विकसित भारत का जंतर मंतर

 विकसित भारत का जंतर मंतर 




राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर की चिंता देश की व्यवस्था को लेकर है देश के विकसित होने से उसका कोई सरोकार नहीं है। तो क्या पहले देश व्यवस्थित था जो इनदिनों उसके कुछ कल पुर्जे हिल गए हैं। या हिले हुए कल पुर्जे कुछ ज्यादा टाइट हो गयी है जिससे कुछ लोगों को दिक्कत होने लगी है। विपक्ष का दावा है कि देश में लोकतंत्र खतरे में है जबकि इस दौर में स्मार्ट फोन रखने वाला हर व्यक्ति ब्रॉडकास्टर  है। हर व्यक्ति संविधान में बोलने की आज़ादी का इस्तेमाल करके पत्रकार बना हुआ है। एक व्यक्ति जो कभी स्कूल नहीं गया कभी कोई किताब नहीं पढ़ा लेकिन चर्चित मीडया उसे विशेष संवादाता होने का बड़ा क्लेम करता है क्योंकि उसके सोशल मिडिया पर फॉलोवर्स लाखों में  हैं । लेकिन फिर भी देश में लोकतंत्र खतरे में है। तो क्या 140 करोड़ देश का लोकतंत्र राजधानी के जंतर मंतर से सुरक्षित होंगे। क्या दस बिस डफरी पीटने वाले व्यवस्था को ठीक कर देंगे। 

मनमोहन सिंह सरकार के दौर में जंतर मंतर विरोध के बीच एक अखबार ने दावा किया था कि मेरठ कैंट से भारतीय सेना दिल्ली में तख्तापलट की पहल तेज की थी। उसी अखबार ने मोदी सरकार के दौर में चुनाव आयोग में विद्रोह की खबर छाप कर जंतर मंतर को व्यवस्था के खिलाफ लड़ने को मसाला दिया है. सोशल मिडिया के इन्फ्लुएंसर को रील बनाने को मौका दिया है। कुछ पत्रकारों को लोकतंत्र के सजग प्रहरी साबित करने का भी अवसर दिया है । विपक्ष पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के जरिये अपने वोट चोरी के अभियान को सही ठहराने लगता है। और जंतर मंतर चीखने लगता है सिंहासन खाली करो जनता आती है। दुनिया के सबसे बड़ी आबादी वाले देश में जितने लोग हैं उतने सवाल हैं। लेकिन इतने सवालों के बीच विचारणीय प्रश्न यह है कि चुनाव जितने के दबाव के कारण क्या राजनितिक पार्टियां सिस्टम को लेकर अनसुलझे सवालों से कतरा क्यों रही है। 

यह भी सच है कि उलझे सवालों के जवाब पावर से ही मिलता बरना यह देश आर्टिकल 370 को स्थायी कानून मान चूका था। राम मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी भगवान पर ही छोड़ रखा था। 120 जिलों में नक्सली रक्तपात को सामंतवाद के खिलाफ जनसंघर्ष मान चूका था। देश में आतंकवाद की घटना को अपनी नियति मान बैठा था। ऐसे दर्जनों अनसुलझे सवाल के जवाब मोदी को पीएम बनने के बाद   ही मिले हैं। लेकिन व्यवस्था को लेकर ऐसे दर्जनों सवाल अनुत्तरित होने से कुछ समूहों में ज्यादा आक्रोश है। 

विविधता भरे देश में संघर्ष आज रोटी ,कपडा और मकान से ज्यादा सुविधा को लेकर है। गांव से शहरों तक अब जो प्राप्त है वह पर्याप्त नहीं है। बल्कि दिल मांगे मोर की सीटी बजाई जा रही है। आलोचक ,कटुआलोचक की श्रेणी में अब विदूषक ने भी प्रवेश किया है। यह रील का जमाना है सो विदूषक की भूमिका बड़ी हो गयी है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सबकुछ सरकार ही ठीक करे तो जनता फिर क्या करेगी।सरकारों पर कुछ समुदायों की निर्भरता हद से ज्यादा बढ़ गयी है या यूँ कहें कि वोट की सियासत ने उन्हें प्रिविलेज बना दिया है। लेकिन नुक्सान उसी समाज का हो रहा है। 

चुनाव आयोग का मुख्य काम वोटर लिस्ट बनाना और शांतिपूर्ण  मतदान कराना है। लेकिन उस आयोग के पास एक दफ्तर के अलावा कुछ नहीं है। जाहिर है पोलिंग बूथ के BLO से लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ही इलेक्शन कमीशन है। लेकिन विदूषक ज्ञानेश कुमार के नाम पर्ची फाड़ता है। बिहार ,बंगाल ,उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस पार्टी हर बूथ के लायक अपना BLA नहीं दे सकी लेकिन वोट चोरी का आरोप लगाने में सबसे आगे है। बड़ा सवाल यह है तीन फेज के SIR में 12 करोड़ से ज्यादा नाम कटे लेकिन किसी भी जिलाधिकारी के पास एक भी केस नाम काटने को लेकर पेंडिंग नहीं है। कुछ जागरूकता की वजह हो सकती है लेकिन पार्टियों के BLA कहाँ हैं जो इन्हे ढूंढ सके सभी लोगों को चिन्हित कर सके। 

लोकतंत्र में मिडिया ने अपनी जिम्मेदारी सिर्फ गलती ढूंढने का बना लिया है लेकिन ऐसे लोगों को प्रकाश में लाना भी उसी मीडिया की जिम्मेदारी है जिन्हे चिन्हित किया जा सके और ERO को बता सके कि निचले स्तर की व्यवस्था सही नहीं है। आज़ादी के 80 साल बीत जाने के वाबजूद हम एक जिम्मेदार नागरिक एक जिम्मेदार अफसर बनने के लिए तैयार नहीं है। अगर किसी जिले में कुछ लोगों की शिकायत है कि SIR में उनके नाम नहीं जुड़े हैं तो यह सुनिश्चित करना DM का काम  है। लेकिन सियासत में हम इस्तीफा मुख्य चुनाव आयुक्त से मांगते हैं। अधिकारी नीचे से ऊपर तक अपने पावर को गाय समझ कर सिर्फ दुहना जानता है उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती ना ही कोई सजा । देश में लोग रोटी से ज्यादा व्यवस्था से लड़ रहे हैं। कई पुरानी व्यवस्था सड़ने के बाद बदबू दे रहा है लेकिन देश की राजनीति सत्ता के लिए नैरेटिव बनाने में व्यस्त है। 

विकसित भारत 10 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बन जाय लेकिन व्यवस्था को लेकर बन रहे आक्रोश तब तक बने रहेंगे जबतक राजनीति में तुष्टिकरण की सियासत ख़त्म नहीं होगी। परफॉरमेंस और जिम्मेदारी व्यवस्था  बनाने वालों के लिए तय नहीं होंगे। इकनोमिक रेफोर्मेशन से ज्यादा जरुरत  सोशल रिफार्म की है।  व्यूज बटोरने में लगा समाज जब राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका तलाशने लगेगा। भारत को विकसित होने से कोई नहीं रोक सकता न ही उसे किसी जंतर मंतर की जरूरत होगी।  विनोद मिश्रा 

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
यथार्थ परक विश्लेषण है आप का। मुद्दा विहीन विपक्ष अपनी खिसियाहट उतार रहा है। लोकतांत्रिक मूल्यों से इनका कुछ भी लेना-देना नहीं है।

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