भोजशाला : क्यों सलमान खुर्शीद इसे अयोध्या नहीं मानते

 भोजशाला :भारत की सभ्यता और संस्कृति को कोर्ट से मिली पहचान 

(क्यों सलमान खुर्शीद इसे अयोध्या नहीं मानते )


1947 के बाद आज के  भारत को जो लोग नेशन स्टेट मानते हैं उन्हें भोजशाला विवाद पर हाई कोर्ट के फैसले ने निराश  किया होगा । लेकिन भारत को एक प्राचीन सभ्यता और सविलिजेशनल स्टेट के रूप में जो जानते हैं उन्हें मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के फैसले ने आत्मगौरव और संतोष दिया होगा। न्याय होते देख कई पीढ़ियां भावुक हुई होगी।कोर्ट के फैसले ने उनका  भरोसा मजबूत किया है कि न्याय के लिए  भले ही संघर्ष लम्बा करना पड़ता है लेकिन अयोध्या में राम मंदिर भी बने और सनातन संस्कृति  की ज्ञान और विज्ञान के देवी सरस्वती के भोजशाला से सनातन संस्कृति की  पहचान सुनिश्चित हुई।  

सरस्वती के वरद पुत्र और परमार कुलभूषण महाराजा  भोज का नाम  क्या भारत के पराक्रमी राजाओं के  इतिहास में दर्ज नहीं होना चाहिए था। लेकिन उनके महान थाती और धरोहर भोजशाला को कमाल मौला मस्जिद के विवाद में डालकर तक्षशिला ,विक्रमशिला और नालंदा जैसे ज्ञान विज्ञान केंद्र को खंडहर में तब्दील होने के लिए छोड़ दिया गया। राजा भोज के एक महान गुरुकुल और भारत के सांस्कृतिक एकता के सूत्र को दफ़न करने की एक कुटिल  साजिश की गयी। 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भोजशाला परिसर को लेकर सुनवाई के दौरान मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद पेश हुए थे। उन्होंने सुनवाई के दौरान हिन्दू संगठनो की  याचिका और अयोध्या मुकदमे के बीच एक फर्क बताया।सलमान खुर्शीद ने कहा कि राम मंदिर मामले में, राम लला  विराजमान यानी देवता खुद याचिकाकर्ता थे। साथ ही मंदिर की देखभाल करने वाले सेवादार भी उनके साथ थे।लेकिन भोजशाला में आज कोई मूर्ति नहीं है और न ही गुरुकुल और न  सरस्वती देवी मंदिर के सेवादार। यानी धार जिले के 98 फीसदी हिन्दुओं को अपनी विरासत और पहचान से कोई सरोकार नहीं है लेकिन खिलजी के दौर में आये एक मौलाना कमाल के मकबरे से गुरुकुल और पूरी भोजशाला पर धार के स्थानीय 2 फीसदी मुस्लिम आबादी को पूरी भोजशाला का मालिकाना हक़ मिलना क़ानूनी हक़ की  खुर्शीद व्याख्या कर रहे  थे।  

इससे  भी बड़ा सवाल यह है आक्रांता खिलजी के विध्वंशों और भोजशाला के अस्तित्व मिटाने की कोशिश में सूफी कमाल मौला जिसकी मौत गुजरात में हुई थी उसके नाम पर धार के गुरुकुल में मकबरा और मस्जिद बनाना एक शाश्वत संस्कृति और एक महान राजा के कृतित्व को मिटाने की क्या  खिलजी की  साजिश नहीं थी ?

अयोध्या के बाबरी मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट में एक प्रश्न आया था। क्या कोई मस्जिद स्थानांतरित नहीं हो सकती या मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग है। सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनी थी। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के मुताबिक ढहाए गए ढांचे के नीचे कोई इस्लामी ढांचे के सबूत नहीं था।  गौर करने वाली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना की मस्जिद इस्लाम के प्रमुख अंग में नहीं है। इस्लामी  व्याख्याकार कब्जा जमीन पर मस्जिद या उपासना स्थल बनाना अनुचित मानते हैं। फिर ASI की रिपोर्ट आने के बाद भोजशाला को लेकर जिद क्यों ?

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश पर  एएसआई ने 15 जुलाई, 2024 को अदालत में अपनी 2,000 से अधिक पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट पेश की थी । इस रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया कि मौजूदा मकबरे का ढांचा पहले से मौजूद मंदिरों के हिस्सों का उपयोग करके बनाया गया था। एएसआई के मुताबिक, इस संरचना में लाल पत्थर के नक्काशीदार खंभों वाला एक बड़ा सभा कक्ष और बीच में एक यज्ञ कुंड था। साथ ही यहां मिले शिलालेखों में संस्कृत वर्णमाला, व्याकरण के नियम और 'कर्पूरमंजरी' नामक नाटक के अंश मिले हैं। 

मुस्लिम पक्षकार और मौलाना हर मंदिर मस्जिद विवाद में 1991 के नरसिंह राव सरकार के वरशिप एक्ट को सबसे मजबूत ढाल बना लेते हैं ,जो उनके तमाम एन्क्रोचमेंट को जायज ठहराने का क़ानूनी हक़ देता है। सलमान खुर्शीद भोजशाला मामले यही दलील दे रहे थे कि पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991' के तहत इसकी मौजूदा स्थिति को बदली नहीं जा सकती । उन्होंने जोर देकर  कहा कि 15 अगस्त 1947 की वैधानिक कट-ऑफ तारीख ही निर्णायक है। कांग्रेस पार्टी की नीतियों पर जोर देते हुए खुर्शीद साहब का कहना था कि  कानून बनाने वालों का मकसद ऐतिहासिक विवादों पर पूर्ण विराम लगाना है। साथ ही पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप को वैसा ही बनाए रखना था। जैसा कि देश की आजादी के समय था। सिर्फ एक सूत्र से देश में दर्जनों अनैतिक कब्जे नैतिक कैसे बन जाते हैं यह समझना भी जरूरी है। 

हालाँकि इस एक्ट को लेकर जानकार मानते हैं कि इसकी गलत व्याख्या की जाती है। ASI संरक्षित प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या इमारत पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम-1991 के दायरे से बाहर है।  यह स्पष्ट प्रावधान है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारक इस कानून के दायरे से बाहर रखे गए हैं।  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भोजशाला मामले में भी एएसआई ने अदालत के समक्ष यह स्पष्ट किया था कि संरक्षित इमारतों में इबादत या पूजा इजाजत मिलने पर की जा सकती है। 

भोजशाला को लेकर वर्षों से जारी स्थानीय लोगों का संघर्ष कभी राष्ट्रीय बहस और मीडिया की सुर्ख़ियों में नहीं आया। लेकिन यह अक्सर देखा गया कि शुक्रवार को पड़ने वाले बसंत पंचमी को लेकर कोर्ट का दरवाजा जरूर खटखटाया जाता था।    

इसी साल ऐतिहासिक  भोजशाला में बसंत पंचमी और जुमे की नमाज एक साथ होने के कारण छिड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने  एक अहम्  फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि बसंत पंचमी को भी  पूजा और नमाज दोनों होगी।हिन्दू पक्ष की यह मांग थी कि सरस्वती  पूजा विधान सुबह से शाम तक होती है लेकिन शायद कोर्ट ने मंगल और शुक्रवार की पुरानी व्यवस्था के कारण 1 से 3 बजे तक परिसर में नमाज पढ़ने की इजाजत दी। बड़ा सवाल यह है कि  कोर्ट से बाहर साम्प्रदयिक साहौर्द और गंगा जमुनी तहजीब की बात करने वाले लोग एक दिन क्या ज्ञान विज्ञान संगीत कला की अधिष्ठात्री वाग्देवी की पूजा को सेक्युलर मान कर अलग नमाज नहीं पढ़ सकते थे ? लेकिन सियासतदानों ने ऐसा नहीं होने दिया।     


 मध्य प्रदेश हाईकोर्ट  ने धार भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है। हाईकोर्ट ने इसे मंदिर माना है। के ब्रिटिश हिस्टोरियन से लेकर जर्मन आर्किटेक्ट और भारतीय पुरातत्वविदों के सैकड़ो दस्तावेज जो भोजशाला में प्राकृत ,संस्कृत और अन्य भारतीय प्राचीन भाषाओँ के शिलालेखों की भोजशाला के सांस्कृतिक स्वरूपों को कोर्ट ने गहराई से अध्ययन करके यह निष्कर्ष दिया है।  1961 में प्रसिद्ध  इतिहासकार डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर लंदन गए और भोजशाला की वाग्देवी की प्रतिमा के भारतीय मूल के होने के साक्ष्य प्रस्तुत किए थे।  हालांकि मूर्ति आजतक  वापस नहीं आई।हाई कोर्ट ने ब्रिटिश म्यूजियम से वाग्देवी की मूर्ति वापस लाने की व्यवस्था करने की बात कही है साथ ही मुस्लिम पक्ष को मस्जिद के लिए अलग से शासन को जमीन देने का भी आदेश दिया गया है।   

सवाल यह  है कि कोर्ट के निर्णय के बाद धार के  स्थानीय लोग वर्षों पुराने  सामाजिक और सांस्कृतिक संघर्ष को समाप्त करने के लिए भोजशाला विवाद को समाप्त करेंगे या फिर हैदराबाद से दिल्ली और लखनऊ तक वोट की सियासत करने वालों को सियासत करने का  मौका देते रहेंगे । अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के अहम् फैसले के बाद पांच सौ वर्ष पुराने विवाद खत्म हुए तो आज अयोध्या दुनिया की दूसरी वेटिकन सिटी बन गयी है। कल धार के पिछड़े इलाके में भोजशाला ज्ञान विज्ञान के केंद्र के रूप में गौरव पाकर एक नए विकसित धार की संरचना को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। Vinod Mishra 

  

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