संदेश

एक भारत, पाकिस्तान में

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आज़ादी के बाद यह पहला मौका है जब पाकिस्तान की  नॅशनल असेंबली और सरकार ने अपने  पांच साल पुरे किये हैं .विरासत से मिली जम्हुरियत (लोकतंत्र ) को वहां के जमींदारों ,राजनेताओ और फौज ने मिलकर    अस्मत लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी है .लेकिन सियासी तौर पर नाकाबिल घोषित आसिफ अली जरदारी ने वह कमाल दिखाया है जो कमाल अबतक भुट्टो से लेकर नवाज शरीफ तक नहीं दिखा पाए आसिफ अली जरदारी का सद्र बनना पाकिस्तान में सबको चौकाया था .लेकिन मिस्टर १० परसेंट के नाम से मशहूर इस कारोबारी ने बड़ी चालाकी से फौजी जनरल अशफाक कयानी को 2013 तक सेवा विस्तार देकर अपनी हुकूमत को फौज के तख्ता पलट की रिवायत से बचा लिया था  .यानी सत्ता के दो केंद्र बनाकर बेनजीर भुट्टो के पति सद्र जरदारी ने  सियासी  उथल -पुथल ,अव्यवस्था ,खुनी खेल और दहशतगर्दी से लहुलहान पाकिस्तान में तथाकथित स्थायी सरकार का एहसास दिलाया  . अपने पडोसी मुल्क भारत के सियासी सूरतेहाल से सबक लेकर जरदारी ने न केवल गठ्वंधन सरकार चलाने में महारत हासिल की बल्कि सत्ता के दो केंद्र बनाकर भार...

पाकिस्तान ने दिलाया हमें 19 साल पुराने संसद के संकल्प की याद

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पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के एक प्रस्ताव ने भारत की संसद को सोते से जगाया है .पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने अपने एक प्रस्ताव में अफजल गुरु की फ़ासी की निंदा की है ,साथ ही संसद हमले के गुनहगार अफज़ल के डेड बॉडी को कश्मीरको सौपने  की मांग की है .पाकिस्तान असेंबली ने कश्मीर मामले में दुनिया को अपनी दखल बढाने की भी मांग की है .जाहिर है इसकी प्रतिक्रिया भारत की संसद में भी होनी थी .एक बार फिर संसद ने सर्वसम्मति से  पाकिस्तान के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास किया है .जम्मू कश्मीर सहित पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताते हुए संसद के प्रस्ताव ने पाकिस्तान को खबरदार भी किया है .लेकिन सवाल यह है कि  संसद अपने ही 19 साल  पुराने प्रस्ताव के आन वान और शान की रक्षा अबतक क्यों नहीं कर पायी है ? संसदीय परंपरा और जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति भारत की संसद दुनिया भर में एक विशिष्ठ स्थान रखती है .बहस और तीखी नोक झोक के बीच भारतीय संसद ने कई एतिहासिक फैसले लिए है .संसद के इन्ही संकल्पों ने देश में लोकतंत्र की महत्ता को मजब...

सियासत के चश्मे से अफज़ल की फ़ासी को मत देखिये

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 भूख हड़ताल और प्रोटेस्ट से यासिन मलिक का सियासी सरोकार है, लेकिन इस्लामाबाद में पाकिस्तान की एजेंसियों के सहयोग से आयोजित  हंगर स्ट्राईक का कुछ अलग सियासी मतलब है । अफज़ल गुरु की फांसी पर भले ही पाकिस्तानी हुकूमत देर से रद्देअमल दिया हो, लेकिन पाकिस्तान की दहषतगर्द तंज़ीमें और आईएसआई ने इसे मौक़े के तौर पर लिया।  यासिन मलिक के लिए ये सबसे बड़ा मौक़ा था कि वो हुर्रियत के दूसरे लीडरों को बता सकें कि हाफिज़ सईद से उनकी ज़्यादा नज़दीकियां  है। अलहदगी पसंद जमातो में  सियासी रुतबके का मतलब लष्करे तैयबा से दूरी नहीं, बल्कि नज़दीकी को माना जाता है। यही वजह है कि दूसरे हुर्रियत लीडरों ने हाफिज़ सईद से चोरी छिपे मिलने का बहाना ढूंढा, लेकिन यासिन मलिक ने इस मुलाक़ात को सार्वजनिक कर दिया।२३ जमातो के आल पार्टी हुर्रियत कांफ्रेंस में घमासान इस बात को लेकर मची है कि अफ़ज़ल की मौत को कैसे भुनाया जाय .  पार्लियामेंट हमले की साजि़ष पाकिस्तान में रची गयी थी, ये बात पूरी दुनिया को पता है। लेकिन हमले में मारे गए पांच पाकिस्तानी दहषतगर्दों के लिए कभी भी नमाज़े ...

गणतन्त्र दिवस : कश्मीर मसले में गणतंत्र की भूमिका बढाने की जरूरत है

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64 वे गणतन्त्र दिवस के मौके पर यह तय करना जरूरी है कि हमारा लोकतंत्र 64 साल का बुढा हो गया है या इस उम्र में भी 64 साल का शैशव दिखता है .गणतन्त्र के संस्थापको ने जिस जिम्मेदरी से हमें एक संविधान दिया और उसपर चलने का हमसे वचन लिया था ,क्या हम उस उम्मीद पर खड़े उतरे हैं .लोकतंत्र के  एक दो स्तंभ को छोड़कर बाकी सभी सतून दरकते नजर आ रहे है।हमारे तमाम तारीखी धरोहर पर यह आरोप लगते हैं कि उसमे नए ज़माने के साथ बदलाव की जरूरत है लेकिन हमने यह पड़ताल करने की जरूरत नहीं समझी कि बदलाव हमारे सोच में हुई है और इस सोच में मुल्क का सवाल ,मर्यादा का सवाल ,सहिष्णुता का सवाल ,भाईचारे का सवाल पीछे छूट गया है .भारत -पाकिस्तान के बीच बढे तनाव के बीच कई मुद्दे एकबार फिर चर्चा में है .यह मीडिया की समझदारी कहिये या बडबोलापन मुद्दे को भड़का कर सरकार और व्यवस्था को दोड़ने के लिए मजबूर जरूर कर देता है लेकिन ऐसे कई सवाल है जिन पर मीडिया समाज को जोड़कर एक राय बना सकता है . सरकार के सामने पहल के लिए विकल्प दे सकता है लेकिन ऐसे मुद्दे पर सशक्त चौथा स्तम्भ खामोश है .मसलन जम्मू कश्मीर में धारा 370 और...

धृतराष्ट्र के हस्तिनापुर में" दामिनी" के साथ इन्साफ?

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भाई साहब !बलिया कहाँ है?.औटो ड्राईवर के इस सवाल ने पहले मुझे चौकाया लेकिन उसके दिमाग में चल रहे सवालो को जानने के लिए मैंने कहा उत्तर प्रदेश में ."नाक कटने से बच गयी " ऑटो ड्राईवर ने कहा मुझे लग रहा था बलिया बिहार में है और " दामिनी " बिहार की थी .इससे पहले वह कुछ और बोलता ,मैंने उसे टोकते हुए कहा ,भाई वह देश की बेटी थी ,वैसे भी बलिया बिहार का बॉर्डर इलाका है ,भाषा और संस्कृति से एक है .जी !सब कुछ ठीक है लेकिन घर का मामला थोडा ज्यादा शर्मिंदा करता है ड्राईवर ने कहा .मै उसके जवाब से सन्न था  .16 दिसंबर की रात जब देश की बेटी (जिसे ज़माने ने "अवला " का नाम दिया था मौजूदा दौर में मिडिया ने उसे "दामिनी "निर्भय जैसे कई नाम दिए है ) मदद के लिए गुहार लगा रही थी ,आधुनिक कौरवों के चीरहरण से व्यथित पीड़ित बेटी समाज को कृष्ण बनने के लिए दुहाई दे रही थी लेकिन मदद के हाथ कही से नहीं बढे, क्योंकि  वह अपने घर की बेटी नहीं थी .यह इन्द्रप्रस्थ है आज दिल्ली बन गयी है लेकिन यहाँ कौरब कल भी थे और आज भी है सिर्फ भूमिका बदल गयी है . जाड़े की ठिठुरती रात में हमारी ब...

देश में सब कुछ "ठीक "नहीं है अटल जी

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हानि लाभ के पलडो में ,तुलता जीवन व्यापर हो गया .! मोल लगा विकने वालों का ,बिना बिका बेकार हो गया ! मुझे हाट में छोड़ अकेला ,एक एक कर मीत चला जीवन बीत चला .... एक दार्शनिक -राजनीतिग्य  अटल बिहारी वाजपेयी जीवन के 88 वे वसंत पूरा कर इन दिनों सियासी हाट में अकेले खड़े हैं ।राजनीती के मंडी में अपनी प्रखर बौधिक क्षमता की बदौलत अटल जी 50 साल तक आम और खास सबको प्रभावित किये   .गैर कांग्रेसी सरकार के वे पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने 6 साल देश के शासन की जिम्मेदारी संभाली .देश के आर्थिक प्रगति और नई दिशा देने में अटल जी का योगदान मील का पत्थर साबित हुआ  है .संवाद और संपर्क अटल जी के विकास दर्शन में शामिल थे यही वजह है की भारत में संचार क्रांति और सड़क निर्माण का...

कश्मीर के मसले को लेकर खामोश संसद

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 हर आतंकवादी हमले के छः महीने या फिर साल भर बाद फिर शुरू होती है भारत -पाकिस्तान के बीच बातचीत की पहल .फिर शुरू होता है पुराने जख्मो को भुलाकर नयी शुरुआत का संकल्प .मुंबई हमले में हमने अपने 200 से ज्यादा अजीजों को खोया, लेकिन दोषियों पर कारवाई करने में पाकिस्तान ने कभी भी रुची नहीं दिखाई लेकिन हमारे गृह मंत्री कहते है "छोडो कल की बाते ..." मुल्क में कही भी आतंकवादी हमले हुए हों ,उनका मकसद कुछ और हो लेकिन पाकिस्तान हर बार  उसे मसले कश्मीर से जोड़ता है।यानी मसले कश्मीर को लगातार सुर्ख़ियों में रखने की जो महारत पाकिस्तान ने हासिल की है उसका तोड़ कम ही देखने को मिला है . यानी बगैर आम कश्मीरियों के समर्थन के पाकिस्तान ने इन वर्षों में महज  प्रोपगंडा के बदौलत क...