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अब मैं कन्हैया हो गया हूँ......

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मै हूँ अन्ना ,मैं हूँ केजरिवाल अब मैं कन्हैया हो गया हूँ। .. लेकिन मैं कभी ललितपुर का लोटन नहीं बनना चाहता हूँ  और  न ही  बुंदेलखंड और  नागपुर   के मंगतू राम जैसे हज़ारो किसानो में मेरी कोई  दिलचस्पी है जो महज पचास हज़ार कर्ज न चुकाने के कारण आत्महत्या कर लेता है..मैं आज  कन्हैया इसलिए हूँ कि वह मोदी को गरिया रहा है कल मैं केजरीवाल इसलिए था क्योकि वह मनमोहन सिंह को चोर कह रहा था....मीडिया में आज  सिर्फ"" आज़ादी" की खबरे छप रही है  मानो कुछ संपादको को गांधी के रूप में कन्हैया मिल गए   हो और वर्षो से गुलामी के बेड़ियों में जकड़े टीवी के स्वनामधन्य संपादको को खुली हवा में साँस लेने का मौका मिल गया हो। मीडिया में कही मोदी के समर्थन में जे एन यु के अति उत्साहित छात्रों को राष्ट्रद्रोही बताया जा रहा है तो कही   कुटिल संपादको की फौज जिन्हे मोदी और उनकी सत्ता से चिढ है वे इसे hight ऑफ़   इंटॉलरेन्स बता रहे है.. . एक गरीब माँ का बेटा कन्हैया जिसे आज मीडिया स्टार बता रहा है और लोगों को मानने के लिए विवश भी ...

मोदी सरकार के इक़बाल पर सवाल

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उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से बीजेपी "मिशन यू पी " की शुरुआत कर रही है... कही से भी करे ये पार्टी  का मामला है ,लेकिन बलरामपुर क्यों ? शायद इसलिए कि बलरामपुर का सरोकार अटल जी से रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी ने  इसे अपना कर्मभूमि माना था और यही से पहला लोकसभा चुनाव लड़ा था । लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में न तो अटल की चर्चा थी ,न ही आडवाणी की और न ही पंडित दीनदयाल की.... सिर्फ मोदी। .इसी मोदी को आगे करके पार्टी ने केंद्र  सहित 7 राज्यों में सरकार बनाली ,लेकिन आज अलग अलग राज्यों में अलग अलग आदर्श और नाम ढूंढे जा रहे है, तो क्या मोदी की चमक फीकी पड़  रही है या यूँ कहे की  मोदी सरकार का इकबाल कमजोर हो  रहा है ? क्या इसके लिए देशी-विदेशी एन जी ओ जिम्मेदार है ? मोदी सरकार की जन - धन और फसल बीमा योजना इस दशक का सबसे बड़ा रेफोर्मेशन माना जा सकता है लेकिन अगर चर्चा सिर्फ जे एन यू  के देश भक्त और देश द्रोही की हो रही है तो माना जा सकता है कि सरकार दिशाहीन है।  बीजेपी के एक विधायक  यूनिवर्सिटी में शरा...

ये सब रंगमंच की कठपुतलियाँ है

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  विश्वगुरु भारत इनदिनों टीवी गुरुओं के प्रवचनों से थोड़ा कंफ्यूज है। भक्त और तथाकथित गैर भक्त संपादको-पत्रकारों    ने अपनी तरफ से आंदोलन छेड़ रखा है। देश प्रेम और देश द्रोह के मुद्दे पर टीवी स्टूडियो में समुद्र मंथन जारी है फर्क सिर्फ इतना है कि इस मंथन का विष पिने के लिए सिर्फ   दर्शक मजबूर है....        टीवी पर अपनी   ज्ञान धारा बहाने के बाद संपादको का सोशल मीडिया पर बक.... यानी संपादकों के मुख से निकले एक एक शब्द देश के दशा और दिशा तय करने का दम्भ भर रहा है।   तमसो मा ज्योतिर्गमय   की बात करने वालों  का ऐसा अहंकारी भाव पहले शायद ही देखा गया हो। "ये सब रंगमंच की कठपुतलियाँ है जिनकी डोर उपरवाले की उँगलियों में बंधी है। .कब, कौन और कबतक ज्ञानी बना रहेगा ये कोई नहीं बता सकता सिर्फ ऊपर वाला जनता है  हा हा हा .".... दिल पर मत लो यार ........

पीडीपी -बीजेपी बेमेल शादी और बेसुरा सियासी राग

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मरहूम मुफ़्ती साहब कश्मीर की सियासत में एकबार फिर याद किये जाने लगे है। सन  २००२ में जब पहली बार पीडीपी की सरकार कश्मीर में बनी तो लोग मेहबूबा की जगह मुफ़्ती साहब को बजीरे आला देखकर हैरान थे क्योंकि कश्मीर में लोगों ने मेहबूबा की पीडीपी को वोट दिया था। लेकिन कांग्रेस की जिद के कारण मेहबूबा मुफ़्ती के बजाय मुफ़्ती साहब को कोएलिशन हुकूमत की कमान मिली। लम्बे अरसे के बाद  या यूँ कहे कि कश्मीर में यह पहला मौका था जब लोगों का  भरोसा चुनावी प्रक्रिया में लौटी थी। अटल जी ने चुनाव को फ्री और फेयर करबा कर पीडीपी को नेशनल कांफ्रेंस के अल्टेरनेट खड़ा कर दिया था वही  मुफ़्ती साहब वह पहला सी एम थे जिन्होंने हीलिंग टच पॉलिसी अपनाकर न केवल लोगों का दिल जीता बल्कि कश्मीर की सियासत में अपने को स्थापित किया था । बीजेपी आज वाजपेयी के दौर से आगे  निकल चुकी है तो पीडीपी में रियासत से ज्यादा चिंता इस बात को लेकर है कि पार्टी की हालात अगले चुनाव में कैसी होगी ? आतंकवाद  प्रभावित जम्मू कश्मीर आज खबर से  बाहर है। जुम्मे के रोज आई ...

पाकिस्तान से बात करना क्यों जरूरी है ?

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आओ फिर से दिया जलाएं भरी दुपहरी में अँधियारा ,सूरज परछाई से हारा अंतरतम का नेह निचोड़े ,बुझी हुई बाती सुलगाएँ आओ फिर से दिया जलाएं।। .. काबुल में मौजूद प्रधानमंत्री मोदी को अचानक वाजपेयी की ये कविता क्यों याद आई ?इसलिए कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन था या फिर काबुली वाला  देश में मोदी भारत -अफ़ग़ानिस्तान के पारम्परिक रिश्तो पर  "यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी " गाकर, आह्लादित हो उठे थे। महज एक ट्वीट का मेसेज देकर प्रधान मंत्री मोदी नवाज़ शरीफ से मिलने लाहौर चल पड़े थे ? या यह सोशल डिप्लोमेसी की नयी पहल सामने आई थी। जिस देश के प्रधानमंत्री पिछले ११ साल से यह तय नहीं कर पाये कि पाकिस्तान जाना चाहिए कि नहीं ,उसी देश में एक प्रधानमंत्री आज कबूल में ब्रेकफास्ट और लाहौर में लंच लेने के बारे में सोच रहा था। १९९९ से लेकर २००४ तक भारत -पाकिस्तान के रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने में पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने निरंतर प्रयास किया कारगिल जंग हो या पार्लियामेंट अटैक हर विषम परिस्थिति में एक धैर्यवान शासक का परिचय देते हुए वाजपेयी ने बातचीत का रास्ता...

सहिष्णुता ,धर्मनिरपेक्षता सिर्फ सियासी जुमले है ?

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महामहिम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी बार बार सहिष्णुता  और अनेकता में एकता की महान परम्परा को याद दिलाकर यह बताने की कोशिश कर रहे है कि हम इस देश की मौलिक पहचान को भुला रहे है। यही बात हमारे कुछ इतिहासकार ,कुछ अकादमी सम्मान से सामनित लेखक ,वैज्ञानिक ,अभिनेता भी अपना सरकारी तमगा लौटाकर  बताने की कोशिश कर रहे हैं कि इसके लिए सिर्फ मोदी सरकार जिम्मेदार है। लेकिन इन तमाम बहस के बीच जम्मू कश्मीर सरकार का हलफनामा हमारे सेक्युलर सोच और सहिष्णुता की अवधारणा और निष्ठां पर सवालिया निशान लगा देता है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा देकर जम्मू  कश्मीर सरकार ने माना है कि साढ़े चार लाख निर्वासित पंडितो में सिर्फ एक परिवार अबतक कश्मीर लौटा है। २५ वर्षो से अपने ही मुल्क में निर्वासित जीवन जी रहे लाखो परिवार अगर घर लौटने की हिम्मत नहीं जुटा रहा है तो माना जायेगा कि सहिष्णुता ,धर्मनिरपेक्षता सिर्फ सियासी जुमले है ,इस मुल्क की सियासत इसके लिए कभी चिंतित नहीं हुई है। यह वही कश्मीर है जहाँ महात्मा गांधी को आशा की किरण दिखाई दी थी। यह वही कश्मीर था जहाँ ...

बीफ पर यह बहस बंद करो

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जम्मू कश्मीर एसेंबली का बाकया एक बार फिर मुझे कान के नीचे हाथ सहलाने को मजबूर कर दिया था। इंजीनियर रशीद के दर्द को सिर्फ मैं समझ सकता हूँ क्योंकि ऐसी शरारत के कारण मैंने भी जमकर कभी पिटाई खाई थी। बचपन में मैं मॉ की थाली में मछली डाल कर उसकी प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की थी ,बदले में मिला सौगात आज तक नहीं भुला पाया हूँ। मिथिला में खान -पान का प्रचलन कुछ खास है ,एक ही परिवार में कोई शाकाहारी है तो कोई मांसाहारी। लेकिन हर कोई हर की आस्था का सम्मान करता है। मैंने अपने वैष्णव माँ को चिढ़ाने की कोशिश की थी।  यही गलती हुर्रियत कांफ्रेंस के साबिक नेता और वर्तमान में एम एल ए इंजीनियर राशिद कर बैठे। कश्मीर के एम एल हॉस्टल में बीफ पार्टी का आयोजन करके मीडिया के कैमरे के  सामने चटकारा लेकर इंजीनियर राशिद चाहे जिस सेकुलरिज्म का तमाशा दिखा रहे हों ,लेकिन कश्मीर से विस्थापित रविन्द्र रैना को यह सेकुलरिज्म रास नहीं आया। रियासत जम्मू कश्मीर असेंबली  पहलीबार एक पंडित के उग्र रूप देखकर हैरान था.. जिस असेंबली में पिछले ३० वर्षो में आजतक कोई शांति प्रस्ताव नहीं लाया गया उस अ...