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और बुरहान तुम चले गये .....

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बुरहान तुम्हारे जाने का बहुत अफसोस है ! ठीक वैसे ही अफसोस मुझे तब हुआ था जब लोग तुम्हे कश्मीर में हिज़्ब के पोस्टर बॉय कहने लगे थे। अबतक लोग यह मानते थे कि गरीब और अनपढ़ लोग ज्यादा वल्नरेबल होते है जिन्हे कुछ चालक लोग आसानी से बरगला सकते है, लेकिन तुम तो एक पढ़े -लिखें  खानदान में पैदा लिया अच्छी तालीम पाई , स्थानीय कॉलेज के प्रिंसिपल तुम्हारे अब्बाजान मुजफ्फर अहमद वानी ने कभी सोचा भी न होगा कि अपने क्लास का टॉपर बुरहान कभी हिज़्ब का बंदूक उठा लेगा।  अफसोस इस बात को लेकर भी है कि तुम्हारे तंजीम हिज़्बुल मुजाहिदीन के सरबरा सैयद सलाहुद्दीन ने अपने किसी बच्चे को मिलिटेंट नहीं बनाया ,उन्हें बंदूक से दूर रखा और तुम ने अपने जैसे दर्जनों नौजवानों को बंदूक उठाने   के लिए  प्रेरित किया।  माना कि  तुम्हे  सोशल मीडिया/ इंटरनेट  का शौक था ,कश्मीर में इससे पहले किसी मिलिटेंट ने अपने  ग्रूप का सेल्फी फेसबुक  पर नहीं डाला था। कश्मीर में कुछ लोग तुम्हे हीरो मान  बैठे थे,और यह तुम्हारी गलतफहमी थी कि तुम सेना के साथ ...

उत्तर प्रदेश और "माया" की सियासत

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" माया" जिसे भारतीय परम्परा में कभी भ्रम तो कभी देवी दुर्गा तो कभी भगवान बुध की माता के रूप में सम्बोधित किया जाता है लेकिन सियासत में माया सिर्फ धन और भ्रम के रूप में प्रचलित है। माया जिसका  सरोकार वोट से है ,सत्ता से है ,व्यवथा से है और तथाकथित सामाजिक न्याय से भी है। यह कोई इज्म या वाद से बंधी  नहीं होती बल्कि मौके और दस्तूर से इसकी व्याख्या की जा सकती है। तो क्या उत्तर प्रदेश की मौजूदा सियासत सिर्फ माया के इर्द गिर्द घूमती है ?  मंडल- कमंडल के सियासी बवंडर का जोर कमोवेश बिहार और उत्तर प्रदेश में कायम है ,सत्ता पाने का इससे आसान तरीका इतिहास में इससे पहले कभी ईजाद नहीं किया गया था। कांग्रेस पार्टी के दिग्गज राजनेता अभी भी  इन प्रदेशों में अपनी जड़ खोजने की भरपूर कोशिश कर रहे है लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि  ऐतिहासिक भूल ने इनके जड़ो पर मट्ठा डाल दिया है। बहरहाल  माया की चर्चा करते है . ..बी एस पी के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्या पार्टी को बाय - बाय करने के साथ ही मायावती पर जोरदार आरोप लगाते है " ये दलित की नही...

क्या मोदी राजनेता हैं या फॉर्मूले का पैकेज !

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मोदी सरकार पास या फेल ! पिछले एक हफ्ते से इस सवाल का हल ढूंढने में मीडिया एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है। लेकिन मूल सवाल पीछे छूट जाता है कि मोदी सरकार कौन सी परीक्षा दे रही है  ? सवाल यह भी फेहरिस्त से बाहर है कि क्या ऐसे ही सवाल देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों के लिए भी पूछा गया था ... अगर नहीं तो सिर्फ मोदी के लिए ही क्यों ? सवाल केजरीवाल भी पूछ रहे है ,नीतीश ,लालू और कांग्रेस के हर नेता पूछ रहे हैं जो मोदी से अपने को बेहतर मानते हैं।यानि देश को यह बताया जा रहा है कि "कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली " पिछले एक दशक में इस मुल्क ने भले ही जी डी पी ग्रोथ का आंकड़ा डबल डिजिट को छू लिया हो लेकिन राजनेता या राष्ट्रीय नेता के तौर पर उसे फुके कारतूस ही मिले, क्षेत्रीय क्षत्रपों और जातीय सरगनाओं की महत्वकांक्षा  इस दौर में राष्ट्रीय क्षितिज पर छा जाने की है  , सेक्युलर गठबंधन से लेकर त्याग और विरासत के कई फॉर्मूले सामने आये लेकिन देश को राष्ट्रीय नेता के रूप में न तो इंदिरा मिली न ही अटल।  न ही लोहिया मिले न ही नम्बूदरीपाद। . यह दौर ऐसा था जिसमे सत्ता और अपनी ...

मोदी को हराने के लिए भौकने से काम नहीं चलेगा ....

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दिल्ली के मुख्य्मंत्री अरविन्द केजरीवाल को प्रधानमंत्री मोदी  की शैक्षणिक योग्यता की जानकारी चाहिए ,क्यों चाहिए इसका   आर टी आई में खुलासा नहीं है ,लेकिन CIC ने   तुरंत जानकारी देने के लिए कहा है। कांग्रेस के नेताओं के लिए यह बड़ा मुद्दा है कि देश को यह जानना जरूरी है कि मोदी इंदिरा जी से ज्यादा पढ़े है या राहुल से कम। इस देश में आजतक किसी मंत्री और प्रधानमंत्री की योगयता के लिए सवाल नहीं पूछे गए ,,बजह ! शैक्षणिक योगयता इनके लिए अपेक्षित नहीं है। वैसे प्रधानमंत्री मोदी एम ए   प्रथमश्रेणी से उत्तीर्ण है ऐसा गुजरात यूनिवर्सिटी का दावा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि मौजूदा हालत में देश जिन समस्यायों से गुजर रहा है ,सूखे की चपेट में ७ राज्य के ११ करोड़ से ज्यादा लोग पानी के लिए तरस रहे हैं.. प्रति दिन ४ किसान आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या कर रहे है ,मंदी के कारण बेरोजगारों को नौकरी नहीं मिल रही है।  देश के प्रधानमंत्री को सवाल पूछने के बजाय हमारे सांसद अपने आका को खुश करने के लिए बे सिरपैर के तर्क गढ़ रहे है।   सियासी  बहस प्रधानमंत्री की य...

बीजेपी का यह राष्ट्रवाद किस काम का

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" द पार्टी विद  ए डिफरेंस " वाली बीजेपी ३६ साल की हो गयी है यानी ३६ साल के इस सफर में बीजेपी को श्यामा प्रसाद मुखर्जी ,दीनदयाल उपाध्याय ,अटल बिहारी वाजपेयी ,लाल कृष्ण आडवाणी जैसे प्रखर नेताओं का नेतृत्व मिला। लेकिन राष्ट्रवाद को लेकर जितनी चर्चा बीजेपी की आज है उतनी कभी नहीं हुई। कश्मीर में दो विधान दो निशान का विरोध करने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने क्या इसलिए बलिदान दिया था कि अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी कश्मीर में सरकार बना सके। क्या बीजेपी का यही राष्ट्रवाद था कि तिरंगा के सम्मान में खड़े नौजवानों को उनकी ही सरकार में पुलिस की बेरहमी का शिकार होना पड़े।  आज अगर एन आई टी के नौजवान भारत की अस्मिता और तिरंगे के सम्मान के खातिर लाठी खा रहे है तो बीजेपी का यह राष्ट्रवाद किस काम का। भारत के टुकड़े टुकड़े होंगे और आज़ादी का नारा लगाने वाले जे एन यू के तथाकथित सेक्युलर नौजवानों को इसी देश के मीडिया और बुद्धिजीवी लोगों ने हीरो बनाकर पेश किया है लेकिन कश्मीर का वाकया न तो मीडिया के लिए और न ही बुद्धिजीवियों को शर्मसार कर रहा न ही सरकार इसमें ज्यादा प्रचार चाहती है। ...

अब मैं कन्हैया हो गया हूँ......

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मै हूँ अन्ना ,मैं हूँ केजरिवाल अब मैं कन्हैया हो गया हूँ। .. लेकिन मैं कभी ललितपुर का लोटन नहीं बनना चाहता हूँ  और  न ही  बुंदेलखंड और  नागपुर   के मंगतू राम जैसे हज़ारो किसानो में मेरी कोई  दिलचस्पी है जो महज पचास हज़ार कर्ज न चुकाने के कारण आत्महत्या कर लेता है..मैं आज  कन्हैया इसलिए हूँ कि वह मोदी को गरिया रहा है कल मैं केजरीवाल इसलिए था क्योकि वह मनमोहन सिंह को चोर कह रहा था....मीडिया में आज  सिर्फ"" आज़ादी" की खबरे छप रही है  मानो कुछ संपादको को गांधी के रूप में कन्हैया मिल गए   हो और वर्षो से गुलामी के बेड़ियों में जकड़े टीवी के स्वनामधन्य संपादको को खुली हवा में साँस लेने का मौका मिल गया हो। मीडिया में कही मोदी के समर्थन में जे एन यु के अति उत्साहित छात्रों को राष्ट्रद्रोही बताया जा रहा है तो कही   कुटिल संपादको की फौज जिन्हे मोदी और उनकी सत्ता से चिढ है वे इसे hight ऑफ़   इंटॉलरेन्स बता रहे है.. . एक गरीब माँ का बेटा कन्हैया जिसे आज मीडिया स्टार बता रहा है और लोगों को मानने के लिए विवश भी ...

मोदी सरकार के इक़बाल पर सवाल

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उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से बीजेपी "मिशन यू पी " की शुरुआत कर रही है... कही से भी करे ये पार्टी  का मामला है ,लेकिन बलरामपुर क्यों ? शायद इसलिए कि बलरामपुर का सरोकार अटल जी से रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी ने  इसे अपना कर्मभूमि माना था और यही से पहला लोकसभा चुनाव लड़ा था । लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में न तो अटल की चर्चा थी ,न ही आडवाणी की और न ही पंडित दीनदयाल की.... सिर्फ मोदी। .इसी मोदी को आगे करके पार्टी ने केंद्र  सहित 7 राज्यों में सरकार बनाली ,लेकिन आज अलग अलग राज्यों में अलग अलग आदर्श और नाम ढूंढे जा रहे है, तो क्या मोदी की चमक फीकी पड़  रही है या यूँ कहे की  मोदी सरकार का इकबाल कमजोर हो  रहा है ? क्या इसके लिए देशी-विदेशी एन जी ओ जिम्मेदार है ? मोदी सरकार की जन - धन और फसल बीमा योजना इस दशक का सबसे बड़ा रेफोर्मेशन माना जा सकता है लेकिन अगर चर्चा सिर्फ जे एन यू  के देश भक्त और देश द्रोही की हो रही है तो माना जा सकता है कि सरकार दिशाहीन है।  बीजेपी के एक विधायक  यूनिवर्सिटी में शरा...