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vinod mishra ka blog: और कितने राज्य पहले एक देश तो बनालो

और कितने राज्य पहले एक देश तो बनालो

और कितने राज्य पहले एक देश तो बनालो

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मुझे कल रात एक मित्र का फोन आया .सियासत से उनका दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है लेकिन पहलीबार उन्होंने सियासी मैदान मे कूदने की इच्छा जताई . उनके हिसाब से यह एक अच्छा मौका है .तैयारी के नाम पर उनके पास गाँधी जी का सत्याग्रह का अस्त्र है . चन्द्र शेखर राव की तरह वे आमरण अनसन पर भी जा सकते है ,अगर मिडिया उनका साथ दे . यानी उनके आमरण अनसन की पल पल की खबर देकर मिडिया उनके पक्ष में एक माहोल जरूर बना सकती है .लोग उनके साथ नहीं है तो क्या हुआ मीडिया के जरिये वे लोगों के बीच जरूर पहुँच जायेंगे . मैंने पुछा आपकी मांग क्या होगी ? उनका जवाब था मिथिला राज्य .मिथिलांचल मांगने के पीछे उनका यह तर्क था कि बिहार का यह इलाका नेतृत्वा बिहीन है ,जाहिर है तरक्की के मामले मे भी बिहार में सबसे पीछे है . मैंने उनसे पुछा कि मिथिलांचल मे आपको कोई जानता नहीं कोई पहचानता नहीं फिर आपकी बात को लोग गंभीरता से लेंगे इसमें मुझे शक है . अति उत्साहित मेरे मित्र का मानना था कि मधु कोड़ा को कौन जानता था ,अर्जुन मुंडा को कौन जानता था ,बाबू लाल मरानादी को कौन जानता था .बी सी खंडूरी को कौन जानता था ,जब अलग राज्य बना तभी तो लोग...

vinod mishra ka blog: कश्मीर मे किस गन से कौन मरा ,ढूंढ़ते रह जाओगे

vinod mishra ka blog: कश्मीर मे किस गन से कौन मरा ,ढूंढ़ते रह जाओगे

कश्मीर मे किस गन से कौन मरा ,ढूंढ़ते रह जाओगे

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गृह मंत्री पी चिदम्बरम की बातचीत की पहल को आतंकवादिओं ने जोर का झटका लेकिन धीरे से दिया है .मौलवी फज़लुल हक कुरैशी को गोली मारकर हिजबुल मुजाहिद्दीन ने यह भी बता दिया है कि उन्हें नज़रंदाज़ कर हुर्रियत के लीडर अपनी लीडरी नहीं चला सकते . हिजबुल के इस हमले ने हुर्रियत के लीडरों को खामोश कर दिया है . १९७१ मे फजलुल हक कुरैशी खुद एक आतंकवादी तंजीम अल फ़तेह बनाकर बन्दूक की जोर पर कश्मीर को आज़ाद कराने निकले थे . बाद में उन्हें बाहर का रास्ता दिखाकर जे के एल ऍफ़ ने वह मोर्चा संभाल लिया था . लेकिन कश्मीरी लीडरों की यह आज़ादी पाकिस्तान को रास नहीं आई सो उसने जे के एल ऍफ़ को धकेल बाहर किया,यासीन मालिक कश्मीर का गांधी बन गए  और उनकी जगह पाकिस्तान ने हिजबुल मुजाहिद्दीन को सामने लाया . इस तरह हुर्रियत के तमाम लीडर किसी न किसी आतंकवादी तंजीम से जुड़े या फिर उनका नेतृत्वा किया ,ये अलग बात है उनकी यह गतिविधि तब तक जारी रही ,जब तक पाकिस्तान ने उन्हें ऐसा करने की इजाजत दी . इस दौर मे मौलवी मिरवैज फारूक आतंकवादी के गोलियों के शिकार हुए , मिरवैज ओमर फारूक ने न केवल अपने वालिद को खोया ब...

२६\११ ! दुनिया हम पर हस रही होगी तो पाकिस्तान ठहाका लगा रहा होगा

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मुंबई हमले मे शामिल पकड़ा गया पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसब के ट्राइल पर हमने अबतक ३१ करोड़ रूपये खर्च किये है .इन हमलों में  पाकिस्तान के स्टेट और नॉन स्टेट एक्टर के खिलाफ हमने ७ दोसिएर पाकिस्तान की हुकूमत को सौपे है . लेकिन पाकिस्तान से आज भी सबूत की मांग की जा रही है . यानि पुरे साल हम दुनिया को बताते रहे कि हमलो के आरोपियों को पाकिस्तान बचा रहा है . हमारी सरकार ने सबूत का पुलिंदा तैयार करके पूरी दुनिया को समझाने की कोशिश की है कि मुंबई हमले की साजिश पाकिस्तान में रची गयी थी ,पाकिस्तान में ही दहशतगर्दों को ट्रेनिंग मिली ,पाकिस्तान से ही उन्हें भेजा गया ..लेकिन हमसे  और सबूत देने की बात की जा रही है . ट्राइल कोर्ट में मौजूद अजमल आमिर कसब को लगातार हँसते देखकर जज ने डाट लगायी थी . लश्कर का यह दहशतगर्द भली भाति समझता था कि यह ट्राइल प्रोसेस अभी लम्बा चलेगा और कभी ऐसी स्थिति भी आएगी कि उसे या तो आज़ाद करा लिया जायेगा या फिर उसे मुआफ कर दिया जायेगा . अमेरिका के ९\११ के हमले की जांच कमिटी ने माना था कि अमेरिका के ऊपर यह हमला ऍफ़ बी आई की कल्पना की चूक थी ....

कहाँ है आपका गाँव पता मिले तो मुझे जरूर बताएं

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मुझे याद है फोचाय मरर का वह गीत "कखन हरब दुख मोर हे भोलानाथ "इसी गीत से हमारी सुबह की शुरुआत होती थी .फोचाय मरर के इस गीत के साथ शुरू होती थी कई आवाजे ..... मवेशियों के गले मे बंधी घंटिया ,किसानो की चहल पहल ... दूर से आती ढेकी की आवाज ... उखल समाठ की आवाज ... अल सुबह की ये सारी आवाजे मिलकर एक मेलोडी बना रही थी. कह सकते है कि मिथिला के गाँव की यह सास्वत पहचान थी . सामाजिक सरोकार का  विहंगम दृश्य मिथिला के हर गाँव मे मौजूद था . जहाँ हर आदमी हर की जरूरत में शामिल था . अपने इसी गाँव को तलाशने मै काफी अरसे के बाद गाँव पंहुचा था .फोचाय मरर के कखन हरब दुख मोर हे भोला नाथ सुनने के लिए मै सुबह से ही तैयार बैठा था ... लेकिन न तो फोचाय मरर की आवाज सुनाई दी न ही कही से मवेशियों की घंटी की आवाज ,न ही कही किसानो की चहल पहल .. ढेकी और उखल न जाने कब के गायब हो चुके थे . गाँव का वह नैचुरल अम्बिंस खो गया था ..या यूँ कहे की गाँव पूरी तरह से निशब्द हो गया था . मायूसी के साथ मै उठा उस अम्बिंस को तलाशने जो मेरे दिलो दिमाग में रचा बसा था .. शायद इस भ्रम में कि विद्यापति खो गए तो क्या हुआ लोडिक सलह...

नक्सल के खिलाफ ज़ंग से पहले ही होम मिनिस्टर का यू टर्न

नक्सल आतंक के खिलाफ नवम्बर महीने से जोरदार हमले की तैयारी थी . ऑपरेशन ग्रीन हंट की तैयारी मीडिया के द्वारा छन छन कर लोगों के बीच आ रही थी . नगारे बज रहे थे मानो फाॅर्स बस्तर के जंगल में घुसेंगे और गणपति से लेकर कोटेश्वर राव तक तमाम आला नक्सली लीडरों को कान पकड़ कर लोगों के बीच ले आयेंगे . लेकिन अचानक गृह मंत्री चिदम्बरम ने इन तमाम अभियान पर पानी फेर दिया . गृह मंत्री ने कहा है ओपरेशन ग्रीन हंट मीडिया का दुष्प्रचार था . नक्सल के खिलाफ ऐसे किसी अभियान की बात सरकार अबतक की ही नहीं है . यानि कैबिनेट कमिटी ओन सिक्यूरिटी की बात एयर फाॅर्स के ऑपरेशन की बात . नक्सल प्रभावित इलाके में सेना से मदद लेने की बात .सबकुछ महज एक बकवास था खबरिया चैनल अपने मकसद के कारण ऐसी खबर चला रहे थे . सरकार के इस अभियान के खिलाफ बुद्धिजीवियों का अभियान महज एक स्टेज शो था . गृह मंत्री ने कहा है कि वे नक्सल के खिलाफ अभियान छेड़ने की बात नहीं कह रहे है बल्कि अगर इस अभियान में राज्य सरकार उनसे मदद की अपेक्षा करती है तो उन्हें मदद दी जायेगी . यानि ज़ंग से पहले ही सरकार ने नाक्साली के आगे हथियार डाल दी है . कह सकते है...