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डिमोनेटाइजेशन : सबका साथ सबका विकास

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2016  आपके जीवन में क्यों महत्वपूर्ण रहा ,इसके कई व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन यह देश के लिए क्यों महत्वपूर्ण बना ,इसकी वजह भी व्यक्तिगत ही है। पिछले 30 वर्षो में सत्ता परिवर्तन आने जाने का ऐसा सिलसिला बना कि किस किस को याद कीजिये ,किस किस को रोइये। .आराम बड़ी चीज है मुँह ढक के सोइये। लेकिन 2016  ने ऐसा मौका नहीं दिया। नोटबंदी का ऐलान , 50 दिनों का संघर्ष और पीएम मोदी की कामयाबी इसे ऐतिहासिक बना दिया। क्या यह कामयाबी पी एम् मोदी की थी जिसने चीफ जस्टिस जे एस ठाकुर के दंगे की आशंका को निराधार साबित किया  या फिर उन सबा सौ करोड़ जनता की जिसने पी एम् मोदी के डेमोनेटाइजेशन पर  यकीन किया . .  नोटबंदी के  दौर  में एक सियासी फैमिली ड्रामा उत्तर प्रदेश में भी चल रहा था ,राजनीतिक पंडितो ने मोदी के नोटबंदी के फैसले को आगामी विधान सभा चुनाव से भी जोड़ा। लेकिन आख़िरकार लोगों को लगा कि सपा के  ड्रामा में सबकुछ था लेकिन क्लाइमेक्स कभी नहीं आया ,लेकिन नोटबंदी इस दौर में ऐसा फैमिली सीरियल बना जिसमे हर उम्र ,वर्ग ,सम्प्रदाय टीवी न्यूज़...

,राहुल गाँधी को अभी इंदिरा को समझना बेहतर होगा।

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" मेरा देश बदल रहा है " .या यूं कहे  पिछले 30 वर्षों में पहलीबार कोई स्लोगन आगे बढ़ रहा है। 70 के दशक में इंदिरा गाँधी का गरीबी हटाओ का समाजवादी नारा जन जन तक प्रचारित हुआ इसके पीछे इंदिरा  के बातों पर लोगों को भरोसा था, उनके इरादे पर लोगों को यकीन था। 1969 में उन्होंने अपने विरोधियों (सिंडिकेट) के खिलाफ मास्टर स्ट्रोक चलते हुए बैंक नॅशनॅलिजेशन की घोषणा की तो जिनका बैंको से कभी दूर दूर तक सरोकार नहीं था, वे दिल्ली के चांदनी चौक पर हज़ारों की संख्या में जमा हो गए ,मानो 14 बड़े  बैंकों में रखे अरबो रूपये  उनके हिस्से में ट्रांसफर होने वाला है । ये अलग बात थी कि अगले 50 वर्षो में इस भीड़ का बैंक से कोई सरोकार नहीं जुड़ा। आम आदमी को जन धन एकाउंट ने पहलीबार बैंक से  मुखातिब किया। तो क्या  मोदी इंदिरा जी के नक्से कदम पर आगे बढ़ रहे हैं या इंदिरा के बाद मोदी पहला प्रधानमंत्री हैं जिनके नियत  पर देश को कोई शंका नहीं है। बैंक नॅशनॅलिजेशन के बाद नोटबंदी पहली ऐसी घटना या सियासी फैसला है जिसमे  आम आदमी एक भरोसे के साथ  जुड़ा है।  ...

नोटबंदी : सबका कारण व्यक्तिगत है ?

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नोटबंदी का आर्थिक लाभ / हानि  १० दिनों के बाद दिखने को मिल सकते हैं। लेकिन इसका सियासी फायदा किसको मिला है और मिलेगा यह कहना अभी मुश्किल हैं। लेकिन क्या प्रधानमंत्री मोदी ने यह फैसला सियासी लाभ के लिये लिया   था ? तो कहा जा सकता है बिलकुल नहीं। करप्शन के खिलाफ, कालाधन के खिलाफ अभियान अगर चुनावी मुद्दा हो सकता था तो पिछले 70 सालों में यह मुद्दा कई बार आजमाया गया होता। अगर इंदिरा जी ने चुनावी सियासत में नोटबंदी को  अव्यवहारिक माना था। तो माना जा सकता है कि वे इस देश के जनमानस के चरित्र को बेहतर समझती थी। अपनी काबिलयत और क्षमता को साबित करने के लिए इंदिरा जी 1971 में पाकिस्तान के साथ  जंग जरूर लड़ ली लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने कोई अभियान नहीं चलाया।  रही बात मोदी जी की  तो जिनका चिंतन और कार्य फकीरी से शुरू होकर निष्काम कर्म पर ख़त्म होता है उसे चुनाव की चिंता क्या बिगाड सकती है।  पिछले  70 वर्षो में देश  में ऐसी कोई घटना नहीं थी जिसमे मुल्क के  जनमानस को  व्यक्तिगत रूप से प्रभावित किया हो। ...

केंद्रीय सेवा का इम्तिहान एक समान तो फिर शिक्षा क्यों न हो एक समांन

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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर जम्मू कश्मीर में स्कूल की बदहाली पर एक बार फिर भावुक हो   उठे , उनका मानना है कि सिर्फ शिक्षा से ही विकास संभव है जो जम्मू कश्मीर में हो नहीं रहा है । पिछले साल  इलाहाबाद उच्च न्यांयालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में सभी अधिकारियों और मंत्रियों के  बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाने का आदेश यू पी के समाजवादी सरकार को दिया था। समाजवाद की बात करने वाली सरकार सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह कर अभी तक उस फैसले को टाल रही है। यह वही देश है जहां टॉप ब्यूरेक्रेट के बच्चों को पढ़ने के लिए 1 रूपये में कई एकड़ जमीन  राजधानी दिल्ली में  लीज पर दी जाती है। यह वही देश है जहाँ बच्चो को स्कूल में पोशाक मिल जाते हैं लेकिन किताब नहीं। यह वही देश है जहाँ संसद में स्कूल के मीड डे मील घोटाले की  चर्चा होती है लेकिन जर्जर शैक्षणिक व्यवस्था पर कोई नहीं बात करता।  एक देश सैकड़ो सिलैबस ,कोई बरगद के नीचे पढ़ रहा है कोई सेंट्रलाइज़ड ऐ सी वाले स्कूल में। लेकिन कॉम्पेटीशन एक समान  ,केंद्रीय सेवा का इम्तिहान एक ...

रूपये का एयर फ्लाइंग

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दुनिया में तीन तरह के लोग होते  हैं एक वे जो जन्मजात  ईमानदार होते हैं ,एक वो जिनकी फितरत में बेईमानी  है एक तीसरा भी है जो परिस्थिति के अनुरूप संकल्प बदलता  हैं।  कालेधन के खिलाफ अभियान में सबसे ज्यादा बेचैनी  दूसरे नंबर के लोगों में ज्यादा है ये बात अलग है कि ईमानदार बनने की कोशिश में लगे आम आदमी को भी इस दौर में नोटबंदी ने मुश्किलें बढ़ा दी  है।   जनधन योजना और उसकी सफलता विफलता पर खूब चर्चा हुई। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हुई कि ज़ीरो बैलेंस के इन खातों की किश्मत कैसे बदलेगी।  लेकिन नोटबंदी के बाद पिछले एक हफ्ते में इन खातों में 21000 करोड़ रुपया जमा होना एक नयी हलचल की ओर इशारा करती है। जनधन के 25ooo एकाउंट्स की किश्मत कैसे पलटी यह आईटी के लोगों के लिए उत्सुकता का विषय हो सकता है लेकिन पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में इन अकाउंट्स में बढ़ी हलचल ने ब्लैक एंड व्हाइट पर छिड़ी बहस को तेज कर दिया है।  चार्टर्ड प्लेन से मंगलावार को नागालैंड के दिमापुर एयरपोर्ट पर  पहुंचा करीब 4 करोड...

नोटबंदी : देश में सियासत के तर्क और अर्थ दोनों बदल जाएंगे

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कालेधन के खिलाफ अभियान  को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश  कुमार शेर की  सवारी मानते हैं ,वे मानते हैं कि मोदी सरकार के इस फैसले से जनसमूह की भावना जुडी हुई है।ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी लगभग ऐसा ही विचार रखते हैं  लेकिन नीतीश जी के सत्ता के साथी  लालू जी माया ,मुलायम , ममता  ,केजरीवाल और कांग्रेस के साथ खड़े  है। ममता जी के बंगाल में नोटबंदी के खिलाफ एक भी रैली सामने नहीं आयी है न ही लोगों का विरोध केरल,कर्नाटक,नार्थ ईस्ट के राज्यों और त्रिपुरा से सुना गया है. ममता दिल्ली में केजरीवाल के साथ रैली कर रही है तो कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक  दल संसद के अंदर प्रदर्शन कर रहे हैं। विमुद्रीकरण के बाद असल बात तो यह है कि आज अपनी सियासत जिन्दा रखने  के पीछे लीडरों के पास  सही तर्क नहीं है ।यही वजह है कि संसद के अंदर और बहार विरोध करने वालों की अलग अलग जमात हैं। देश के आम अवाम राष्ट्रहित में इसे एक बड़ा फैसला मानकर  एटीएम /बैंक के लाइन में खड़े है, हालाँकि अब जमीनी हालात मे...

अगला नोबेल पीस प्राइज़ क्या भारत आयेगा ?

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अगला नोबेल पीस प्राइज़ क्या भारत आयेगा ? बहुत ही सरल सवाल पूछ कर सुप्रीम कोर्ट ने देश के एक जटिल सवाल की ओर लोगों का ध्यान दिलाया है।  पिछले 50  वर्षो से मार्क्सिस्ट गुरिल्ला आतंक से लहुलहान कोलंबिया ने बामपंथी अतिवादियों से पीस डील करके इन्शानियत को नयी फ़िज़ा में सांस लेने का मौका दिया है। कोलंबिया में बामपंथी अतिवादियों की हिंसा में दो लाख साठ हजार लोग मारे गए और ६ लाख से अधिक ग्रामीण लोगों को  पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था।  जाहिर है कोलंबिया के प्रेसिडेंट जॉन मानुएल सांतोस को इस महान समझौते के लिए  सर्वश्रेष्ठ पीस प्राइज़ नोबेल प्राइज से सम्मानित किया गया। सुप्रीम कोर्ट का सवाल अपने आप में गंभीर है क्या जॉन   मानुएल सांतोस के महान कार्य को भारत में दोहराया नहीं जा सकता ? क्या भारत के विभिन्न प्रान्तों में जारी हिंसक आंदलोनों से संवाद का तार नहीं जोड़ा जा सकता ? इस देश की व्यवस्था ,बुद्धिजीबी और जन साधारण क्या इस चुनोती को स्वीकार करेंगे ? कश्मीर में पिछले 25 वर्षों से जारी अतिवादी हिंसा का स्वरूप माओवाद हिंसा से ...