नाकामयाबी पर रोएँ या कांग्रेस की कामयाबी पर इतराएँ

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किस किस को याद कर्रें किस किस को रोये आराम बड़ी चीज है मुहं ढक के सोएये। मौजूदा सियासत की यही कहानी है । बीजेपी में मंथन का दौर जारी है । कांग्रेस अपनी जीत पर फूले नही समां रही है । राजनितिक पंडित जीत हार का विश्लेषण करने में व्यस्त है । हर का अपना तर्क है ,मनो यही अन्तिम है । राजनीती इतनी क्रूर है कि जो पीछे छुट गया उसे कोई पहचानने वाला नही है । खेल पॉवर का है खेल सुर्खियों में बने रहने का है खेल सुविधा हड़पने का है । भला इस खेल में विचारधारा कोई पहचान रख सकती है । लेकिन सत्ता के खेल में आज भी बीजेपी अपनी पहचान को छोड़ना नही चाहती या यूं कहे कि उसे इस पहचान से अलग नही होने दिया जाता । बीजेपी के अन्दर ही चुनावी मुद्दे को लेकर सवाल उठ रहे है । अफज़ल को फांसी भला ये कोई मुद्दा हो सकता है , शिव राज सिंह चौहान को मलाल है कि बीजेपी ने मुद्दे उठाने में नासमझी की । अरुण जेटली कहते है कि प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह को बार बार कमजोर कहना नादानी साबित हुई । तो बीजेपी के कई वरिष्ठ लीडर नरेन्द्र मोदी और वरुण गाँधी को तरजीह मिलने से खफा है । यानि हार के कारणों को ढूंढने के वजाय बीजेपी में एक दुसरे क...