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मीडिया : हम भी हैं पत्रकार

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कुत्ता पालो ,बिल्ली पालो ,कुछ भी पालो लेकिन गलतफेहमी मत पालो। दरअसल टीवी मीडिया में सम्पादकों ने अपने को लार्जर देन लाइफ पेश कर अपने को सेलिब्रेटी बना लिया है। और इस ग़लतफ़हमी में कुछ टीवी संपादक /एंकर ने जीने की आदत डाल ली है कि वे जब कुछ बोलते हैं तो पूरा देश सिर्फ उन्ही को सुन रहा है। मानो देश इतनी फुर्सत में है कि लोग या तो टीवी देखते हैं या सिर्फ सोशल मीडिया पर एक्टिव है। कोई गला फाड़ के चिल्ला रहा है तो कोई फ्लोर डांस करते हुए अलग अलग भाव में खबर बेच रहा है तो कोई संपादक उपदेशक की मुद्रा में देश को स्कूली बालक समझ कर एजेंडा परोस रहा है। हालात यह है कि संपादक /एंकर और पार्टी प्रवक्ता में विभेद करना मुश्किल है। गाँधी जी ने कहा था स्वस्थ , जांची परखी सूचना ,संतुलित आलोचना सार्बजनिक जीवन में ओज़ोन लेयर का काम करती है। जाहिर है इस कसौटी पर आज एक भी संपादक खड़े नहीं उतर पाएंगे। कारण संस्थागत कम व्यक्तिगत ज्यादा है। आपातकाल के निर्णय को कभी सही बतानेवाले महान संपादक खुशवंत सिंह को अपने ऑफिस घुसने की इजाजत गार्ड ने नहीं दी और उन्हें बताया गया कि उनकी सेवा समाप्त कर दी गयी है। ऐसी स्थित ...

चुनावी एजेंडे में गुम हो रही है नए भारत की कहानी

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आज के दिन देश के 4 लाख गाँव खुले में शौच से मुक्त हो चुके हैं। अबतक देश के 417 जिले और 19 राज्यों ने भी खुले में शौच से मुक्ति का एलान कर दिया है।  भारत के लगभग 90 फीसद भूभाग पर स्वच्छ भारत अभियान ने किला फतह कर लिया है। लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि इसमें सरकार के 12000 रूपये से ज्यादा सहयोग 95  वर्ष की कुंवर बाई  की है जिसकी प्रेरणा से उनका  पूरा गाँव ओ डी एफ हो गया। बिहार के सीतामढ़ी के गाँव में 12 -15 साल  क़े किशोरों की टोली ने सीटी बजाकर  लोगो को खुले में शौच जाने की गन्दी आदत को छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। वही डीएम रंजीत कुमार जिले में  स्वच्छाग्रही बनकर हर घर में शौचालय निर्माण को संभव बनाया। सुबह सवेरे सड़क के किनारे गश्त लगाकर बैठे डीएम को लोगों ने भले ही न पहचाना हो लेकिन बिहार के इस पिछड़े जिले में लोगों ने उनकी बात सुनी और सीतामढ़ी बिहार का पहला ओ डी  एफ  जिला बन गया । ऐसे अनेको कहानियाँ है जिसने स्वच्छ भारत अभियान को विश्व का सबसे असरदार  बेहेवियर चेंज का  आंदोलन बना दिया है उसमे आपके घर के बच्चो...

कश्मीर मसला या पावर शेयरिंग फार्मूला

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यह सवाल आम हिंदुस्तानी के मन में जरूर उठता है कि कश्मीर का मसला क्या है। जितना मैं समझ पाया हूँ कि वर्षो पहले कुछ नेताओं ने जो गांठ हाथों से लगायी थी मौजूदा पीढ़ी को वह गांठ दातों से खोलना पड़ रहा है। भारत के सबसे प्राचीन ऐतिहासिक ग्रन्थ राजतरंगनी के रचयिता कल्हण को भी शायद इस बात का इल्म नहीं रहा होगा कि जिस कश्मीर के चश्मे से वे भारत की सामजिक और राजनितिक व्यवस्था को झांक रहे हैं वह कश्मीर कभी अपने को अलग सामाजिक संरचना मानकर भारत की अस्मिता पर सवाल उठाएगा । या फिर 14 वी शदी के ऋषि परंपरा में कश्मीर के शेख उल आलम या नुंद ऋषि हो या फिर लल डेड या लल्लेश्वरी। भारत को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत करके कश्मीर के महान सूफी संतो और ऋषियों ने मजहबी दकियानूसी को हमेशा ख़ारिज किया। फिर वह कौन सा दौर था जिसमे कश्मीर की हजारो साल की परंपरा गौण हो गयी और व्यक्तिगत महत्वाक्षा ने कश्मीर को मसाला बना दिया। हालात यह है कि जावेद अहमद डार ,औरंगजेब ,उमर फ़ैयाज़ जैसे दर्जनों कश्मीरी नौजवान देश की अस्मिता की रक्षा में जान दे रहे हैं वही उसी कश्मीर में कुछ नौजवान बुरहान वानी बन बन्दुक उठा रहे है तो क...

सामाजिक न्याय के नए युवराज और ग्राम स्वराज

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बाबा नागार्जुन का  जन्मदिन 30 जून किसके लिए महत्वपूर्ण है किसके लिए नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है लेकिन आज़ादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी गाँव ,गरीब ,मजदूर की हालत कितनी  बदली है यह आज भी एक बड़ा सवाल है। 50 साल पहले बाबा जिस सिस्टम की बात अपनी कविता में कर रहे थे  वह कितना बदल पाया है : सपने में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे, भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे! माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का, हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का!   मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को  ... तो क्या  गाँव सचमुच आज भी  मेहनतकश किसान /मजदूरों को  दो जून की रोटी जुटाने की जुगत नहीं जोड़ पाया। मौजूदा सरकार की ग्राम स्वराज अभियान ने कमोवेश इसी सच से पर्दा उठाने का काम किया है।   जिला रोहतास का प्रखंड नौखा ,दिल्ली से आये नोडल ओफिसर अत्यानन्द  गांव वालो से पूछते है कितने लोगों को अबतक घर नहीं मिला है ?सबने हाथ उठाया ,कितने घरों में शौचालय है ?एक भी घर में  नहीं . बिजली क्यों नहीं आयी . स्थानीय प्रश...

"यही तो रोना है कश्मीर में कोई नयी बात नहीं बोल रहा है"

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जीना हो तो मरना सीखो गूँज उठे यह नारा - केरल से करगिल घाटी तक सारा देश हमारा  ..एक नारा कश्मीर में सरहद पार से भी प्रायोजित हुआ  कश्मीर बनेगा पाकिस्तान मीट के रहेगा हिंदुस्तान। तो क्या एक ऐतिहासिक भूल ने कश्मीर को समस्या बना दिया है और लगातार इंसानी जाने जा रही है।   डॉ. श्यामाप्रसाद मुख़र्जी की रहस्मयी मौत पर दुःख व्यक्त करते हुए  तात्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने   कहा था   जब बड़ी गलतियां की जाती हैं, तब इस उम्मीद में चुप रहना अपराध है कि एक-न-एक दिन कोई सच बोलेगा"  .. और यह सच बोलने की हिम्मत श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दिखाई और बिना परमिट लिए    एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान, नहीं चलेगा- नही चलेगा के नारे के साथ कश्मीर में दाखिल हो गए   थे। मुश्किल यह है कि आज भी 65 साल बीत जाने के बाद भी  कोई सच बोलने की हिम्मत नहीं दिखा रहा है।  दिल्ली स्थित सैयद अली शाह गिलानी के घर से लौटते वक्त मुझे उनका एक रिश्तेदार मिला पूछा क्या खबर लेकर जा...

शुजात बुखारी हम शर्मिंदा हैं .... भारत इनदिनों टीवी गुरुओं के प्रवचनों से थोड़ा कंफ्यूज है

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क्या कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या खौफ के सौदागरों की वही पुरानी रणनीति का हिस्सा रही है जिसमे अबतक आधे दर्जन पत्रकार मारे गए हैं ? पिछले दिनों स्पाई क्रॉनिकल (भारत पाकिस्तान के दो टॉप जासूसों ) के बुक लॉंच पर मैंने शुजात बुखारी में एक निर्भीक पत्रकार की छवि देखी थी। पूर्व मंत्री और बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा, दिग्गज सियासी लीडरों के पैनल को बता रहे थे की "दरअसल भारत सरकार की नाकामी के कारण कश्मीर में हालात बिगड़ी है। हिज़्ब कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से नौजवान उत्तेजित हैं और वे आतंकवादी बन रहे हैं।" शुजात बुखारी ने उन्हे याद दिलाया कि "कश्मीर की समस्या दिल्ली की अनदेखी की समस्या है जो पिछले 40 साल पुरानी बिमारी बनी हुई है। रही बात हिंसा की तो यह सिलसिला अफ़ज़ल भट की फांसी के बाद ही तेज हुई थी। कुछ नौजवानो ने अफ़ज़ल व्रिगेड बनाकर जमकर आतंक मचाया था और आज भी सक्रिय हैं " पूर्व रॉ चीफ दुल्लत और साबिक आई एस आई चीफ दुर्रानी के "स्पाई क्रॉनिकल" बुक को लांच करने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ,फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ,पूर्व उपराष्ट्रपति हामि...

श्यामा प्रसाद मुखर्जी के दरबाजे पर प्रणब दा की दस्तक

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बारे में देश का नजरिया कैसा हो यह तय करने का अधिकार अबतक कांग्रेस ने संभाल रखी थी। वसुधैव कुटुंबकम के आदर्श को मानने वाले इस देश में कांग्रेस की सेकुलरिज्म कश्मीर में क्यों फेल हुई तो कारण पाकिस्तान और आई एस आई को बताया गया । इसे सत्ता तक पहुँचने का फार्मूला मानकर वामपंथियों ने भी नजरिये के खेल में खूब हाथ धोया और भारत को देश के बदले सराय बना डाला । दो बड़े दिग्गज विद्वान् जब इस राष्ट्रवाद और लोकतंत्र पर चर्चा करने एक मंच पर खड़े हुए तो सबसे ज्यादा निराशा नज़रिये वालो में देखा गया। जिस देश के हज़ारो वर्ष की परम्परा में संवाद उसकी आत्मा रही है ,विचारो को लेकर शाश्त्रार्थ सामजिक अनुशासन रहा है। उस देश को सराय मानने वाले लोग अपनी अपनी मर्यादा भूलकर पूर्व राष्ट्रपति और मोहन भागवत जी के खिलाफ अनर्गल बयानवाजी कर रहे हो तो माना जायेगा कि वो संविधान संशोधन करके देश को सेक्युलर बना सकते है लेकिन देश के लोकतंत्र और धर्मनिर्पेक्षता में उन्हें कोई आस्था नहीं है। वह कौन सा सेकुलरिज्म और लोकतंत्र था जिसके कारण संघ के एक स्वयंसेवक श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक देश एक विधान ...