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रूपये का एयर फ्लाइंग

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दुनिया में तीन तरह के लोग होते  हैं एक वे जो जन्मजात  ईमानदार होते हैं ,एक वो जिनकी फितरत में बेईमानी  है एक तीसरा भी है जो परिस्थिति के अनुरूप संकल्प बदलता  हैं।  कालेधन के खिलाफ अभियान में सबसे ज्यादा बेचैनी  दूसरे नंबर के लोगों में ज्यादा है ये बात अलग है कि ईमानदार बनने की कोशिश में लगे आम आदमी को भी इस दौर में नोटबंदी ने मुश्किलें बढ़ा दी  है।   जनधन योजना और उसकी सफलता विफलता पर खूब चर्चा हुई। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हुई कि ज़ीरो बैलेंस के इन खातों की किश्मत कैसे बदलेगी।  लेकिन नोटबंदी के बाद पिछले एक हफ्ते में इन खातों में 21000 करोड़ रुपया जमा होना एक नयी हलचल की ओर इशारा करती है। जनधन के 25ooo एकाउंट्स की किश्मत कैसे पलटी यह आईटी के लोगों के लिए उत्सुकता का विषय हो सकता है लेकिन पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में इन अकाउंट्स में बढ़ी हलचल ने ब्लैक एंड व्हाइट पर छिड़ी बहस को तेज कर दिया है।  चार्टर्ड प्लेन से मंगलावार को नागालैंड के दिमापुर एयरपोर्ट पर  पहुंचा करीब 4 करोड...

नोटबंदी : देश में सियासत के तर्क और अर्थ दोनों बदल जाएंगे

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कालेधन के खिलाफ अभियान  को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश  कुमार शेर की  सवारी मानते हैं ,वे मानते हैं कि मोदी सरकार के इस फैसले से जनसमूह की भावना जुडी हुई है।ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी लगभग ऐसा ही विचार रखते हैं  लेकिन नीतीश जी के सत्ता के साथी  लालू जी माया ,मुलायम , ममता  ,केजरीवाल और कांग्रेस के साथ खड़े  है। ममता जी के बंगाल में नोटबंदी के खिलाफ एक भी रैली सामने नहीं आयी है न ही लोगों का विरोध केरल,कर्नाटक,नार्थ ईस्ट के राज्यों और त्रिपुरा से सुना गया है. ममता दिल्ली में केजरीवाल के साथ रैली कर रही है तो कांग्रेस सहित दूसरे राजनीतिक  दल संसद के अंदर प्रदर्शन कर रहे हैं। विमुद्रीकरण के बाद असल बात तो यह है कि आज अपनी सियासत जिन्दा रखने  के पीछे लीडरों के पास  सही तर्क नहीं है ।यही वजह है कि संसद के अंदर और बहार विरोध करने वालों की अलग अलग जमात हैं। देश के आम अवाम राष्ट्रहित में इसे एक बड़ा फैसला मानकर  एटीएम /बैंक के लाइन में खड़े है, हालाँकि अब जमीनी हालात मे...

अगला नोबेल पीस प्राइज़ क्या भारत आयेगा ?

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अगला नोबेल पीस प्राइज़ क्या भारत आयेगा ? बहुत ही सरल सवाल पूछ कर सुप्रीम कोर्ट ने देश के एक जटिल सवाल की ओर लोगों का ध्यान दिलाया है।  पिछले 50  वर्षो से मार्क्सिस्ट गुरिल्ला आतंक से लहुलहान कोलंबिया ने बामपंथी अतिवादियों से पीस डील करके इन्शानियत को नयी फ़िज़ा में सांस लेने का मौका दिया है। कोलंबिया में बामपंथी अतिवादियों की हिंसा में दो लाख साठ हजार लोग मारे गए और ६ लाख से अधिक ग्रामीण लोगों को  पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था।  जाहिर है कोलंबिया के प्रेसिडेंट जॉन मानुएल सांतोस को इस महान समझौते के लिए  सर्वश्रेष्ठ पीस प्राइज़ नोबेल प्राइज से सम्मानित किया गया। सुप्रीम कोर्ट का सवाल अपने आप में गंभीर है क्या जॉन   मानुएल सांतोस के महान कार्य को भारत में दोहराया नहीं जा सकता ? क्या भारत के विभिन्न प्रान्तों में जारी हिंसक आंदलोनों से संवाद का तार नहीं जोड़ा जा सकता ? इस देश की व्यवस्था ,बुद्धिजीबी और जन साधारण क्या इस चुनोती को स्वीकार करेंगे ? कश्मीर में पिछले 25 वर्षों से जारी अतिवादी हिंसा का स्वरूप माओवाद हिंसा से ...

चिनगारी का खेल बुरा होता है...

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चार बांस चौबीस गज ,अंगुल अष्ट प्रमान  ता ऊपर सुल्तान है ,चुको मत चौहान....चंदबरदाई ने यह संकेत  पृथ्वीराज को महमूद गोरी को मारने के लिए दिया था और अंधे कर दिए जाने के वाबजूद चौहान आतंकी सुल्तान का खात्मा कर दिया था। यह बीरो की धरती है यहाँ नगारे बजा के जंग नहीं लड़ी जाती ,यह इस देश का स्वाभिमान है कि वह अपनी लड़ाई खुद लड़ लेता है। इंडिया फर्स्ट लोगों ने यह  सीख किसी राजनेता से नहीं ली है बल्कि यह इसके स्वाभाव में है चाहे वह किसी जाति और मजहब से हो। फिर वर्षो से जारी पाकिस्तान के अघोषित युद्ध का जवाब हम क्यों नहीं ढूढ पाते ?  इस उहापोह की स्थिति में राष्ट्र कवि दिनकर जरूर याद आते है   "ये देख गगन मुझमे लय है ये देख पवन मुझमे लय है,मुझमे विलीन झनकार सकल मुझमे लय है संसार सकल,अमरत्व फूलता है मुझमे,संहार झूलता है मुझमे..याचना नहीं अब रण होग.... . जीवन जय या की मरण होगा.अटल बिहारी वाजपेयी दिनकर जी के बड़े प्रशंसक थे ..युद्ध की ऐसी स्थिति अटल जी के सामने भी आयी लेकिन उन्होंने पाकिस्तान के लिए अलग तर्क गढ़ा...  इसे मिटाने की साजिश करने वा...

हमें चाहिए इस कश्मीर से आज़ादी.

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इंसानियत ,जम्हूरियत ,कश्मीरियत के घिसे पिटे दर्शन के साथ वादी पहुंची सांसदों की  हाई प्रोफाइल टीम ठीक वैसी ही थी जैसी गोरखपुर में हर साल ब्रेन फीवर से २००-४०० बच्चो की मौत के बाद देशी-विदेशी एक्सपर्ट टीम वहां  पहुँचती है।  न तो आजतक पूर्वांचल के ११ जिलों में  इनशेफलाइटिस फैलने की वजह तलाशी गयी न ही कश्मीर में  रोग को ढूंढा गया कि ये पत्थर चलानेवाले कौन लोग है और इनकी बीमारी क्या है ? हरबार की तरह इस बार भी कुछ  बुद्धिजीवी और विवेकशील सांसद हुर्रियत लीडरों से मिलकर अपनी प्रखर भूमिका चाहते थे ,लेकिन पथरवाजों के डर से हुर्रियत के लीडरों ने फोटो ओप का मौका नहीं दिया। पथरवाजो का नारा है "हम क्या चाहते आज़ादी किससे आज़ादी यह साफ़ नहीं है लेकिन 58   दिन से बंद -हड़ताल और कर्फ्यू से पीड़ित लोगों को पूछिये वो मांग रहे हैं हमें चाहिए इस कश्मीर से आज़ादी।    मीडिया में खबर सिर्फ पिलेट गन की होती है ,कश्मीर पर तथाकथित जानकार अलगाववादी लीडरों से बातचीत की  पुरजोर सलाह देते है और हुकूमत चार्वाक दर्शन को मानकर अँधेरा छटने का इंतज़ार क...

कश्मीर पर बकैती नहीं , बात कीजिये

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क्या कश्मीर के नौजवाब   बुरहान वानी  की मौत से इतना  खफा है कि वे स्टोन ऐज में लौट आया है ? क्या अलगाववादी ग्रुप वाकई हाउस अरेस्ट हैं और पिछले ४४ दिनों   से   बंद हड़ताल खेल रहे है ? क्या मकामी हुकूमत वाकई नौजवानों के पत्थर से घबराई हुई है और कर्फ्यू का कबच   ओढ़ रखी है।  क्या साबिक मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्लाह कश्मीर के हालात को लेकर वाकई गंभीर है ? कश्मीर में सवाल   ढूंढने जाएंगे तो जवाब कम सवाल ज्यादा मिलेंगे।   कौन है ये नौजवान जिन्होंने इस्लाम को जाना नहीं लेकिन उन्हें इस्लाम पर खतरा नज़र आ रहा है , उनके साथ जो पत्थर नहीं उठा रहा वह काफ़िर है।  क्या ५० से ज्यादा मासूमो की मौत से इन नौजवानों को जरा भी अफ़सोस है ? छोटे छोटे बच्चो के हाथ पत्थर पकड़ा कर वो किस्से बदला ले रहे है ?    हम क्या चाहते आज़ादी जैसे चंद जुमले उन्हें   इसलिए याद है क्योंकि उन्हें  पता है कि अब्बाजान की जबतक कमाई है तबतक भोजन  सुरखित है। इसमें कोई दो राय  नहीं कि यहाँ बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या है लेकिन ...

कश्मीर क्या सचमुच मसला है ?

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90 के दशक में "स्काई  इज द लीमिट " का फार्मूला देकर  पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने कश्मीर मसले के हल के लिए शानदार पहल की थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने एक कदम आगे बढ़कर बातचीत को इंसानियत के दायरे में लाने की कोशिश की।  संवैधानिक दायरे से आगे बढ़ने का जोखिम लेकर अटल जी ने कश्मीर में  विश्वास का वातावरण बनाया तो  पचास साल बाद  फ्री एंड फेयर चुनाव के संकल्प को कश्मीर में जमीन पर उतारकर लोगों में लोकतंत्र के प्रति भरोसा पैदा किया। लेकिन आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने  अगर कश्मीर के   दायरे को आगे बढाकर ,जम्मू ,लदाख और पाकिस्तान मकबूजा कश्मीर के मसले को रेखांकित करने की कोशिश की है तो माना जायेगा की उन्होंने इतिहास से सबक ली है। कश्मीर के कई जिलों में लगातार ३५ दिनों के बंद -हड़ताल और कर्फ्यू के बाद यह सवाल पूछा जाना लाजिमी है कि  कौन चाहता है कश्मीर मसले का हल ?  एक रोमांटिक आतंकवादी बुरहान वानी की मौत से कश्मीर सचमुच खफा है ? या फिर कश्मीरियत की रिवायत वाली वादी में आई एस के तथ...