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उत्तर प्रदेश एक राजनितिक प्रयोगशाला

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दीनदयाल उपाध्य जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में मनाये जाने वाला गरीब कल्याण वर्ष और नोटबंदी का क्या कोई ताल्लुक है  ? जरा सोचिये इंदिरा जी का बैंकों का राष्ट्रीकरण से  गरीबो का कोई सरोकार था क्या ? "गरीबी हटाओ" के इंदिरा जी का नारा क्या देश से गरीबी हटा पाया तो क्या पी एम मोदी का जनधन एकाउंट योजना गरीबों के एकाउंट में पैसा डाल पाया क्या ? शायद नहीं !लेकिन गरीबों का नाम लेकर इंदिरा जी और उनका परिवार वर्षों तक इस देश पर  शासन किया तो क्या पी एम मोदी भी चुनाव जीतने के लिए "गरीबी" का जबरदस्त मार्केटिंग कर रहे हैं ? भाई, आज भी गरीब और किसान की चर्चा तो सबसे ज्यादा राहुल बाबा करते हैं क्योंकि यह अबतक कांग्रेस का कॉपीराइट रहा ,फिर लोगों को उनकी बात पर यकीन क्यों नहीं हो रहा ?  क्यों यू पी में समाजवाद और दलितवाद ,जातिवाद ,सम्प्रदायवाद का प्रयोग धरासायी हो गया है ? शायद इसलिए अब गरीब सहानुभूति नहीं चाहते वो सियासी लीडरों का एहसान नहीं चाहते। अगर एक्सप्रेस वे को अखिलेश अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं तो हर गरीब को पता है कि उनका पूरा खानदान आज रिअलिटी ...

"सोच बदलेगा तो देश बदलेगा "

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उत्तर प्रदेश में जीत - हार की समीक्षा अभी होना बाकी है ,लेकिन ई वी एम मशीन पर हार का ठीकरा फोड़कर मायावती ने ठीक वैसी ही बात की है जैसी बात लाल कृष्ण आडवाणी ने 2004 में की थी। गोमती नदी के किनारे अपनी भव्य मूर्ति लगाकर मायावती ने लखनऊ में अपने को स्थापित जरूर कर लिया लेकिन इन वर्षों में सियासत में आये बदलाव को समझने में धोखा खा गयी। ऐसा ही धोखा बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार अडवाणी जी ने खाया था। सोशल इंजिनयरिंग का फार्मूला अब जीत का सूत्र नहीं है। न ही उग्र राष्ट्रवाद से चुनाव  जीता  जा सकता है। काम बोलता है इसके लिए प्रचार की जरूरत नहीं है ,जैसे शाइनिंग इंडिया की चमक का प्रचार 2004 में लोगों को प्रभावित नहीं कर सका था । लोगों के दिल में उतरने के लिए आम लोगों से संवाद जरूरी है। आमलोगों की समस्या को समझना जरूरी है। राष्ट्रीय मुद्दे की चर्चा के बजाय पीएम मोदी ने उत्तर प्रदेश में स्थानीय मुद्दे को अपनी जन  सभा में उठाया ,पार्टी ने टिकट बटवारे में हर वर्ग का ध्यान रखा  .सबसे बड़ी बात यह थी कि हर आम और खास में मोदी यह यकीन दिलाने में कामयाब हुए हैं कि स...

भारतीय राजनीति में परिवार और उनके ब्रांड अब फीके पड़ने लगे हैं ?

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दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित कहती हैं राहुल गाँधी अभी पॉलिटिक्स में नौशिखुआ हैं ,उन्हें कुछ और समय दीजिये। लेकिन बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी अपने बेटे तेजस्वी को अब मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती हैं। वह दौर था जब लालू जी ने अपने घरेलु पत्नी को चाहा तो मुख्यमंत्री बना दिया ,राहुल गाँधी से कम उम्र में   उनके पिता राजीव गाँधी को  कांग्रेस  पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे योग्य माना। लेकिन आज क्या हो गया कि ओडिशा में ब्रांड बीजू धरासायी हो रहे है ,ब्रांड ठाकरे की हवा निकल रही है ,शरद पवार सही ठिकाना  तय नहीं कर पा रहे हैं। ब्रांड मुलायम को ब्रैंड अखिलेश ने  चुनौती देने की कोशिश की तो उसे मजबूरी में सहारे की जरूरत पड़  रही है।  मायावती हर चुनावी रैली में दुबारा पत्थर न लगाने की कसमे ले रही है। तो क्या भारतीय राजनीति में परिवार और उनके ब्रांड अब फीके पड़ने लगे हैं ?  2014 ने भारतीय राजनीति को जो आईना दिखया था उसे सियासतदां आज भी झूठलाने की कोशिश कर रहे हैं। बिहार के चुनाव को आदर्श मानकर राजनितिक...

चुनावी संग्राम में कुछ दिन गुजारिये तो उत्तर प्रदेश में

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लोकतंत्र के महापर्व को  देखना है तो  कुछ दिन गुजारिये उत्तर प्रदेश में। यकीन मानिये  भारत की इस शानदार छवि को टी वी स्टूडियो से नहीं देखा जा सकता क्योंकि इस दौर में  यहाँ या तो एजेंडा चलता है या फिर शोर। आज हर कोई पूछ रहा है किस दल की बढ़त है,किसकी बन रही है सरकार। सिर्फ सवाल हैं ,उत्तर किसी के पास नहीं है।  क्योंकि ये उत्तर प्रदेश है यानी मिनी इंडिया। अहम् बात यह है कि करप्शन और बैमानी के लिए मशहूर उत्तर प्रदेश की पुलिस और प्रशासन इलेक्शन कमिशन के निज़ाम के अंदर आते ही अदभुत क्षमता   दिखा रहे है यानी निज़ाम सही हो तो तंत्र को संभलने में वक्त नहीं लगता  । तीसरे चरण के चुनाव आते आते यहाँ हर दल दावा जीत का कर रहा है और पूरी ताकत लगा रखा है तो यकीन मानिये जंग के केंद्र में   सिर्फ नरेंद्र मोदी   है और जंग 2017 से भी आगे की है।  पिछले कुछ वर्षो से चुनावी भाषणों का एजेंडा मोदी तय कर रहे है ,टीवी के विद्वान कहते है पी एम् मर्यादा लांघ रहे है ,लेकिन यह समझने की जरूरत है कि मोदी के भाषणों पर सपा ,बसपा और कांग्रेस से इतनी ...

अच्छे दिन ! आने वाले हैं .... कब, यह किसी ने नहीं पूछा

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अच्छे दिन ! आने वाले हैं .... कब, यह किसी ने नहीं पूछा। भलेमानुष एक दिन बदलने में 24 घंटे लगते हैं ,हालात बदलने में कुछ तो वक्त चाहिए। मेरे जैसा एक साधारण  व्यक्ति अच्छे दिन के लिए जीवन भर संघर्ष करता है फिर राहुल गाँधी ,लालू यादव ,अखिलेश ,मायावती जैसे नेता किस अच्छे दिन का उपहास कर रहे हैं। क्या जिन प्रयासों से इन लीडरों ने अपने लिए अच्छे दिन बनाये है.   यह  क्या  आम आदमी के लिए संभव है ? यानी ईमानदारी की कमाई और व्यवस्था से अच्छे दिन लाने में कुछ तो वक्त लगेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि अच्छे दिन का मतलब क्या है ? किसी के लिए अच्छे दिन का मतलब एक छोटे काम के लिए सरकारी दफ्तरों का चक्कर न लगाना पड़े ,किसी के लिए उसके बच्चो की शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त हो जाए ,किसी के लिए उन्हें रोजगार मिल जाये ,किसानों को खेत में पानी और खाद मिल जाए ,किसी बुजुर्ग को वक्त पर पेंशन मिल जाय ,स्कूल कालेज जाने वाली बेटिया निर्भीक घूम सके ,स्वास्थ्य   और सड़क  यातायात आसान हो सके कचहरी /अदालत से जल्दी न्याय मिल जाय  ,हर तरफ कानून का...

सियासी फलसफा अब मोदी को केंद्र में रखकर ही गढ़ा जा सकता है

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यू पी तो झांकी है असली जंग तो अभी बाकी है। देश की सियासत में अचानक पाँच राज्यों का चुनाव इतना क्यों महत्वपूर्ण हो गया यह देश में बन रहे  नए समीकरण  रेखांकित करता है ।2017 को 2019 के प्रोमो में फ़ीट करने के लिए बाप बेटे में तलवार खिंची हुई है ,तो कही महागठबंधन दरक रहा है। तीसरा मोर्चा हो या सेक्युलर फ्रंट सियासी फलसफा मोदी को केंद्र में रखकर गढ़ा जा रहा है। यानी कही एक पार्टी में दो अध्यक्ष हैं ,तो कही असली और नकली के बीच जंग जारी है। सियासी पंडित फेंट रहे हैं ,यू पी में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन किसी  एक पार्टी के लिए आत्मघाती होगा ,तो कही इसे ऐतिहासिक बताकर राहुल गांधी को मोदी के बराबर खड़े करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन इसी कोशिश में केजरीवाल से लेकर नीतीश कुमार तक राष्ट्रीय नेतृत्व की अपनी कुशल छवि बनाने के लिए अपने मोहरे भी बदल रहे हैं।   पुरे साढ़े 4  साल तक साढ़े चार चीफ  मिनिस्टर का तोहमत अखिलेश ढोते रहे लेकिन अचानक उन्होंने कौन सी सियासी टॉनिक पी कि  वे न केवल पार्टी के सर्वे सर्वा बन गए बल्कि जिम्मेदार ...

डिमोनेटाइजेशन : सबका साथ सबका विकास

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2016  आपके जीवन में क्यों महत्वपूर्ण रहा ,इसके कई व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं लेकिन यह देश के लिए क्यों महत्वपूर्ण बना ,इसकी वजह भी व्यक्तिगत ही है। पिछले 30 वर्षो में सत्ता परिवर्तन आने जाने का ऐसा सिलसिला बना कि किस किस को याद कीजिये ,किस किस को रोइये। .आराम बड़ी चीज है मुँह ढक के सोइये। लेकिन 2016  ने ऐसा मौका नहीं दिया। नोटबंदी का ऐलान , 50 दिनों का संघर्ष और पीएम मोदी की कामयाबी इसे ऐतिहासिक बना दिया। क्या यह कामयाबी पी एम् मोदी की थी जिसने चीफ जस्टिस जे एस ठाकुर के दंगे की आशंका को निराधार साबित किया  या फिर उन सबा सौ करोड़ जनता की जिसने पी एम् मोदी के डेमोनेटाइजेशन पर  यकीन किया . .  नोटबंदी के  दौर  में एक सियासी फैमिली ड्रामा उत्तर प्रदेश में भी चल रहा था ,राजनीतिक पंडितो ने मोदी के नोटबंदी के फैसले को आगामी विधान सभा चुनाव से भी जोड़ा। लेकिन आख़िरकार लोगों को लगा कि सपा के  ड्रामा में सबकुछ था लेकिन क्लाइमेक्स कभी नहीं आया ,लेकिन नोटबंदी इस दौर में ऐसा फैमिली सीरियल बना जिसमे हर उम्र ,वर्ग ,सम्प्रदाय टीवी न्यूज़...